‘जीवित देवी’ बनना सौभाग्य है या दुर्भाग्य! आप बताएं?

धर्म-समाज , विचार-विश्लेषण, शुक्रवार , 29-09-2017


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मुकुल सरल

एक तीन साल की मासूम बच्ची जिसे दीन-दुनिया की कोई ख़बर नहीं, उसे नेपाल में जीवित देवी का दर्जा देकर उससे उसका बचपन छीन लिया गया है। उसे उसके घर-परिवार, समाज सबसे अलग कर दिया गया है। आप इसे उसका सौभाग्य कहेंगे या दुर्भाग्य?

यह एक समाज की महानता है या क्रूरता?

यह एक बच्ची पर दुलार है या अत्याचार, शोषण?

आप शायद परंपरा की दुहाई देंगे लेकिन परंपरा के नाम पर क्या इस तरह की अंधश्रद्धा और कुरीतियों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए?

नेपाल के काठामांडू में तीन साल की बच्ची को नई ‘जीवित देवी’ का दर्जा दिया गया है। फोटो साभार : गूगल

क्या है पूरा मामला?

दरअसल नेपाल के काठामांडू में गुरुवार, 28 सितंबर को तीन वर्षीय तृष्णा शाक्या को नई जीवित देवीका दर्जा दिया गया है। नेपाल की पुरानी परंपरा के तहत जीवित देवी के तौर पर बच्ची की पूजा की जाती है। लोगों का मानना है की कुमारी उन्हें सभी तरह के कष्टों से बचाकर उनकी आजीवन रक्षा करेंगी।

तृष्णा को अब किशोरावस्था में प्रवेश करने तक अपने परिवार से अलग एक विशेष महल या मंदिर में देवी की तरह रहना होगा।

गुरुवार को एक आयोजन के दौरान तृष्णा को उसके घर से एक ऐतिहासिक दरबार में ले जाया गया। इस दौरान उसे लाल पोशाक पहनाई गई और पूरा श्रृंगार किया गया। दरबार स्क्वायर में तृष्णा की पूजा की गई,  इसके बाद उसके पिता उसे देवी महल तक लेकर गए।

कठिन चयन प्रक्रिया

जीवित देवीके लिए नेवार समुदाय की तृष्णा का चयन चार उम्मीदवारों में से हुआ है। इसके लिए उनकी कठिन परीक्षा होती है। कन्याओं की जन्म-कुंडली से लेकर उनका आचरण, इस चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। बताया जाता है कि कुमारी के चयन की कड़ी परीक्षा में उनके सामने भैंसे के कटे सिर से लेकर राक्षस बने लोग तक रखे जाते हैं। जो कन्या इन सबसे नहीं डरती, उसे कुमारी का दर्जा दिया जाता।

छोड़ना पड़ता है घर

कुमारी के चयन के बाद उन्हें अपना घर छोड़ना पड़ता है। उन्हें अलग-थलग रखा जाता है और यहीं उनकी सारी दीक्षा-शिक्षा होती है। जीवित देवी के तौर पर तृष्णा को घर से दूर देवी महलमें रहना होगा और कुछ नियमों का पालन भी करना होगा।

नेपाल के काठामांडू में तीन साल की बच्ची को नई ‘जीवित देवी’ का दर्जा दिया गया है। फोटो साभार : गूगल

साल में सिर्फ़ 13 बाहर बाहर निकलने की इजाज़त

तृष्णा एक साल के दौरान सिर्फ 13 बार विशेष दिवस पर देवी महल से बाहर निकल पाएगी। बाहर निकलते वक्त भी उसे खास ध्यान देना पड़ता है क्योंकि कुमारी के पांव जमीन पर नहीं पड़ने चाहिए।

व्यस्क होने पर भी ज़िंदगी मुश्किल

कन्या को तब तक कुमारी माना जाता है जब तक उन्हें मासिक धर्म शुरू नहीं होता। इसके बाद किसी और कन्या का चयन कर उसे कुमारी बनाया जाता है। कुमारी के व्यस्क होने के बाद उनकी जिंदगी आसान नहीं होती। पुरानी मान्यताओं और कहानियों के अनुसार जो आदमी कुमारी रह चुकी लड़की से शादी करता है, उसकी जिंदगी कम हो जाती है। इस कारण पुरुष इनसे शादी करने के लिए तैयार नहीं होते।

पिता खुश भी और दुखी भी

तृष्णा के पिता बैजया रत्न शाक्या ने इस मौके पर कहा कि उनके अंदर मिलाजुला भाव है। वह बेटी के जीवित देवी के तौर पर चुने जाने अच्छा और सौभाग्य की बात मानते हैं, वहीं बेटी के अपने पास से दूर होने पर उनको दुख भी है।

आप यह भी कह  सकते हैं कि जब बच्ची के मां-बाप राजी हैं तो आपको क्या फर्क पड़ रहा है? लेकिन क्या कोई मां-बाप अपने बच्चे को कुएं में धकलने लगें तो हम चुपचाप सहेंगे। हमारे यहां कोई मां-बाप अपनी बच्ची का बाल विवाह करने लगे तो क्या आप हस्तक्षेप नहीं करेंगे? क्या हमारे समाज सुधारकों ने संघर्ष करके बाल विवाह को प्रतिबंधित नहीं कराया।  

आप कहेंगे यह तो नेपाल का मामला है

अब आप कहेंगे कि यह नेपाल का मामला है, इससे हमारा क्या मतलब, लेकिन क्या हम लोग देश-दुनिया के मामलों में बोलते नहीं? क्या हम तालिबान के खिलाफ और मलाला के साथ खड़े नहीं हुए? क्या समंदर किनारे मिली एक सीरियाई बच्चे की लाश देखकर पूरी दुनिया सदमे में नहीं आ गई थी? क्या अगर दुनिया में कहीं कोई युद्ध या अत्याचार होगा तो हम चुप मार कर बैठ जाएंगे कि यह तो  दूसरे देश का मामला है। इस तरह के एक नहीं हज़ार उदाहरण हैं। और नेपाल तो हमारा पड़ोसी देश है। और दखल की बात बाद में लेकिन इस पर विचार किया जाना तो ज़रूरी है क्योंकि पड़ोसी देशों और हमारा समाज भी लगभग एक-सा है। अपने भारत में भी अभी तक धर्म और परंपरा के नाम पर इस तरह के बहुत से अंधश्रद्धा, अंधविश्वास और कुरीतियां चल रही हैं, जिनके निशाने पर आमतौर पर बच्चे और महिलाएं होती हैं। अभी आपने तमिलनाडु के मदुरई में मंदिर में लड़कियों को 15 दिन तक टॉपलेस यानी कमर के ऊपर बिना कपड़ों के रखने की परंपरा के बारे में पढ़ा होगा। इन लड़कियों को भी देवी के तौर पर सजाया जाता है। क्या आप इसे सही बताएंगे। क्या धर्म और परंपरा के नाम पर यह लड़कियों का शोषण नहीं है? ऐसा कहीं भी हो देश में या दुनिया में उसका पुरज़ोर विरोध होना चाहिए। 

(यह लेखक के निजी विचार हैं।) 










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Om Prakash Nadeem :: - 09-29-2017
main is tarah ki pratha ke sakht khilaf hun