पंधे का मतलब सब कुछ मजदूरों के नाम

हमारे नायक , , रविवार , 27-08-2017


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मसऊद अख्तर

एम के पंधे (1925-2011)
देश की मौजूदा प्रमुखतम ट्रेड यूनियनों में से एक सीटू के संस्थापक सदस्य व नेता डॉ. मधुकर काशीनाथ पंधे का जन्म 11 जुलाई 1925 को पूना (महाराष्ट्र) के एक मध्यवर्गीय परिवार में हुआ था. उनके पिता श्री के.के. पंधे शिक्षा अधिकारी थे और उनकी माता श्रीमती आनंदी बाई एक स्कूल अध्यापिका थीं. उनके पिता का बार-बार स्थानान्तरण होते रहने के कारण मधुकर जी को भिन्न-भिन्न शहरों में पढ़ाई करनी पड़ी और वे मैट्रिक तक 14 विद्यालय बदल चुके थे. उस समय छात्रों और युवाओं में बहुत अधिक राष्ट्रवादी गतिविधियाँ चल रही थीं. मधुकर जी भी इसमें शामिल हो गए. वह उस समय के महान लेखक व स्वतंत्रता सेनानी साने गुरूजी के लेखों से बहुत अधिक प्रभावित थे तथा उनके लेखों से प्रभावित होकर ही पंधे जी का झुकाव सामाजिक गतिविधियों की ओर हुआ. वह नियमित रूप से पुस्तकें पढ़ते थे. स्कूल में उन्हें ब्लैक बोर्ड पर समाचार लिखने का काम सौंपा जाता था, जिससे उन्होंने प्रतिदिन समालोचनात्मक ढंग से समाचार पत्र पढ़ने की आदत विकसित कर ली. वह स्कूल की पत्रिका में लेख भी लिखा करते थे. इसी दौरान कुछ स्कूली अध्यापकों के संपर्क में आने से उनका झुकाव मार्क्सवादी साहित्य की ओर हुआ.
युवा अवस्था से ही मजदूरों से जुड़ गए
1939 में उनके पिता का शोलापुर स्थानान्तरण हो गया जहां बालक मधुकर काशीनाथ ने अपने आपको श्रमिक वर्ग के बीच पाया.वहाँ वे टेक्सटाइल मजदूरों की तरफ आकर्षित हुए और उन्होंने यूनियन के काम के साथ अपने आपको जोड़ लिया. उन्होंने मजदूरों के लिए प्रतिदिन समाचार लिखना शुरू कर दिया. वर्ष 1940 में जलगाँव में हुई कपड़ा मजदूरों की हड़ताल ने मधुकर जी के किशोर मन को काफी प्रभावित किया तथा तभी से ट्रेड यूनियन आन्दोलन की तरफ उनका झुकाव हो गया.
शोलापुर में आकर वह धीरे-धीरे मार्क्सवादी विचारधारा की ओर आकर्षित हुए. वहाँ उन्होंने और उनके कुछ मित्रों ने मार्क्सवादी छात्रों का एक समूह बना लिया. 1942 में इस समूह ने एक छात्र यूनियन बनायी और पंधे जी इस यूनियन के सचिव चुने गए. पंधे जी ने ‘लाल बावटा गिरनी कामगार यूनियन’ के साथ भी काम करना शुरू कर दिया. वह छात्रों के समूह के साथ श्रमिकों के पास जाया करते थे.
