आदिवासियों के पुश्तैनी अधिकार का शिलालेख है पत्थलगड़ी

धर्म-सियासत , , सोमवार , 30-04-2018


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तामेश्वर सिन्हा

रायपुर। पत्थलगड़ी शब्द से ही स्पष्ट है पत्थल को गाड़ना, आदिवासी समुदाय और गांवों में विधि-विधान-संस्कार के साथ पत्थलगड़ी (बड़ा शिलालेख गाड़ने) की परंपरा पुरानी है। इनमें मौजा, सीमाना, ग्रामसभा और अधिकार की जानकारी रहती है। वंशावली, पुरखे तथा मरनी (मृत व्यक्ति) की याद संजोए रखने के लिए भी पत्थलगड़ी की जाती है। कई जगहों पर अंग्रेजों-दुश्मनों के खिलाफ लड़कर शहीद होने वाले वीर सूपतों के सम्मान में भी पत्थलगड़ी की जाती रही है। पत्थल को जिसमें आदिवासियों के संवैधानिक अधिकार संविधान में निहित है।  

झारखंड- छत्तीसगढ़ के सीमावर्ती पूर्वी क्षेत्र जशपुर, बलरामपुर, में इन दिनों पत्थल गड़ी को लेकर बवाल मचा हुआ है। राजनीतिक हल्के में बयानों की बारिश हो रही है तो मीडिया और भाजपा सरकार इसे गैर संवैधानिक, नक्सल, इसाई मिशनरी से  जोड़ रहा है। दूसरी ओर भाजपा सरकार के नुमाइंदे पत्थल गड़ी के विरोध में सद्भावना यात्रा निकाल कर आदिवादियो के पत्थलगड़ी को उखाड़ रहे है। इन सब के बीच आदिवासी समाज संवैधानिक पत्थल गड़ी को लेकर सीना ताने खड़े हैं। समाज का कहना है पत्थलगड़ी में गैरसंवैधानिक क्या है ? 

28 अप्रैल को आदिवासियों के पत्थलगड़ी करने के विरोध में भाजपा के मंत्रियों द्वारा जशपुर के बछरांव से सद्भावना यात्रा निकाला गया यात्रा के दौरान बुटूंगा गांव में  भाजपा के लोगो ने आदिवासियों के पत्थलगड़ी को तोड़ दिया गया, तोड़-फोड़ मचाने के साथ कई आदिवासी ग्रामीणों के साथ मार-पीट की भी खबर आई। देर रात आदिवासियों ने पत्थलगड़ी के तोड़-फोड़ का प्रशासनिक अमले के सामने अपना विरोध जताया। हालांकि मीडिया में यह अफवाह खबर बनी कि आदिवासियों ने प्रशासनिक अमले को बंधक बना लिया है। आदिवासियों ने मांग रखी कि पत्थर गड़ी को तोड़ने वालों के खिलाफ अपराध दर्ज किया जाये और अपराधियों को गिरफ्तार किया जाये। पत्थर को दुबारा उसी स्थिति मे गाड़ा जाये। जिला शासन ने पत्थर को गाड़ने के खिलाफ जो नोटिस दिया है उसे तुरंत वापस लिया जाये।

आदिवासियों के पत्थलगड़ी को तोड़ने के साथ आदिवासी ग्रामीणों के साथ मार-पीट

आप को बता दे कि पत्थलगड़ी करने के विरोध में जब भाजपा के लोग जात्रा निकाल रहे है और इस जात्रा से आदिवासी नाराज हैं तो फिर इस जात्रा को प्रशासन द्वारा अनुमति कैसे दी गई? सवाल यह खड़ा हो रहा है कि सरकार, प्रशासन या आदिवासी सद्भावना कौन बिगाड़ रहा है ? एक जानकारी के अनुसार इस घटना के बाद क्षेत्र के कई लोगों से पुलिस ने पूछताछ की है। सूत्रों से यह भी खबर है कि कई ग्रामीणों के ऊपर गंभीर धाराओं के तहत अपराध दर्ज किया है। कुछ की गिरफ्तारियां भी की गई है। लेकिन पुलिस इन सब मामलों में कुछ कहने से बच रही है। 

