पद्मश्री मनीबेन: मदर्स क्लब और सेवा मंदिर से ट्रेड यूनियन तक का सफ़र

हमारे नायक , , सोमवार , 25-09-2017


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मसऊद अख़्तर

(1905-1979)

मनीबेन कारा का व्यक्तित्व काफी अनूठा था। हालांकि वह एक व्यापारिक परिवार से थीं किन्तु फिर भी उन्होंने ट्रेड यूनियन के क्षेत्र में कार्य करने का विकल्प चुना।

संपन्न व्यावसायिक परिवार में जन्म

मनीबेन का जन्म बम्बई (आज की मुंबई) में वर्ष 1905 में एक संपन्न व्यावसायिक परिवार में हुआ था। उस समय लड़कियों को स्कूल में पढ़ाने का प्रचलन नहीं था, फिर भी उनके पिता लीलाधर कारा ने उन्हें स्कूली शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित किया। पहले उन्होंने चंदरामजी गर्ल्स स्कूल और बाद में सैंट कोलम्बिया हाई स्कूल से पढाई की। सैंट कोलम्बिया हाई स्कूल में पढ़ाई के दौरान ही मिशनरी कार्य व समाज सेवा के प्रति वह आकर्षित हुईं। वह स्कूल की तत्कालीन प्रधानाचार्य मैकलीन से काफी प्रभावित थीं। मैकलीन ने बम्बई शहर में उस समय किये जाने वाले कार्य के प्रति उनका ध्यान आकर्षित किया। मनीबेन कारा के मन यह विचार अक्सर आया करता था कि यदि मातृभूमि से हज़ारों मील दूर आकर मिशनरी लोग हमारे देश में मिशनरी कार्य कर सकते हैं तो यह कार्य अपने देश के लोगों के लिए हम क्यों नहीं कर सकते।

मनीबेन कारा। फोटो साभार : गूगल

बिट्रेन से समाज कार्य में डिप्लोमा

कुछ कारणवश वह मैट्रिकुलेशन की परीक्षा उत्तीर्ण न कर सकीं। इससे उन्हें बहुत दुःख हुआ। उनके पिता ने उन्हें इंग्लैंड (ब्रिटेन) जाकर उनकी रूचि के अनुसार समाज कार्य में प्रशिक्षण प्राप्त करने की सलाह दी। अपने पिता की सलाह पर वर्ष 1928 में वह इंग्लैंड गईं तथा वहाँ उन्होंने बर्मिंघम विश्वविद्यालय में समाज कार्य में डिप्लोमा पाठ्यक्रम में प्रवेश लिया। एक वर्ष पश्चात डिप्लोमा पाठ्यक्रम को सफलतापूर्वक समाप्त करके और समाज कार्य में पर्याप्त ज्ञान हासिल कर वह वापस लौट आईं।

बम्बई की चाल में मदर्स क्लब

भारत लौटने पर वह पूर्ण उत्साह के साथ समाज कार्य में जुट गईं। अपने इस समाज कार्य को उन्होंने बाइकुला डाकघर के निकट स्थित बम्बई सुधार ट्रस्ट की चाल (स्लम) में रहने वाले लोगों के लिए कार्य करने के साथ आरम्भ किया। इन चालों में रहने वाले अधिकतर लोग बम्बई नगर निगम के कर्मचारी थे। समाज सेवा के रूप में जो सबसे पहला काम मनीबेन जी ने किया वह था चाल निवासियों को स्वच्छता के प्रति जागरूक करना। वहाँ उन्होंने मदर्स क्लब की शुरुआत की। मनीबेन जी इस क्लब में उस क्षेत्र में बसी माताओं को अपने बच्चों के साथ लाने के लिए प्रेरित किया करती थीं। वह उन्हें कहानियों के माध्यम से साक्षरता व स्वच्छता का महत्व बताया करती थीं। इसके साथ ही वहाँ महिलाओं को अनेक प्रकार के कौशल भी सिखाए जाते थे। जैसे कि वह अपना पारिवारिक बजट कैसे बनाएं व अपनी मासिक आय को कैसे खर्च करें कि उन्हें महीने के अंत में कुछ बचत भी हो जाए। थोड़े ही समय में इस क्लब ने काफी ख्याति हासिल कर ली और आसपास रहने वाले बहुत से मजदूर अपनी विभिन्न समस्याओं के निवारण के लिए उनके पास आने लगे। यह क्लब मजदूरों को शराब पीने से रोकने का प्रयास भी करता था।