43 में बने कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य
पंधे जी 1943 में कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बन गए और वर्ष 1946 में इसकी पूना शहरी समिति के सदस्य चुन लिए गए. उन्होंने कॉलेज की अपनी पढ़ाई जारी रखते हुए 1948 में अर्थशास्त्र विषय के साथ बम्बई विश्वविद्यालय से बी.ए.(ऑनर्स) किया. इसी वर्ष उन्होंने बम्बई में आयोजित एआईएसएफ के सम्मलेन में भी हिस्सा लिया. इसी बीच कम्युनिस्ट पार्टी पर प्रतिबन्ध लगा दिए जाने के कारण इससे जुड़े हज़ारों कार्यकर्ता और नेताओं को जेल में डाल दिया गया. पंधे जी के खिलाफ भी वारंट जारी किया गया था, लेकिन वह भूमिगत हो गए और वर्ष 1951 में उनके जारी वारंट के वापसी होने तक लगभग 27 महीने भूमिगत रहे. इस बीच वह मजदूरों की पोशाक में मजदूरों के बीच घूमते रहते थे. उन्हीं के साथ रहते तथा उन्हें पढ़ाते थे.मजदूरों के साथ रहते हुए उन्होंने मजदूरों के जीवन से सम्बंधित समस्याओं को व्यक्तिगत तौर पर अनुभव किया. मजदूरों के साथ रहने से उन्होंने मजदूरों के मस्तिष्क पर परम्परागत विचारों और धर्म का प्रभाव जानने की समझ भी विकसित कर ली. मजदूरों की अनेक पारिवारिक समस्याएं थीं और पंधे जी ने यह महसूस किया कि इन पहलुओं को ध्यान में रखे बिना मजदूरों की चेतना को जगाना संभव नहीं है. अपने इन अनुभवों के आधार पर उन्होंने टेक्सटाइल मजदूरों पर अनेक पुस्तिकाएं लिखीं.
कई बार हुए अंडरग्राउंड
अपने खिलाफ जारी वारंट वापस ले लिए जाने पर वह शोलापुर में फिर से कपड़ा मजदूरों के बीच सक्रिय हो गए तथा वर्ष 1952 में वह ‘बावटा गिरनी कामगार सभा’ के संयुक्त सचिव चुने लिए गए, जिसका गठन सीपीआई तथा पीजेंट तथा वर्कर्स पार्टी द्वारा संयुक्त रूप से किया गया था. श्री आर.के. खादिलकर जो कि बाद में केन्द्रीय श्रम मंत्री भी बने, उस समय इस यूनियन के अध्यक्ष थे.अपनी ट्रेड यूनियन गतिविधियों के साथ उन्होंने 1953 में एम.ए. अर्थशास्त्र की परीक्षा उत्तीर्ण की. इसी वर्ष उन्होंने पूना के गोखले इंस्टीट्यूट ऑफ़ पॉलिटिक्स एंड इकोनॉमिक्स’ के प्रोफ़ेसर डी.आर. गाडगिल के निर्देशन में पीएचडी करने हेतु पंजीकरण कराया. वर्ष 1954 में पंधे जी गोवा विमोचन समिति की शोलापुर इकाई के सचिव चुने गए तथा उन्होंने गोवा स्वतंत्रता संघर्ष के लिए सत्याग्रहियों के जत्थे का नेतृत्व किया. वह शोलापुर जर्नलिस्ट एसोसिएशन के सचिव भी चुने गए.1953-54 के दौरान उन्होंने मराठी भाषा में प्रकाशित होने वाले ‘एकजुट’ नामक साप्ताहिक पत्र का सम्पादन भी किया. इस पत्र में मजदूर संघर्षों और राजनीति में घटित होने वाली घटनाओं पर खोजपूर्ण रिपोर्ट छपती थीं. राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय होने के कारण पंधे जी अपनी पीएचडी कार्य के लिए अधिक समय नहीं निकाल पाते थे. अतः उन्होंने अपने गाइड प्रोफेसर गाडगिल की सलाह मानते हुए गोखले इंस्टिट्यूट में फ़ेलोशिप लेकर वर्ष 1958 में ‘स्ट्रक्चर एंड फंक्शन ऑफ़ ट्रेड यूनिओंस’ (ट्रेड यूनियन की संरचना और कार्य) विषय पर अपना पीएचडी शोध पूरा किया.
