पद्मावती विरोध के पीछे राजपूत समुदाय की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक कुंठा

विवाद , जयपुर, शनिवार , 20-01-2018


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मदन कोथुनियां

जयपुर। भले ही सुप्रीम कोर्ट ने पद्मावती को रिलीज करने की हरी झंडी दिखा दी है, लेकिन राजस्थान में इसे सिनेमा हालों के पर्दों पर ले जाना सरकार के लिए किसी बड़ी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होगा। जहां सरकार ने इस मसले का हल निकालने के लिए क़ानूनी राय लेनी शुरू कर दी है, वहीं राजपूत समाज ने फिर हुंकार भरने की तैयारी कर ली है। जिसके तहत 24 जनवरी को चित्तौड़ में 1800 महिलाओं के साथ जौहर करने का एलान भी किया गया है।

ट्रेलर लांच के साथ ही विवादों में आई पद्मावती को लेकर बवाल थमने की बजाय और तेज होता जा रहा है। चूंकि रानी पद्मनी का इतिहास राजस्थान से ही जुड़ा है ऐसे में राजस्थान सरकार की मुश्किलें समझी जा सकती हैं। एक ओर फिल्म रिलीज करने को लेकर सुप्रीम कोर्ट का आदेश है, वहीं दूसरी तरह राजपूत समाज इसे लेकर मरने मारने पर उतारू है।

राजपूत करणी सेना ने ऐलान किया है कि अगर पद्मावती रिलीज हुई तो हजारों राजपूत महिलाएं 24 जनवरी को जौहर करेंगी। इस संदर्भ में दावा किया जा रहा है कि 1800 राजपूत महिलाओं ने जौहर के लिए रजिस्ट्रेशन भी करवा लिया है। इस मसले पर कुछ राजपूत युवकों ने 25 जनवरी को लाइव आत्मदाह करने की धमकियां भी सोशल मीडिया पर जारी की है। 

सुप्रीम कोर्ट के फैसले से नाराज करणी सेना ने साफ़ कर दिया कि भले ही 25 जनवरी को फिल्म के रिलीज होने का रास्ता अदालत ने खोल दिया है लेकिन वह रानी पद्मनी की भूमि चित्तौड़ में 24 तारीख को हजारों महिलाओं के साथ जौहर का आयोजन करेगी। जिसके लिए अब तक 1800 महिलाओं ने रजिस्ट्रेशन करवा दिया है, और यदि महिलायें जौहर करेंगी तो राजपूत समाज के करणी सेवक भी मर मिटने के लिए तैयार रहेंगे।

महिलाएं भी उतरी विरोध में।

प्रदेश का राजपूत समाज साल 1987 में सीकर के देवराला में रूपकंवर सती प्रकरण में जश्न मनाता है और न्याय और इंसानियत के लिए शर्मिंदगी का सबब बन चुके देवराला सती कांड के तमाम आरोपियों को अपने समुदाय का बड़ा नेता बना देता है। जो राजपूत आज भी सती और ज़ौहर जैसी इंसानियत के लिए शर्मिंदा परंपराओं पर गौरव करते हैं, उन्होंने आज तक मासूम रूपकंवर से माफ़ी तक नहीं मांगी है। 

दरअसल, पद्मावती के ज़रिये करणी सेना और राजपूत समुदाय के लोगों ने अपनी राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक कुंठा को साधने की कोशिश की है। हम सब जानते हैं कि आज़ादी के बाद राजपूतों की राजशाही चली गई। उनकी आर्थिक और राजनैतिक ताकत में ज़ोरदार गिरावट आई। शिक्षा और नौकरियों में वे तेजी से पिछड़े क्योंकि वक्त के साथ ख़ुद को बदल लेने में वे पीछे रहे। 

सवर्णों के अंदर जहां ब्राह्मणों और महाजन वर्ग की सामाजिक और आर्थिक ताकत आज़ादी के बाद भी कई गुना तेजी से बढ़ी। ब्राह्मण हर राजनैतिक पार्टी के शिखर पर बैठ गये और आरएसएस तो ब्राह्मण संगठन है ही। ब्राह्मणों ने मंदिरों, त्योहारों, व्रतों, यज्ञों, स्कूलों में ब्राह्मणवादी कर्मकांडों के जरीये समाज में और मजबूती हासिल की। ठीक इसी तरह महाजन वर्ग गांधी के स्वदेशी का नारा लगाते हुए और चरखा कातते हुए देखते ही देखते बजाज, बिड़ला, तापड़िया, गोयनका, सिंघानिया जैसे ब्रांड बन गये। कुल मिलाकर सवर्णों के अंदर ब्राह्मण-बनिया जोड़ी मज़े में है। 

लेकिन राजपूतों की राजशाही चली गई। राजपूतों की बड़ी संख्या अब भी गांवों में सबसे ज्यादा हैं। वे शिक्षा के क्षेत्र में ध्यान नहीं दे पाए।  दूसरी तरफ ब्राह्मण-बनिये शहरों में हैं और अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ते हैं। सवर्ण एक तरफ नौकरियों में 50 फीसदी हिस्सा घेर लेते हैं, लेकिन सवर्णों के अंदर यह हिस्सा ब्राह्मण खा जाते हैं और बचा-खुचा राजपूतों को मिलता है।

ले दे के जिस राजपूत समुदाय ने हमेशा अपने हक़ से ज्यादा खाया, अब सवर्णों के अंदर उनकी हालात बहुत पतली है। राजस्थान में भैरोंसिंह शेखावत के बाद पिछले दो दशकों में राजपूत कुंठित हो चुके हैं, वे ब्राह्मण-बनियों से अलग भी नहीं होना चाहते और सीधे-सीधे भिड़ंत भी नहीं चाहते। 

वे आरएसएस और बीजेपी से अंदर ही अंदर मोलभाव कर रहे हैं। वे इस बहाने राजपूतों को एक बार फिर लामबंद कर रहे हैं। वे राजस्थान में अपनी खोई हुई हैसियत के लिए संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन वे सवर्ण गठजोड़ के अंदर अभी बने रहेंगे क्योंकि अभी वे जाति के ज़हर को नहीं जानते और परिपक्व भी नहीं हैं। वे अभी ब्राह्मणवाद के हाथों ओर ठगे जायेंगे।

(मदन कोथुनियां पत्रकार हैं और जयपुर में रहते हैं।)  










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