सेवा मंदिर की स्थापना

समाज सेवा का एक अन्य महत्वपूर्ण प्रयास जो मनीबेन ने इसी समय आरम्भ किया वह था, सेवा मंदिर की स्थापना। यद्यपि इसका काम भी मदर्स क्लब से मिलता जुलता था लेकिन इसका कार्य क्षेत्र मदर्स क्लब से अधिक व्यापक था। यहीं वे मजदूरों की दैनंदिन समस्याओं से अवगत हुईं और धीरे धीरे उसके निराकरण हेतु ट्रेड यूनियन की तरफ आकर्षित हुईं।

म्युनिसिपल वर्कर्स यूनियन की स्थापना

बॉम्बे नगर निगम के कर्मचारियों की बाइकुला बस्ती में मनीबेन जी ने समाज कल्याण के प्रयासों के रूप में ही आगे चलकर म्युनिसिपल वर्कर्स यूनियन की स्थापना की। मनीबेन जी का यह दृढ़ मत था कि मजदूरों के जीवन में बिना उनकी आर्थिक स्थिति में ठोस सुधार के बदलाव नहीं लाया जा सकता और आर्थिक स्थिति में बदलाव यूनियन के सामूहिक प्रयासों के माध्यम से ही लाया जा सकता है। म्युनिसिपल वर्कर्स यूनियन का पंजीकरण 29 मार्च 1935 को हुआ। उन दिनों ट्रेड यूनियन गतिविधियों को चलाना मुश्किल कार्य था। नियोजकगण मजदूरों जो कि अधिकतर असंगठित और नियोजकों के खिलाफ कुछ भी बोलने से डरते थे, की आवश्यकताओं के प्रति पूर्ण रूप से तटस्थ थे तथा उन दिनों कोई भी यूनियन, यूनियन के नेताओं में मजदूरों के पूर्ण आस्था व विश्वास से ही चल सकती थी। मनीबेन जी समर्पण भाव से अपने समाज कल्याण के कार्यों के माध्यम से यह विश्वास हासिल करने में सफल रही थीं। जल्दी ही उन्होंने टेक्सटाइल मिल्स की भाँति ही शिपिंग उद्योग, रेलवे व अन्य अनेक उद्योगों में लगे मजदूरों का विश्वास भी हासिल कर लिया।

एम एन रॉय के साथ मनीबेन कारा। फोटो साभार : गूगल

राजनीतिक पार्टी से भी परहेज़ नहीं

वह समाज से गरीबी, दुःख, असमानता का अंत करके समानता व स्वतंत्रता पर आधारित समाज की स्थापना हेतु सामाजिक क्रान्ति चाहती थीं तथा ऐसा करने के लिए उन्हें राजनीतिक पार्टियों से सहयोग लेने और उनसे संबद्ध होने में भी कोई इनकार नहीं था। इसी उद्देश्य से वह एम.एन. रॉय नीति रेडिकल डेमोक्रेटिक पार्टी से जुड़ गईं और सही मायने में एक रॉयवादी के नाते ही उन्होंने ट्रेड यूनियन आन्दोलन में हिस्सा लिया। 1930 के दशक में साम्यवादियों और रॉयवादियों के बीच प्रभुत्व को लेकर आपसी द्वंद्व हुआ। इसके चलते मनीबेन और उस समय के एक अन्य महत्वपूर्ण श्रमिक नेता आर.एस. निम्बालकर के बीच संघर्ष का जन्म हुआ। इन सारे उठापटक के दौर में म्युनिसिपल वर्कर्स यूनियन मनीबेन जी के साथ बनी रही।