केंद्रीय कार्यालय में अहम किरदार
इसी समय पंधे जी को पार्टी की ओर से एटक के दिल्ली में स्थित केन्द्रीय कार्यालय भेजा गया. कॉमरेड डांगे जो उस समय एटक के महासचिव थे, उनसे कहे कि यह निर्णय उच्च स्तर पर लिया गया है और वे उन्हें एटक के मुख्यालय में देखना चाहते हैं. केन्द्रीय कार्यालय में पंधे जी को ट्रेड यूनियन के स्कूल के लिए पाठ्यक्रम तैयार करने का दायित्व सौंपा गया. उस समय उन्होंने केन्द्रीय श्रमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा बम्बई में आरम्भ किये गए पहले अध्यापक प्रशिक्षण पाठ्यक्रम में भाग लिया. उन्होंने सी.बी.डब्ल्यू,ई. की उपसमिति के लिए अनेक प्रकार का साहित्य तैयार किया. इस पृष्ठभूमि के साथ जब एटक ने 1959 में ‘एन.एम. जोशी स्कूल ऑफ़ ट्रेड यूनियन’ आरम्भ किया तो पंधे जी को इसका निदेशक बनाया गया. इस स्कूल ने देश के विभिन्न राज्यों में एटक के ट्रेड यूनियन के सक्रिय कार्यकर्ताओं के लिए नियमित कक्षाएं चलाना आरम्भ किया. उन्होंने वर्ष 1961 एटक द्वारा चलाये गए ट्रेड यूनियन प्रशिक्षण कार्यक्रम के लिए 30 व्याख्यान भी तैयार किये. वर्ष 1962 में डॉ. पंधे ने ‘वेजिज सिंस इंडिपेंडेंस’ नाम से एक पुस्तिका लिखी, जिसे बाद में सीपीआई ने उसे चुनाव पैम्फलेट के रूप में प्रकाशित किया. इस दौरान भारत सरकार ने अनेक वेतन बोर्ड नियुक्त किए. पंधे जी को इन बोर्डों में ज्ञापन प्रस्तुत करने के लिए सामग्री तैयार करने का दायित्व सौंपा गया. वह एटक के जर्नल ‘ट्रेड यूनियन रिकॉर्ड’ के लिए नियमित रूप से लेख भी लिखा करते थे. इसी बीच 1959 में उन्होंने चेकोस्लाविक ट्रेड यूनियनों के सम्मलेन में भाग लिया, जहां लगभग 60 देशों के प्रतिनिधि आये थे. उन्होंने इस अवसर को उनके साथ विचारों और सूचनाओं का आदान प्रदान करने में इस्तेमाल किया. वर्ष 1960 में उन्हें पूना विश्वविद्यालय द्वारा पीएचडी की उपाधि दी गई. वर्ष 1961 में उन्होंने ‘वर्ल्ड फेडरेशन ऑफ़ ट्रेड यूनियन्स’ द्वारा सामाजिक सुरक्षा पर गठित उप समिति की बैठक में हिस्सा लिया. एटक की तरफ से डॉ. पंधे ने भारत सरकार द्वारा गठित अनेक त्रिपक्षीय बैठकों में हिस्सा लिया.