आदिवासियों में पत्थलगड़ी का इतिहास पुराना है। बस्तर के संदर्भ में बात करे तो पत्थलगड़ी को गोंडी भाषा मे गाता कल कहा जाता है। आदिवासी समाज की पीढ़ी व माटी की स्वामित्व की पहचान कायम रख कर पीढ़ियों की गिनती जानने की प्रथा है जो हजारों वर्षों से निरंतर चली आ रही है। वही संवैधानिक अधिकारों को लिख कर बस्तर में पत्थलगड़ी की बात करें तो 6 अक्टूबर 1992 को इसकी शुरुआत हुई थी । करीब 25 साल पहले आदिवासियों ने स्टील प्लांट के खिलाफ एक आंदोलन किया था। इसके बाद यह (मंदिर) गुड़ी स्थापित हुआ। जब इस गुड़ी की आधारशिला रखी गयी थी तब से ग्रामीण इसे ही गुड़ी समझते हैं और इसकी पूजा (सेवा) करते हैं। छत्तीसगढ़ समेत अब देश के अन्य अनुसूचित क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी, अब पांचवीं अनुसूची क्षेत्र के संवैधानिक प्रावधान लिखित पत्थलगड़ी लगा रहे हैं। 

जशपुर क्षेत्र के युवा आदिवासी सामाजिक कार्यकर्ता प्रवीण भगत पत्थलगड़ी के इतिहास को लेकर कहते हैं कि पत्थलगड़ी उन पत्थर स्मारकों को कहा जाता है जिसकी शुरुआत इंसानी समाज ने हजारों साल पहले की थी। यह एक पाषाणकालीन परंपरा है जो आदिवासियों में आज भी प्रचलित है। माना जाता है कि मृतकों की याद संजोने, खगोल विज्ञान को समझने, कबीलों के अधिकार क्षेत्रों के सीमांकन को दर्शाने, बसाहटों की सूचना देने, सामूहिक मान्यताओं को सार्वजनिक करने आदि उद्देश्यों की पूर्ति के लिए प्रागैतिहासिक मानव समाज ने पत्थर स्मारकों की रचना की। झारखंड के मुंडा आदिवासी समुदाय में कई अवसरों पर पत्थलगड़ी करने की परंपरा आज भी प्रचलित है।

पत्थलगड़ी एक पाषाणकालीन परंपरा

पत्थलगड़ी (मेगालिथ) यानी हजारों वर्ष पुराने, प्रागितैहासिक काल में स्थापित किए गए पत्थर स्मारक। ये कई तरह के होते हैं। जैसे पुरखा आत्माओं की स्मृति एवं सम्मान में खड़े किए गए पत्थर (ससनदिरि), प्राचीन निवास क्षेत्रों के सीमांकन व बसाहट की सूचना देने वाले पत्थर (बुरुदिरि) और राजनीतिक अधिकार (टाइडिदिरि) एवं सामाजिक दिशा-निर्देश संबंधी घोषणाओं को सार्वजनिक तौर पर अभिव्यक्त करने वाले पत्थर (हुकुमदिरि)। पुरखा मृतकों के सम्मान में जहां पत्थर खड़े और सुलाकर रखे जाते हैं मुंडा परंपरा में उसे ‘ससनदिरि’(कब्रगाह) कहा जाता है। कोई भी मुंडा व्यक्ति चाहे वह दुनिया के किसी भाग में चला गया हो और वहीं मर गया हो, तब भी दाह-संस्कार के बाद उसकी हड्डियां और मिट्टी उसके मूल पुरखा ससनदिरि में ही लाकर दफनाने की परंपरा है। इस संस्कार को मुंडा लोग ‘हड़गड़ी’ कहते हैं।

