पकौड़ा है स्टार्ट अप इंडिया के आगे की सोच

आड़ा-तिरछा , , शुक्रवार , 26-01-2018


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बसंत रावत

उन्होंने जो कह दिया है सो कह दिया। सबको यक़ीन कर लेना चाहिए। जिस तरह से उनके जादुई जुमलों पर आंख मूंद कर सबने यक़ीन किया - जैसे अच्छे दिन और हर साल दो करोड़ नयी नौकरियां, किसानों की दुगनी आमदनी वग़ैरा-वग़ैरा आदि ख़ूबसूरत झांसों पर यक़ीन किया था। यक़ीनन सबने बहुत ही हसीन रोमांचक सब्ज़बाग़ देखे थे। अब फिर क्या हो गया। उनकी कही नयी बातें अब क्यों ऊलजलूल लगने लगीं? अब क्यों उनकी बातों पर किसी को परेशानी होनी चाहिए? आज अगर आपको उनकी कही कुछ बातें हज़म नहीं हो रही हों तो -इट इज नॉन ऑफ़ हिज़ बिज़नेस। हां अगर आप बेरोज़गार हैं या कोई कारोबार करते हैं तो आपके काम की बात है। ग़ौर करने लायक। आख़िर वे राजा हैं। हालांकि अपने को प्रधान सेवक कहलाना पसंद करते हैं। और कहते भी हैं। ये उनकी शुद्ध विनम्रता है। 

दर्शनिकों का मानना है कि चाय से इस विनम्रता का कोई गहरा नाता हो सकता है। चाय से उपजी हो सकती है उनके व्यक्तित्व की ये दयालुता। वैसे किसी को कुछ भी नहीं मालूम। लेकिन इस बात को लेकर जानकारों में कोई मतभेद नहीं है कि चाय और पकौड़े का घनिष्ठ सम्बंध है। इसलिए सही समय पर पकौड़ों को लेकर सही बात कही गयी। बात अप्रासंगिक बिल्कुल नहीं थी। हम ही शायद नादान थे जो इतनी सरल और गहरी बात को समझ नहीं पाए। असल में वो तो पकौड़ों का माहात्म्य समझा रहे थे। मगर अनाड़ी नासमझ, जो कभी कुछ समझना ही नहीं चाहते, वे सरेआम उनका मज़ाक़ उड़ाने का लुत्फ ले रहे हैं। ये अच्छी बात नहीं। पूरे राष्ट्र का घोर अपमान हो रहा था। पकौड़ों की बात बाद में करते हैं। 

अब देखिये। उन्होंने जनता के सामन्य ज्ञान की परीक्षा लेने के लिए जानबूझ कर कह दिया देश की 600 करोड़ जनता ने वोट दिया, और देश की जनता जो अपने को जागरूक मानने की ग़लतफ़हमी पाले हुए है वो उन पर टूट पड़ी, खाकर कांग्रेस मानसिकता से ग्रसित मायंड्लेस एक्टिविस्ट। सोशल मीडिया के मुजाहिंदों को इतनी भी बात समझ में नहीं आयी।

उनका मज़ाक़ नहीं उड़ाना चाहिए था। क्योंकि इसमें कोई मजाक वाली बात नहीं थी। फ़्यूचर टेंस में बात कर रहे थे। इतने बड़े अंतर्राष्ट्रीय नेता की खिल्ली उड़ाना अपनी तौहीन करने जैसा है। ये भी हो सकता है उन्होंने क़तई ग़लत बात नहीं कही हो, लोगों ने ही अति उत्साह में ग़लत सुना हो। उनका कोई दोष नहीं। एक सच्चा देश भक्त होने के नाते, उम्मीद की जाती है कि उन्होंने जो कुछ भी कहा उसे आंख मूंद कर, उनके मुख से हुई अमृत वर्षा को ईश्वर का प्रसाद मान कर ग्रहण कर लिया जाए। उस पर विवाद नहीं करना चाहिये। 

कोई नया रसीला जुमला मान कर चुस्की लगा लेनी चाहिए थी। यही वक़्त का तक़ाज़ा है। पर पकौड़ा विरोधी गैंग कहां मानने वाला ! मगर वही हुआ जिसका डर था। सोशल मीडिया के काग़ज़ी विद्रोहियों ने बवाल मचा दिया। जैसे पहली बार कोई इतना बड़ा अधर्म हुआ हो। अरे इन नासमझों को अतिश्योक्ति अलंकार के बारे में कुछ नहीं अता पता। इनका कोई क़सूर नहीं। महा ज्ञानी जूनियर मिनिस्टर सत्यपाल ने इन्हें नहीं बताया होगा। यही दिक़्क़त है। यही तो समझाने, सिखाने की कोशिश हो रही थी। कई बार बातों को महज मनोरंजन के लिए या ध्यान भटकाने के लिए बढ़ा-चढ़ा कर कहा जाता है।

ये एक दूसरा दृष्टिकोण है उनके कथन के बारे में। भाट चारण परम्परा इसी को तो कहते हैं। 600 वोटर वाली बात भी कुछ-कुछ वैसी ही थी। परम्परा का निर्वाह। अब ज़रा पकौड़ों की बात पर फिर से आते हैं। हमारे देश में बेरोज़गारी उन्मूलन में पकौड़ों का योगदान सर्व विदित है। इतनी सी बात को समझा रहे थे। एक महान आर्थिक क्रांतिकारी मौलिक विचार था जो फूट पड़ा था उनकी अलौकिक बुद्धि से। हमें शुक्रगुज़ार होना चाहिए था उस परम पिता परमेश्वर का और उस महान टेलीविज़न ऐंकर का जिसके पूछने पर पकौड़ों का रहस्य खुला। और इस प्रकार देश ने जाना की पकौड़े तलना कितना महान काम है, कारोबार है।

इसमें रोज़गार की अनंत सम्भावनाएं हैं। इसे कोई छोटा काम न समझे। अगले वाइब्रेंट समिट में निवेशकों में होड़ लग सकती है। सरकारी सूत्रों से फेंकू न्यूज़ संवाददाता को मिली गुप्त जानकारी के अनुसार, यदि शीघ्र केंद्र में नया पकौड़ा मंत्रालय खुल जाए तो किसी को कोई हैरानी नहीं होनी चाहिए।

पकौड़ों को लेकर कोई राष्ट्रीय नीति की घोषणा भी देर सेवर हो सकती है। हमें इंतज़ार करना चाहिए। अमेरिकन यूनिवर्सिटी से किसी अर्थशास्त्री की सेवाएं ली जा सकती हैं। कोई फ़ॉरेन इन्वेस्टर पकौड़ा बिज़नेस में निवेश करना चाहता हो तो इजाज़त मिल सकती है बशर्ते उसमें बाबा राम देव का देशी आटा और मैदा का इस्तेमाल हो।

पकौड़ा स्टार्ट अप इंडिया के आगे की सोच है। ये सोच एक जन आंदोलन की शक्ल अख़्तियार कर सकती है। पकौड़ा अगला लोकसभा इलेक्शन का एक मुख्य चुनावी मुद्दा भी बन सकता है। पूरा देश पकौड़ामय हो सकता। एक नया मुहावरा। बेरोज़गारी को समझने और निपटने का नया नज़रिया, एक राष्ट्रीय कार्यक्रम। नासमझों को नहीं समझना है, नहीं मानना है तो कोई बात नहीं। देश आगे बढ़ता रहेगा। मानो या न मानो। उन्हें जो कहना था सो कह दिया।

(बसंत रावत अहमदाबाद में दि टेलीग्राफ के ब्यूरो चीफ रह चुके हैं।)










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