पार्टी छोड़ने के बाद भी एटक में बने रहे
वर्ष 1964 में कम्युनिस्ट पार्टी का विभाजन होने पर डॉ. पंधे सीपीआई (एम) में शामिल हो गए. उन्हें पार्टी के केन्द्रीय कार्यालय में संसदीय कार्यालय प्रभारी के रूप में काम करने का जिम्मा सौंपा गया. इसके साथ-साथ उन्होंने एटक में काम करना भी जारी रखा. 1964 के अंत में सीपीआई (एम) के अनेक नेता गिरफ्तार कर लिए गए. डॉ. पंधे गिरफ्तारी से बचकर भूमिगत हो गए. उन्हें वर्ष 1965 में पार्टी की भूमिगत लोगों की केन्द्रीय समिति के लिए चुन लिया गया. इसी वर्ष उन्होंने ‘पीपुल्स डेमोक्रेसी’ नाम से एक साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन आरम्भ किया. उनकी गिरफ्तारी का वारंट लगभग 14 महीने बाद 1966 में वापस लिया गया. इसी वर्ष उन्होंने बम्बई में आयोजित एटक के सम्मलेन में हिस्सा लिया और वह एटक के सचिव चुने गए. 1966 से 1976 के बीच एटक के सचिव और पार्टी के संसदीय कार्यालय प्रभारी, इन दोनों ही दायित्वों का निर्वहन किया. इसी बीच उन्हें 1968 में मोदी नगर में कपड़ा मजदूरों पर हुए गोली कांड के सम्बन्ध में हत्या के आरोप में आरोपित कर दिया गया. इस कारण उन्हें फिर से लगभग 15 महीनों के लिए भूमिगत होना पड़ा और भूमिगत तौर पर ही वह पार्टी के संसदीय कार्यालय का दायित्व निभाते रहे. वर्ष 1969 में पार्टी ने डॉ. पंधे से पार्टी के कलकत्ता स्थित मुख्यालय जाने को कहा. वर्ष 1970 में डॉ. पंधे ने एटक की एक बैठक के दौरान किसी मामले पर बहस हो जाने के कारण कार्यसमिति के आठ अन्य सदस्यों सहित मार्च 1970 में गोवा में ट्रेड यूनियन नेताओं की राष्ट्र स्तरीय कन्वेंशन की घोषणा करने के साथ बैठक से बहिष्कार कर दिया. इस कन्वेंशन में 27-31 मई, 1970 के बीच कलकत्ता में राष्ट्रीय सम्मलेन करने का निर्णय लिया गया. मई 1970 में कलकत्ता में हुए सम्मलेन में सीटू के गठन का फैसला किया गया. डॉ. पंधे इस संगठन के सचिव चुने गए. इसी वर्ष सीटू ने डॉ पंधे के सम्पादन में ‘द वोर्किंग क्लास’ नाम से एक जर्नल का प्रकाशन प्रारम्भ किया.
रेलवे सेक्टर में किया काम
वर्ष 1974 में रेलवे कर्मचारियों की व्यापक हड़ताल ने देश की अर्थव्यवस्था को पंगु बना दिया लेकिन हड़ताल को दबा दिया गया. व्यापक पैमाने पर कर्मचारियों को त्रस्त किया जाने लगा. ऐसी स्थिति में डॉ. पंधे ने इन रेलवे कर्मचारियों को कानूनी सहायता प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी. 1975 में आपातकाल की घोषणा के बाद डॉक्टर पंधे को एक बार फिर भूमिगत होना पड़ा. इस दौरान उन्होंने मजदूरों के अधिकारों के साथ की जाने वाली ज्यादती के खिलाफ संघर्ष किया. वर्ष 1977 में डॉ. पंधे स्टील उद्योग की राष्ट्रीय संयुक्त समिति के सदस्य बनाए गए. उसी वर्ष वह बी.एच.ई.एल. के भी संयुक्त समिति के सदस्य बनाए गए. वर्ष 1978 में वह उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पुनरीक्षण समिति के सदस्य बने. इस समिति के द्वारा तैयार रिपोर्ट के बारे में समिति के सदस्य के रूप में उन्होंने अपनी असहमति व्यक्त की. 1978 के बाद से डॉ. पंधे भारतीय श्रम सम्मलेन के सभी सम्मेलनों में शामिल होते रहे हैं. यही नहीं वे आईएलओ के भी अनेक सम्मेलनों में शामिल रहे हैं.