झारखंड की राजधानी रांची से लगभग 70 किलोमीटर की दूरी पर रांची-टाटा मार्ग पर सोनाहातु प्रखंड में अवस्थित चोकाहातु गांव का ‘ससनदिरि’14एकड़ की जमीन पर फैला है। इसमें करीब 8 हजार पुरखा स्मृति पत्थर हैं। इस विशाल प्राचीन मुंडा मेगालिथ क्षेत्र की पहली सूचना एक अंग्रेज अधिकारी टी. एफ. पेपे ने कर्नल डाल्टन को 1871 में दी थी। यह ‘ससनदिरि’कम से कम तीन हजार सालों से मुंडा आदिवासी समाज की जीवित परंपरा का अंग है। आज भी यहां मृतक दफनाए जाते हैं और आत्माओं की स्मृति में पत्थर रखे जाते हैं।

‘टाइडिदिरि’पत्थलगड़ी मुंडाओं की परंपरागत प्रशासनिक और राजनीतिक व्यवस्था का अंग है। मुंडा वाचिक इतिहास के अनुसार झारखंड क्षेत्र में सबसे पहली राजनीतिक पत्थलगड़ी हजारों साल पहले रिसा मुंडा ने की थी। रिसा मुंडा को मुंडारी समाज अपना पूर्वज मानता है जिसने झारखंड को रहने के लिए चुना और यह क्षेत्र मुंडाओं का है इसकी घोषणा उमेडंडा (आज के रांची का बूढ़मू प्रखंड का गांव) में टाइडिदिरि-पत्थलगड़ी करके की। दूसरा ऐतिहासिक टाइडिदिरि की स्थापना पहली शताब्दी से पूर्व रांची से करीब 17 किलोमीटर की दूरी पर स्थित गांव सुतियाम्बे (वर्तमान का पिठोरिया) में मदरा मुंडा ने की थी। तब से टाइडिदिरि खड़ा करने की यह परंपरा चली आ रही है जो प्रत्येक मुंडा गांव में उनके प्राचीन और परंपरागत हक-हकियत की सार्वजनिक उद्घोष है।

तीसरे प्रकार की पत्थलगड़ी ‘हुकुमदिरि’है। पत्थलगड़ी की इस परंपरा का आरंभ संभवतः औपनिवेशिक अंग्रेजी काल में हुआ। सामान्य अथवा विशेष परिस्थितियों के दौरान जब कोई खास सामाजिक-राजनीतिक निर्णय आदिवासियों ने स्वयं लिया, या फिर युद्ध अथवा वार्ता के फलस्वरूप कोई फैसला उन्होंने स्वीकार किया, तब उसकी सार्वजनिक घोषणा के रूप में ‘हुकुमदिरि’गाड़े गए। ताकि मुंडा समुदाय का हर सदस्य नये हुकुम और दिशानिर्देशों को माने और उसे अपनी सामाजिक एवं प्रशासनिक व्यवहार का अंग बनाए।

इससे स्पष्ट होता है कि पत्थलगड़ी मुख्य रूप से आदिवासियों का धार्मिक-सांस्कृतिक, सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक-प्रशासनिक इतिहास, अभिलेख, संविधान और पट्टा है जो उनके समाज को आदिवासियत के सामूहिक, सामुदायिक व सहजीवी उसूलों पर कायम रहने के लिए दिशानिर्देशित और अनुशासित करता है। पत्थलगड़ी उनके पुरखा स्मृतियों को जीवित और रहवास क्षेत्रों पर पारंपरिक अधिकारों को बहाल रखने की ऐतिहासिक सचेतनता को बनाए रखता है। वर्तमान में जो पत्थलगड़ी झारखंड के खूंटी जिला के मुंडा और सिंहभूम के ‘हो’ आदिवासी गांवों में हो रही है उसकी जड़ें पत्थलगड़ी की इसी ऐतिहासिक परंपरा से जुड़ी है। जिसे हम प्रशासनिक पत्थलगड़ी की परंपरा ‘टाइडिदिरि’ अथवा ‘हुकुमदिरि’ के अंतर्गत रख सकते हैं।

