मजदूर आंदोलन की नींव थे एनएम जोशी

हमारे नायक , , रविवार , 20-08-2017


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मसऊद अख्तर

एन.एम. जोशी 

(1879-1955)

भारत के बीसवीं सदी के प्रमुख नेताओं में गिने जाने वाले सुप्रसिद्ध उदार राजनेता, भारत में ट्रेड यूनियन आन्दोलन के अग्रणी व एक तरह से जनक माने जाने वाले सक्रिय समाज सुधारक नारायण मल्हार जोशी जो अपने दोस्तों व सहकर्मियों के बीच नाना साहब जोशी के नाम से जाने जाते थे और सामान्य जन में एनएम जोशी के नाम से प्रसिद्ध हुए, का जन्म एक मध्यम वर्गीय ब्राह्मण पुरोहित परिवार में 5 जून 1879 को महाराष्ट्र के कोलाबा जिले के गोरेगांव में हुआ था जो अब मुम्बई का उप नगर है। आपका सबसे महत्वपूर्ण योगदान कामगार कल्याण के कार्यों तथा कामगार हितों के लिए संघर्ष था।

जहां तक शिक्षा का सवाल है जोशी जी ने माध्यमिक तक की शिक्षा अपने गाँव में ही प्राप्त की। घर की परिस्थितियों की वजह से बीच में कुछ वर्षों तक पढ़ाई छोड़नी पड़ी। तीन चार वर्षों तक पारिवारिक अभिवृत्ति को सुचारू रूप से आगे बढ़ाने के लिए वेदों, संहिता और संस्कृत में लिखित धार्मिक पुस्तकों का अध्ययन किया। परन्तु बड़े भाई महादेव राव ने जो कि पूना में रहने लगे थे उन्हें पूना ले आये और वहाँ इंग्लिश मीडियम स्कूल में आगे की पढ़ाई के लिए नाम लिखवाया। यहीं से नाना साहब ने मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद बीए की शिक्षा उन्होंने पूना के ही डेक्कन कॉलेज से पूरी की। उस वक़्त पूना में तिलक व अगरकर दो सक्रिय जाने माने सामाजिक व राजनैतिक कार्यकर्ताओं का प्रभाव था जो एक दूसरे से अलग हो दो भिन्न विचारधाराओं का नेतृत्व कर रहे थे, चर्चा में थे। नाना साहब के दो अध्यापक देवधर व पटवर्धन का अगर्कावादी सुधारवादी विचारधारा में विश्वास था और वे दोनों ही स्वतंत्रता व समानता पर आधारित नई सामाजिक व्यवस्था के प्रखर हिमायती थे। उनके विचारों का युवा हो रहे नाना साहब जोशी के मन मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव पड़ा। इसके साथ ही जोशी जी सुधारवादी विचारधारा द्वारा प्रकाशित पत्रिका ‘सुधारक’ के नियमित पाठक थे। इन सब कारकों ने मिलकर एन.एम जोशी के विचारों को विकसित व प्रभावित किया। स्नातक के बाद जोशी जी ने अपने जीवन व्यवसाय के रूप अध्यापन को चुना और अपनी जवानी के आठ साल इसमें बिताए। पूना उन दिनों बौद्धिकों, समाज सुधारकों और राजनैतिक आन्दोलनकारियों का अड्डा था। युवा इन नेताओं से प्रभावित हो वैसा बनना चाहते थे। इनमें प्रमुख नाम रानाडे, गोखले, तिलक, अगरकर, फुले, भंडारकर और कई अन्य थे। जोशी जी बाद में चलकर गोखले के अनुयायी बने।

मजदूर नेता एन एम जोशी।

वर्ष 1900 में रमाबाई से उनका विवाह हो गया। उनकी पत्नी भारतीय संस्कृति की एक कुशल और आदर्श गृहणी थीं। जीवन पर्यंत उन्होंने घर को संभालने के साथ साथ जोशी जी को उनके सामाजिक दायित्वों का निर्वहन करने में काफी सहयोग प्रदान किया। दुर्भाग्य से वर्ष 1927 में काफी कम आयु में ही रमाबाई का निधन हो गया।