वर्ष 1978 में डॉ. पंधे ने औद्योगिक सम्बन्ध विधेयक के खिलाफ नेशनल कन्वेंशन आयोजित करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की जिसमें सभी ट्रेड यूनियनों ने शिरकत की. उन्होंने 1980 में ट्रेड यूनियनों के उस राष्ट्रीय अभियान समिति के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी, जिसके तहत मजदूर वर्ग के समक्ष आ रहे मुद्दों को उठाते हुए राष्ट्रव्यापी हड़ताल की गयी थी. वर्ष 1982 में डॉ. पंधे को राष्ट्रीय स्तर पर औद्योगिक सम्बन्ध क़ानून का खाका तैयार करने के लिए रामानुजम समिति के लिए नामित किया गया. सरकार द्वारा इस समिति को विस्तार न दिए जाने से इस समिति का कार्य बीच में ही रुक गया. डॉ. पंधे ने इस सम्बन्ध में अपना असहमति नोट दिया. वर्ष 1985 में डॉ. पंधे ने सभी सार्वजनिक प्रतिष्ठानों की यूनियनों को एक साझा मंच प्रदान करने के उद्देश्य से सभी सार्वजनिक क्षेत्र प्रतिष्ठानों की एक समिति के गठन की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की. इसी मंच के तले वर्ष 1986 में सभी सार्वजनिक प्रतिष्ठानों के कर्मचारियों की एक व्यापक हड़ताल हुई और यह मोर्चा इसके बाद भी देश के सार्वजनिक क्षेत्र प्रतिष्ठान के लाखों कर्मचारियों के आन्दोलन को निर्देशित करने में अपनी भूमिका निभा रहा है.
कई फैक्टरियों और कंपनियों में संगठन बनाने का अनुभव
डॉक्टर पंधे हिन्दुस्तान स्टील वर्क्स, भारत रेफ्रेक्ट्रीज, भारत इलेक्ट्रॉनिक्स, एनटीपीसी, पोर्ट तथा डॉक आदि उद्योगों की संयुक्त द्विपक्षीय समिति के सदस्य रह चुके हैं. वर्ष 1981 में इस्पात उद्योग कर्मकार परिसंघ की स्थापना काल से ही वह इसके अध्यक्ष रहे. 1982 से पंधे जी नेशनल शिपिंग बोर्ड के सदस्य हैं. वह इसके अतिरिक्त 1982 से ही अखिल भारतीय कोयला कर्मकार परिसंघ के भी अध्यक्ष रहे. लगभग दो दशकों से अधिक समय तक वह निर्माण कर्मकार परिसंघ के अध्यक्ष रहे हैं और लगभग इतने ही समय तक भारत के जल परिवहन कर्मकार महासंघ के उपाध्यक्ष रहे. डॉ. पंधे ‘वैश्वीकरण और ट्रेड यूनियन अधिकारों पर दक्षिणी पहल’, जिसका मुख्यालय पर्थ (आस्ट्रेलिया) में है, से भी जुड़े रहे. वह ‘सिगटूर’ के जोहान्सबर्ग, कलकत्ता और सियोल में आयोजित सम्मलेन में हिस्सा ले चुके हैं.इस संगठन ने वैश्वीकरण और ट्रेड यूनियन अधिकारों के सम्बन्ध में अनेक पहल की है तथा इसका कार्य विस्तार भारत सहित ऑस्ट्रेलिया, फिलीपींस, दक्षिण कोरिया, दक्षिण अफ्रीका, ब्राज़ील तथा मलेशिया आदि अन्य देशों में है.
डॉक्टर पंधे 1997 से माकपा के पोलित ब्यूरो के सदस्य चुने गए तथा वर्ष 2005 से वह पार्टी के ट्रेड यूनियन की उप समिति जो कि ट्रेड यूनियन मोर्चे पर पार्टी की गतिविधियों को गाइड करने का काम करती है, के संयोजक कि भूमिका निभाते रहे. डॉ. पंधे ने ट्रेड यूनियन आन्दोलन और समसामयिक विषयों पर बड़ी तादाद में लेख और पैम्फलेट तैयार किये. वह 50 से अधिक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों व चर्चाओं में भाग लिए थे.
20 अगस्त 2011 को पंधे का दिल्ली के एक अस्पताल में हृदय गति रुक जाने से निधन हो गया.










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