पत्थलगड़ी को भी ‘देशद्रोही’‘गैर-संवैधानिक’बताने का प्रयास शुरू हो चुका है। पर सरकार भूल रही है कि 1880-90 के आसपास मुंडा आदिवासियों ने कोलकाता के बड़ा लाट साहब के बंगले में पत्थलगड़ी कर उन्हें समझाने का आखिरी प्रयास किया था कि उनके जमीनों की लूट और शोषण को तुरंत रोका जाए। तब ब्रिटिश वायसराय और उनके अमलों को पुरखा पत्थरों की भाषा समझ में नहीं आई। नतीजतन उसके 10-20 साल बाद 1900 में बिरसा मुंडा के नेतृत्व में आदिवासियों ने उलगुलान (ब्रिटिश शासन के खिलाफ युद्ध) किया।

पत्थलगड़ी मुख्य रूप से आदिवासियों का धार्मिक-सांस्कृतिक, सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक-प्रशासनिक इतिहास, अभिलेख, संविधान और पट्टा है जो उनके समाज को आदिवासियों के सामूहिक, सामुदायिक व सहजीवी उसूलों पर कायम रहने के लिए दिशानिर्देशित और अनुशासित करता है।

पत्थलगड़ी उनके पुरखा स्मृतियों को जीवित और रहवास क्षेत्रों पर पारंपरिक अधिकारों को बहाल रखने की ऐतिहासिक सचेतनता को बनाए रखता है। वर्तमान में जो पत्थलगड़ी झारखंड के खूंटी जिला के मुंडा और सिंहभूम के ‘हो’आदिवासी गांवों में हो रही है उसकी जड़ें पत्थलगड़ी की इसी ऐतिहासिक परंपरा से जुड़ी है।पत्थलगड़ी एक रूढ़िवादी व्यवस्था का अभिन्न अंग है और इसके जरिए गांव के लोगों को स्वशासन के लिए जागरूक किया जा रहा है।

बटूंगा गांव के फिलमोन एक्का ने बताया कि संवैधानिक शिलालेख पत्थलगड़ी का संबंध पार्टी या धर्म विशेष से कोई संबंध नहीं है। संवैधानिक शिलालेख पत्थलगड़ी के विरुद्ध में जो सद्भावना रैली का आयोजन किया था उस दिन संवैधानिक शिलालेख पत्थलगड़ी के समर्थकों के द्वारा किसी भी शासकीय कर्मचारियों को बंधक नहीं बनाया गया था बल्कि उनसे वार्तलाप करके यह जानने की कोशिश की जा रही थी कि आखिरकार संवैधानिक शिलालेख पत्थलगड़ी को कतिपय पार्टी के लोगों के द्वारा क्यों तोड़ा गया है? जबकि संवैधानिक शिलालेख पत्थलगड़ी में संविधान के अनुच्छेद को ही अंकित किया गया था और घटनास्थल पर मौजूद पुलिस प्रशासन से सुरक्षा के गारंटी की मांग की जा रही थी। सद्भावना रैली तो एकमात्र बहाना था असल उद्देश्य तो पत्थलगड़ी के द्वारा संविधान के अनुच्छेद एवं माननीय सुप्रीम कोर्ट के द्वारा किए गए फैसले को लिखे गए शिलालेख को तोड़कर अराजकता की स्थिति निर्मित करना था। संवैधानिक शिलालेख पत्थलगड़ी तोड़ते समय पुलिस प्रशासन चुप्पी साध रखी थी और तोड़ने का काम पुलिस की मौजूदगी में ही किया गया है। अंत में प्रशासन जब किसी योजनाओं की जानकारी देने के लिए साइन बोर्ड लगवाती है तो वह संवैधानिक है और जब Tribal community 5th Schedule एरिया एवं अपने अधिकारों के प्रति जागरूक करने के संवैधानिक शिलालेख पत्थलगड़ी जैसे संवैधानिक कार्य कर रहे हैं तो वह कतिपय लोगों के नजर में असंवैधानिक कैसे है? 