मजदूर नेता के तौर पर लंबा संघर्ष

एक मजदूर नेता के नाते मनीबेन जी ने टेक्सटाइल मजदूरों, डाक मजदूरों, हॉकरों, रेलवे मजदूरों के संघर्ष को निडर होकर लड़ा और लगभग हमेशा ही विजय हासिल की। एक मजदूर नेता के रूप में उन्होंने अनेकों मजदूर रैलियों को संबोधित किया। वह एक निडर और सशक्त वक्ता थीं जो चौपाटी व बम्बई के कामगार मैदान में खुले आसमान के नीचे आयोजित बैठकों में भाषण देतीं। उनके भाषणों के दौरान इतनी शान्ति रहती कि लम्बे चौड़े मैदान में दूसरे छोर पर श्रोता भी उनकी बात को आसानी से सुन सकते थे। अपने भाषणों में वह खुले तौर से मजदूरों के प्रति सरकारी रवैये की कड़ी आलोचना किया करती थीं।

यद्यपि मनीबेन जी मजदूरों के हक के लिए लड़ने में पूर्ण विश्वास करती थीं लेकिन वह हड़ताल के पक्ष में नहीं थीं। उनका विचार था कि हड़ताल का सहारा बहुत ही मजबूरी की स्थिति में लिया जाना चाहिए। उनका मत था कि जल्दी जल्दी हड़ताल करने से व लगातार संघर्ष से मजदूर आन्दोलन कमजोर होता है और ऐसा करने से राष्ट्र व समाज का भी अहित होता है। उन्होंने मैरीटीम यूनियन का भी गठन किया जो कि मुख्यतः मर्चेंट नेवी में काम करने वाले अधिकारियों का संगठन था. चूँकि शिपिंग से जुड़ा उद्योग उस समय विकसित होता हुआ उद्योग था अतः उन्होंने इसके कर्मचारियों के लिए उच्चतर वेतनमानों की मांग रखी। वर्ष 1970 में जब तत्कालीन जहाजरानी मंत्री ने शिपिंग उद्योग में काम कर रहे लोगों को विदेशी शिपिंग कंपनियों में जाने पर रोक लगाने संबंधी बिल संसद में रखा तो उस समय मनीबेन जी ने मैरीटीम यूनियन को बिल के खिलाफ प्रत्यावेदन (मेमोरेंडम) रखने की सलाह दी और साथ ही अधिकारियों की मांग के पक्ष में सांसदों को लामबंद किया। इस उद्देश्य से वे अपने खराब स्वास्थ्य के बावजूद वह दबाव बनाने के लिए संबद्ध मंत्री से मिलने दिल्ली भी गईं। यह बिल पास तो हो गया मगर मनीबेन जी की अपील का असर यह हुआ कि इसके क्रियान्वयन के दायरे को सीमित कर दिया गया।

पश्चिमी रेलवे कर्मचारी यूनियन की अध्यक्ष

वह 1948 में पश्चिमी रेलवे कर्मचारी यूनियन की अध्यक्षा चुनी गईं और 1979 यानी अपने मृत्युपर्यंत तक इस पद पर कार्य करती रहीं। इस यूनियन के कार्य को बेहतर से बेहतर तरीके से अंजाम देने के उद्देश्य से अपने जीवन का एक लंबा हिस्सा उन्होंने बम्बई सेंट्रल और दिल्ली के बीच पड़ने वाले सैकड़ों छोटे बड़े स्टेशनों से होकर गुजरने और रेलवे कर्मचारियों और मजदूरों की समस्या को बहुत नज़दीक से जानने व समझने में गुजारा।

उन्होंने रेलवे मजदूरों की आर्थिक स्थिति में सुधार के लिए संघर्ष को उनकी उत्पादकता और रेलवे के विकास में उनके योगदान से जोड़ते हुए आगे बढाया। वर्ष 1952 में नेतृत्व विनिमय कार्यक्रम के तहत उन्होंने अमेरिका का दौरा किया, जहाँ उन्होंने अमेरिकन श्रम आन्दोलन विशेषकर रेलवे के संदर्भ में अध्ययन किया। उनके इस दौरे ने आगे चलकर रेलवे मजदूर यूनियन के नेताओं की नेतृत्व विनिमय परम्परा को आगे बढ़ाया।

