लड़कियां घर से नहीं भागती, इस समाज की क्रूर संस्कृति, दमन और घुटन से भागती हैं

हमारा समाज , आधी आबादी, सोमवार , 05-02-2018


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हिमांशु कुमार

भारत में अपने से छोटी उम्र वालों को कमअक्ल समझना हमारी संस्कृति है

हमारे यहां यह माना जाता है कि ज्यादा अक्ल उसी को होती है जो ज्यादा उम्र का होता है

हम घर में अपने से छोटी उम्र के सदस्यों को हमेशा कम अक्ल मानते हैं

हमारे बच्चे हमारे सामने कभी भी बालिग नहीं माने जाते

18 साल का होने के बाद एक व्यक्ति को कानूनन बालिग मान लिया जाता है

लेकिन भारतीय परिवारों में 18 साल का होने के बाद बालिग होने के अधिकार नहीं मिलते

खासतौर से लड़कियों को भारतीय परिवारों में एक बालिग नागरिक के अधिकार नहीं दिए जाते

लडकी कहां जाएगी, कहां नहीं जा सकती, कब जा सकती है, कितने बजे घर लौटना है, किसके साथ घूम सकती है, किसके साथ दोस्ती कर सकती है, किसके साथ प्रेम कर सकती है, किससे शादी कर सकती है, क्या पढ़ाई कर सकती है, वह अपना कौन सा कैरियर चुन सकती है?

यह सब फैसले भारत में माता पिता के रहते हुए उनकी बेटी को लेने का अधिकार नहीं है

मेरी इस बारे में कई माता-पिताओं से बहस हुई है

और भारतीय माता-पिता बड़े फख़्र से कहते हैं कि हम अपने बच्चों को बिगड़ने नहीं दे सकते

भारत में यह माना जाता है कि अगर हमारी संतानें ख़ास तौर से हमारी बेटी अगर अपनी मर्जी से फैसले ले लेगी तो वह बिगड़ जाएगी

और सबसे बड़े आश्चर्य की बात तो यह है कि जिन मां बाप ने खुद प्रेम विवाह किया है

जिन भाई ने खुद प्रेम विवाह किया है या जो भाई मोहल्ले में लड़कियां छेड़ते फिरते हैं

वह भी अपनी बहन को न तो प्रेम करने की इजाजत दे सकते हैं, न दोस्ती की, न अपनी मर्जी से घूमने-फिरने की  

यह सब लड़कियों की भलाई के लिए नहीं किया जा रहा

बल्कि यह मर्दों के अपने वर्चस्व और मर्दवाद की रक्षा के लिए किया जा रहा है

भारत में धर्म और संस्कृति मर्द प्रधान है

यहां यह माना जाता है कि स्त्रियां कम अक्ल और कमजोर होती हैं

औरतों को काबू में रखना और उनके बारे में सारे फैसले करने का अधिकार मर्द को होना चाहिए

भारत में मनुस्मृति में साफ-साफ लिखा है कि स्त्री को बचपन में पिता के संरक्षण में, जवानी में पति के संरक्षण में, और बुढ़ापे में बेटे के संरक्षण में रहना चाहिए 

औरत को कभी भी आजाद नहीं छोड़ना चाहिए

दुनिया में अगर हम देखें तो जिन समाजों में महिलाओं को समान नागरिक माना गया है और संतानों को स्वतंत्रता दी गई है वह समाज विकसित हुए हैं उनमें प्रगति हुई है और वह खुले हुए समाज हैं जिसमें आप सांस ले सकते हैं

लेकिन भारत और बहुत सारे मुस्लिम देश जो धर्म और पिछड़ी संस्कृति के कारण अपनी संतानों को आजादी से अपनी जिंदगी नहीं जीने देना चाहते और उन पर अपना काबू रखना चाहते हैं

उन समाजों में न तो विज्ञान की नई खोजें हो रही हैं

वह समाज सांप्रदायिक नफरत धर्मांधता और पिछड़ेपन तथा क्रूरता का शिकार बने हुए हैं

भारत को एक सांस्कृतिक क्रांति की जरूरत है

अपनी पुरानी सड़ी-गली दकियानूसी मान्यताओं धारणाओं और क्रूर रिवाजों के रहते हुए भारतीय समाज ऐसा ही घुटन भरा समाज बना रहेगा

और हम बच्चों को प्रेम करने के अपराध में उनका गला काटते रहेंगे

भारत में लड़कियां घर से नहीं भागती

लड़कियां इस समाज की क्रूर संस्कृति दमन और घुटन से भागती हैं

और आप तलवारें लेकर उनकी गर्दन काटने के लिए पीछे पीछे भागते हैं

बंद कीजिए यह सब जाहिलपन

एक सभ्य समाज बनिये

खुद पर ध्यान दीजिये 

 

(लेखक प्रसिद्ध गांधीवादी कार्यकर्ता हैं।)










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rehana Tabassum :: - 02-05-2018
Very true...