सर्व आदिवासी समाज ने पत्थलगड़ी को अपना संवैधानिक अधिकार बताया है। माना जा रहा है कि आदिवासी ने एक तरह सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलने की तैयारी कर ली है। छत्तीसगढ़ में ऐन चुनावी साल में पत्थलगड़ी बड़ा मुद्दा बनते नजर आ रहा है। सर्व आदिवासी समाज ने पत्थलगड़ी के समर्थन में एक सम्मेलन कर कहा कि सरकार हमें नक्सली बताने में तुली है हम डरेंगे नहीं। पत्थलगढ़ी की आड़ में भाजपा अपने साम्प्रदायिक एजेंडे के तहत मिशनरियों को बदनाम करने की कोशिश कर रहा हैं। पत्थलगढ़ी कोई अचानक हुई घटना नही हैं बल्कि आदिवासी समाज के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय के विरोध स्वरूप एवं संविधान प्रदत्त संरक्षण की सतत अवहेलना का परिणाम हैं। इसलिए आज आदिवासी समाज स्वयं संविधान की व्याख्या कर प्रतिरोध जाता रहा हैं।

बलरामपुर जिला परसा पानी गांव में पहला पत्थलगड़ी आदिवासियों ने किया था। जिसमें भाजपा के नेता और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजातीय आयोग के अध्यक्ष नंदकुमार साय ने इसका उद्घाटन किया था। कांग्रेस पार्टी से अमरजीत भगत ने कहा कि पत्थलगढ़ी आदिवासियों के अधिकारों के साथ हो रही कटौती और अत्याचार का परिणाम है। भाजपा के नेता ही उद्घाटन और भाजपा के नेता ही विरोध करते हैं। इससे प्रदेश में कानून व्यवस्था खराब हो रही है।

राज्य सरकार हमेशा आदिवासी, किसान हितैषी होने का दावा करती हैं लेकिन सच्चाई यह हैं कि अनुसूचित क्षेत्रो में औधोगिक व खनन परियोजना की स्थापना के पूर्व पेसा कानून अनुसार ग्रामसभा की सहमति के प्रावधान की लगातार धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। अडानी जैसी कंपनियों के लिए प्रशासनिक अधिकारियों के द्वारा जबरन ग्रामसभाओं से प्रस्ताव पारित करवाये जा रहे हैं। वनाधिकार मान्यता कानून के तहत व्यक्तिगत और सामुदायिक वनाधिकरों की मान्यता की प्रक्रिया को पूरे प्रदेश में अघोषित रूप से बंद कर दिया गया हैं।

आज भी लाखों लोग अपने जंगल जमीन के दावा फार्म को जमा नहीं कर पाए हैं। जिन ग्रामीणों ने दावा फार्म जमा किये हैं उनमें भी बिना किसी सूचना के 60 प्रतिशत दावे राज्य सरकार ने निरस्त कर दिए हैं। सामुदायिक वनाधिकार की मान्यता का तो सिर्फ मजाक बना दिया गया हैं। वर्ष 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून में जमीन के चार गुणा मुवावजा राज्य में एक गुणा कर दिया गया जिससे कंपनियों को सस्ती दर पर जमीन मिल सके । छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण से ही प्रदेश के आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों की धज्जियां उड़ाकर उनके जंगल जमीन को कार्पोरेट को सौपने का कार्य राज्य व केंद्र सरकारों द्वारा किया जा रहा हैं। रमन सरकार के पिछले 15 वर्षो के कार्यकाल में आदिवासी क्षेत्रों की संवैधानिक व्यवस्था को पूर्णतः ही दरकिनार कर पेसा कानून का सतत उल्लंघन किया गया हैं। राज्य सरकार की इस जन विरोधी नीतियों के खिलाफ पूरे प्रदेश में आदिवासी, किसानों के बीच व्यापक आक्रोश व्याप्त हैं।










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Fedrick Minj :: - 05-04-2018
Very good

??????? ?????? :: - 05-01-2018
बहुत बढ़िया

Rupesh Oraon :: - 05-01-2018
Hamara muul adhikaar hai pathalgadi ham ise pura kar ke rahenge