साभार : गूगल

महिला अधिकारों की भी लड़ाई

उनके अनुसार महिला मुक्ति का आशय आर्थिक मुक्ति था। 1932 में बम्बई नगर निगम की पार्षद चुनी जाने के बाद उन्होंने पदाधिकारियों का ध्यान महिलाओं की समस्याओं के प्रति आकर्षित किया। वह महिलाओं के प्रति सहानुभूति की पक्षधर नहीं थीं। वर्ष 1974 में विधायिका में महिलाओं के आरक्षण का विरोध करते हुए उन्होंने कहा कि महिलायें कुल आबादी का लगभग 50 प्रतिशत हैं, अतः उन्हें नाममात्र का प्रतिनिधित्व देने से समस्या का हल नहीं होगा। उन्हें तो व्यापक प्रतिनिधित्व की आवश्यकता है, जो कि स्वयं उनके और समाज दोनों के हित में होगा। लेकिन यह प्रतिनिधित्व महिलाओं को उनके अधिकारों व कर्तव्यों के प्रति जागरूक बनाकर और उनके पक्ष में सार्वजनिक जनमत से दिलाया जाना चाहिए। इस सम्बन्ध में उनका विचार यह भी था कि महिलाओं को शिक्षा के माध्यम से सार्वजनिक दायित्व के निर्वहन में बराबर की जिम्मेदारी निभाने योग्य बनाना ज्यादा सार्थक व प्रभावपूर्ण होगा बजाय इसके कि आरक्षण के माध्यम से उन्हें कुछ और सीटें दिला दी जाएँ। वह महिलाओं को कठोर कार्य स्थितियों से बचाने की भी पक्षधर थीं। इसीलिए उन्होंने दिसम्बर 1975 में उत्पादकता परिषद द्वारा उत्पादकता और महिलाओं की भूमिका विषय पर सेमीनार में बोलते हुए इस आधार पर महिलाओं की रात्रि की पारी में रखने की मुखालफत की कि इससे पारिवारिक जीवन पर प्रतिकूल असर पड़ेगा।

1977 में पद्मश्री सम्मान

मनीबेन कारा के श्रम आन्दोलन के क्षेत्र में किये गए योगदान को विभिन्न अवसरों पर अनेक रूपों में मान्यता व सम्मान प्रदान किया गया। उदाहरण के तौर पर वर्ष 1946-47 के दौरान उन्हें केन्द्रीय विधायिका में श्रम प्रतिनिधि चुना गया। वह स्वतंत्र ट्रेड यूनियनों के अंतर्राष्ट्रीय श्रम परिसंघ के संस्थापक सदस्यों में से एक थीं और बाद में उसकी कार्यकारी सदस्य चुनी गईं। उन्होंने 1944 में विश्व ट्रेड यूनियन परिसंघ के लन्दन में आयोजित संस्थापना सम्मलेन में हिस्सा लिया। वर्ष 1988 में अंतर्राष्ट्रीय परिवहन मजदूर परिसंघ द्वारा स्वर्ण पदक देकर उनको सम्मानित किया गया और साथ ही 1977 में उन्हें पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया।

महिला उत्थान आन्दोलन की अग्रणी नेता के रूप में भी उनकी सेवाओं को अनेक अवसरों पर मान्यता प्रदान की गयी। उदाहरण के तौर पर वर्ष 1972 में उन्हें अखिल भारतीय महिला सम्मलेन की श्रम समिति का सदस्य चुना गया। वर्ष 1974 में अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन ने महिलाओं के लिए बने पैनल पर उनको नियुक्त किया। वर्ष 1975 में भारत में महिलाओं की स्थिति पर बनी समिति के सदस्यों में से एक थीं। इस कार्य को अत्यंत सफलतापूर्वक अंजाम देने के लिए उन्होंने देश की विभिन्न भागों की यात्राएं की।

1979 में निधन 

मनीबेन जी ने 28 अक्टूबर 1979 को दुनिया से अलविदा कहा। उनकी स्मृति में हिन्द मजदूर सभा द्वारा बम्बई में मनीबेन कारा संस्थान स्थापित किया गया है। यह संस्थान मजदूर आन्दोलन से जुड़े विभिन्न पक्षों के अध्ययन को बढ़ावा देता है। पश्चिमी रेलवे कर्मचारी यूनियन ने भी मनीबेन कारा की स्मृति में मनीबेन कारा फाउंडेशन की स्थापना की। यह फाउंडेशन भी समाज कल्याण व मजदूरों के कल्याण से सम्बंधित गतिविधियाँ संचालित करता है

 










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