वर्ष 1909 में जोशी जी ने गोखले द्वारा 1905 में पूना में स्थापित ‘सर्वेन्ट्स ऑफ़ इंडिया सोसाइटी’ की सदस्यता ग्रहण कर ली। इस सोसाइटी के सदस्य के नाते उन्हें आरम्भ में सोसाइटी द्वारा मराठी में प्रकाशित किये जाने वाले दैनिक अखबार ‘दैनंप्रकाश’ से जुड़े प्रबंधकीय कामों को देखने का दायित्व सौंपा गया था। दो वर्ष बाद 1911 में ‘दैनंप्रकाश’ का बम्बई संस्करण निकालने का निर्णय हुआ और इस हेतु जोशी जी को बम्बई स्थानांतरित कर दिया गया तथा इस बार उन्हें बम्बई संस्करण निकालने की पूरी जिम्मेदारी दी गयी। यहाँ आकर उनकी गतिविधियों का बहुविध विस्तार हुआ। यहाँ वे औद्योगिक श्रमिकों के संपर्क में आये। मॉर्ले-मिंटो सुधार के बाद उदारवादियों के लिए विधायिका सहित विभिन्न क्षेत्रों में सार्वजनिक सेवा के लिए बेहतर अवसर था। इसी समय जोशी जी ने अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत की। वे श्रमिक समस्याओं में रूचि लेने लगे। इसके साथ ही उन्होंने कई कल्याणकारी केंद्र, रात्रि स्कूल, दवा केंद्र और श्रमिक क्षेत्रों में औद्योगिक कक्षाएं शुरू कीं। उन्होंने 1911 में सोशल सर्विस लीग की स्थापना की और उससे अपने मृत्यु काल 1955 तक जुड़े रहे। 

1919 में बंबई में व उसके आसपास अनेक हड़तालें हुयीं। 1918 व 1919 में कपड़ा मजदूरों की हड़ताल हुई। इस समय तक जोशी जी किसी भी हड़ताल से संबद्ध नहीं थे। तथापि वे सम्बंधित आंकड़े और तथ्य इकठ्ठा करके मजदूरों के हित में लिखा व बोला करते थे। थोड़े ही दिनों में जोशी जी की पहचान मजदूरों के हितों के एक मुखर प्रवक्ता के रूप में होने लगी। वह समय-समय पर मजदूरों के काम के घंटों को कम करने, चिकत्सीय सहायता, कल्याणकारी सुविधाओं, शिक्षण और प्रशिक्षण तथा बेहतर मजदूर बस्तियों की वकालत किया करते थे।

पहले विश्व युद्ध की समाप्ति पर विजेता राष्ट्रों ने मजदूरों के जीवन स्तर को उन्नत करने और सामाजिक न्याय को बढ़ावा देने के उद्देश्य से अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की स्थापना का निर्णय लिया। इस उद्देश्य से अक्टूबर 1919 में वाशिंगटन में एक सम्मलेन बुलाया गया। भारत सरकार ने भारतीय मजदूरों के प्रतिनिधि के तौर पर जोशी जी को मनोनीत किया। इसके साथ ही जोशी जी की आईएलओ के साथ रिश्तों की शुरुआत हुई। इसके बाद जोशी जी ने भारतीय मजदूरों के प्रतिनिधि के तौर पर आईएलओ के 1921, 1912, 1925, 1929, 1934, 1935, 1936, 1937, 1945 तथा 1947 में आयोजित अधिवेशनों में भाग लिया। वे 1922 से 1934 के दौरान आईएलओ के शासी निकाय के उप सदस्य तथा 1934 से 1944 तक सदस्य रहे। उन्होंने 1925 में आईएलओ के एशियाई क्षेत्रीय सम्मलेन का सुझाव दिया जो 1946 में जाकर स्वीकार हुआ और 1947 में दिल्ली में एशियन प्रिपेरेटरी सम्मलेन हुआ।

1919 में वाशिंगटन में हुए आईएलओ के पहले सम्मलेन के दौरान इनकी मुलाक़ात वहाँ रह रहे लाला लाजपत राय से हुई और इसी का परिणाम था कि 1920 में जब आल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस का गठन हुआ तो इंडियन नेशनल कांग्रेस के अध्यक्ष लाला जी ने इसकी अध्यक्षता करना स्वीकार की। एटक के गठन के शुरूआती दौर में जोशी जी के पास संगठन का कोई महत्वपूर्ण पद नहीं था। 1925 में जोशी जी को इसका संयुक्त सचिव तथा 1927 में महासचिव बनाया गया। 

अन्य नेताओं के साथ एनएम जोशी।

जोशी जी ने मजदूरों से जुड़ी अनेक समस्याओं पर अनेक लेख लिखे जो उन समस्याओं की तरफ लोगों का ध्यान आकृष्ट करने और उनके समाधान हेतु आन्दोलन की शुरुआत में सहायक होते थे। बम्बई में जोशी जी दो बड़ी यूनियनों ‘कपड़ा मजदूर यूनियन’ तथा ‘राष्ट्रीय नाविक यूनियन’ से काफी सक्रिय रूप से जुड़े हुए थे। उन्होंने ही 1926 में कपड़ा मजदूर यूनियन की स्थापना की थी। इसके अतिरिक्त वे ‘बॉम्बे सोशल सर्विस लीग, रिलीज्डपेंशन एंड सोसाइटी, लीगल एंड सोसाइटी, बॉम्बे प्रेसीडेंसी सोशल रिफार्म एसोसिएशन, इंडियन ट्रेड यूनियन कांग्रेस, सिविल लिबर्टीज यूनियन’ आदि संस्थाओं से घनिष्ठ रूप से जुड़े रहे।

वर्ष 1927 व 28 मजदूरों के लिए मुश्किल भरे वर्ष थे। यह उद्योगों में मजदूरों के कटौती का दौर था। जिसके परिणामस्वरूप देश के विभिन्न स्थानों पर अनेकों हड़तालें हुईं। बंगाल नागपुर रेलवे के मजदूरों ने दो बार हड़ताल की और दोनों हडतालों में समझौता करवाने में जोशी जी ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। जोशी जी ने 1924 व 1928 में ज़मशेदपुर में इस्पात मजदूरों द्वारा की गई हड़तालों के दौरान भी बहुत सक्रिय भूमिका निभायी।

जोशी जी ट्रेड यूनियन को मजदूरों के आर्थिक संगठनों और उनके तात्कालिक हितों के संरक्षण प्रदान करने वाले संगठनों के रूप में विकसित करना चाहते थे। साइमन कमीशन के बहिष्कार के बाद पूरा का पूरा वातावरण सरकार विरोधी हो गया और सभी जगह से सरकार द्वारा नियुक्त किये जाने वाले सभी आयोगों और समितियों के बहिष्कार की मांग होने लगी। राष्ट्रवादी व साम्यवादी विचारों के लोगों का विचार था कि ‘रॉयल श्रम आयोग’ का भी बहिष्कार होना चाहिए। इससे जोशी जी की स्थिति काफी असमंजस वाली हो गयी क्योंकि जोशी जी व दीवान चमन लाल इस आयोग के सदस्य मनोनीत किए गए थे। जोशी जी का असहयोग की नीति में विश्वास नहीं था। रॉयल कमीशन उनकी नज़र में मजदूरों के हितों को आगे बढ़ाने का एक स्वर्णिम अवसर था जिसका लाभ वो हर हाल में उठाने के पक्ष में थे। दूसरी तरफ एटक के अधिकांश सदस्य इसका बहिष्कार करना चाहते थे। इसका परिणाम यह हुआ कि एटक का बंटवारा हो गया।

एनएम जोशी।

बंटवारे के बाद एटक से अलग हुए लोगों ने पहली दिसम्बर 1929 को बैठक करके एक अलग केन्द्रीय संगठन बनाने का निश्चय किया। विभिन्न यूनियनों के लगभग 60 प्रतिनिधियों ने इसमें भाग लिया। इस बैठक के दौरान दो प्रस्ताव पारित किये गए। एक तो यह कि रॉयल कमीशन के समक्ष गवाही देना भारतीय कर्मकारों के हित में था। अतः रॉयल कमीशन को सहयोग दिया जाना चाहिए और दूसरा यह कि बैठक में उपस्थित लोग गोलमेज़ सम्मलेन में श्रमिकों के पर्याप्त प्रतिनिधित्व के सम्बन्ध में दिए गए वायसराय के कथन का स्वागत करते हैं।

इसी के साथ इंडियन फेडरेशन ऑफ़ ट्रेड यूनियन्स का भी गठन किया गया। कालान्तर में 1933 में इंडियन फेडरेशन ऑफ़ ट्रेड यूनियन्स का नेशनल फेडरेशन ऑफ़ लेबर जिसका गठन जमना दास मेहता ने किया था, में विलय कर दिया गया था इस नए संगठन का नाम बदलकर नेशनल ट्रेड यूनियन फेडरेशन रखा गया। 

नेशनल ट्रेड यूनियन फेडरेशन का बम्बई, नागपुर व कलकत्ता में तीन अधिवेशन क्रमशः 1933, 1935 व 1937 में दिसम्बर के महीने में हुआ। जोशीजी ने इन तीनों अधिवेशन में हिस्सा लिया। तीसरे अधिवेशन में उन्हें फेडरेशन का अध्यक्ष चुना गया। अगले वर्ष 1938 में फेडरेशन का एटक में विलय हो गया।

जोशी जी जनवरी 1921 में श्रमिक प्रतिनिधि के रूप में केन्द्रीय विधायिका के सदस्य मनोनीत किये गए। वह 1947 में संविधान निर्मात्री सभा के गठन के साथ केन्द्रीय विधायिका के ख़त्म होने तक 25 वर्षों तक इसके सदस्य बने रहे।

जोशी जी ने 1948 में ट्रेड यूनियन क्षेत्र में सक्रिय भागीदारी से एटक के महासचिव पद से अपना इस्तीफा देने के साथ अपने आपको अलग कर लिया। लगभग इसी दौरान तीन नए केन्द्रीय मजदूर संगठन बने। इंटक, हिन्द मजदूर सभा और यूटीयूसी। जोशी जी यद्यपि कि कभी औपचारिक रूप से इनसे नहीं जुड़े मगर वैचारिक रूप से वे हमेशा हिन्द मजदूर सभा के करीब रहे और समय समय पर उसको सलाह व सुझाव दिया करते थे। देश के श्रमिक आन्दोलन व श्रमिक हितों के प्रति बहुमूल्य योगदान करने के बाद अंततः वे 30 मई 1955 को हमेशा के लिए निद्रा के आगोश में चले गए।


 










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