फूलन और गांधी के हत्यारों का जयघोष

आड़ा-तिरछा , , शनिवार , 18-11-2017


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वीना

गांधी जी अहिंसा के बल पर स्वर्ग में दाखि़ल हुए और फूलन देवी ने अपने मानव अधिकारों के हनन की एवज में जबरन अपने हक़ में स्वर्ग का द्वार खुलवा लिया। जाति-धर्म-कर्म के आधार पर अपने बहीखातों को पालने-पोसने वाले चित्रगुप्त की फूलन के सामने एक न चली। फूलन के तर्क की आक्रामकता ने चित्रगुप्त के धर्म की परिभाषा बदल कर रख दी। चित्रगुप्त को पसीने आ गए ये सोच कर कि इस विद्रोही दस्यु सुंदरी फूलन के तेवरों का हमारी गुलाम अप्सराओं पर क्या असर होगा!

इधर स्वर्ग में भी अहिंसा की लाठी थामने वाले गांधी जी अब तक फूलन से नज़र चुराते, राह बदलते फिर रहे हैं। चित्रगुप्त और फूलन देवी की सारी वार्ता सुन कर गांधी जी कांप गए। कोई औरत इतनी हिंसक हो सकती है! उन्हें यकीन न होता था। फूलन उनके राम राज्य की महिला तो नहीं। पर क्या वो पुरुष उनके इस राम राज्य में कोई जगह रखते हैं? जिन्होंने फूलन को ‘‘दस्यु सुंदरी फूलन’’ बनाया।

गांधी जी फूलन का सामना करने से डरते थे। डरते थे कि कहीं फूलन की आपबीती उनसे फूलन की हिंसा का समर्थन न करवा दे। और अहिंसा के लिए जाने जाने वाले गांधी जी अपनी पहचान से हाथ धो बैठे। मेरे राम राज्य की गऊ औरत तो बलात्कार सहती है, चुप रहती है या फिर बलात्कार को माथे-शरीर का कलंक समझ कर खुद को मिटा देती है। 

और ये फूलन! इसने जिस्म पर बार-बार लगाए जाने वाले कलंक को घाव समझ कर झटक दिया। नारी मुक्ति के इस रूप की उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी। फूलन वो औरत है जिसने नारी मुक्ति संदेश न किताबों से रटे न महापुरुषों से गुरुदक्षिणा में पाए। वो उन स्कूलों में नहीं गई थी जहां आज़ादी का सबक सिखाने की आड़ में जाति-धर्म, रूढ़ियों-परंपराओं का गुलाम बनना सिखाया जाता है। जहां हिंसा की छड़ी से बच्चों की कमर लाल करते मास्टर जी अहिंसा के दूत गांधी जी का पाठ पढ़ाते हैं। वो उनमें से थी जो प्रकृति के बराबरी के मंत्र को बगैर किसी जतन समझ लेते हैं।

बीहड़ों में तो नहीं पर संसद पहुंचने पर फूलन भी गांधी जी के बारे कुछ-कुछ जान गई थी। गांधी जी - चरखा चलाने वाले, अहिंसा के पुजारी, ‘‘बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो, बुरा मत कहो’’ वाले तीन बंदरों के मालिक गांधी जी। चश्मे-धोती वाले अधनंगे गांधी जी को अब वो भी पहचानती थी। स्वर्ग पहुंची तो समझ नहीं पाई कि गांधी जी उससे कन्नी क्यों काट रहे हैं। 

फूलन उनसे पूछना चाहती थी कि लंगोट वाले बाबा, जब आपने बंदरों को इतनी अच्छी-अच्छी बातें सिखाई तो इंसानों को क्यों छोड़ दिया? तुम्हारे बंदरों की सीख उन ठाकुरों के पास भी होती तो क्या आज मेरा ये हाल होता जो हुआ है? फूलन को ये पता नहीं था कि बापू जी औरत को औरत ही समझते हैं। पर बापू जी ने पहले ही दिन ताड़ लिया था कि फूलन खुद को इंसान समझती है। ‘‘बलात्कार किए गए अपने शरीर से औरत को घृणा करनी चाहिये,’’ पुरुष षड्यंत्र का ये अस्त्र उस पर काम नहीं आया। 

आज फूलन ने ठान लिया है कि वो गांधी जी को बचकर नहीं जाने देगी। इधर धरती पर चल रहे पद्मावती के बवाल, गोडसे के मंदिर और राम नाम के व्यापार से दुखी गांधी जी दूर एक बेंच पर अपने आप में डूबे बैठे हैं। बहुत देर बाद अपनी झुकी गर्दन को ऊपर उठा जब गांधी जी चलने को उठे तो सामने फूलन को पाया। फूलन की आंखों में सवाल, बेचैनी, शिकायतों के भाव देख गांधी जी समझ गए कि आज बचना मुश्किल है। सो फिर से बैठ गए। और फूलन को भी बैठने का इशारा किया।

फूलन कुछ देर गांधी जी के कुछ कहने का इंतज़ार करती रही। जब वो कुछ न बोले तो फूलन ने उनकी तरफ देख कर कहा- ‘‘गांधी जी, आप जो शायद मुझे बात करने के काबिल भी नहीं समझते, देखिये, आज अनपढ़, हत्यारी दस्यु सुंदरी फूलन देवी और ज्ञानी, अहिंसा के पुजारी, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी एक ही तराजू में लाकर पटक दिए गए हैं।’’

गांधी जी ने एक नज़र फूलन पर डाली और फिर गर्दन झुकाकर बैठ गए।

फूलन ने फिर कहा - ‘‘फूलन की हत्या हो गई। पर उसका हत्यारा कोई नहीं है। शेर सिंह राणा जो आपकी अहिंसक अदालतों में जाकर कहता है कि मैंने फूलन को नहीं मारा। बाहर जाकर फूलन का संहारक बनकर गले में मालाएं डलवाता है। ठाकुरों की हत्या करने वाली मैं हत्यारी और मेरी हत्या करने वाला वीर। क्यों गांधी जी? क्योंकि मैं आपके समाज की छोटी जाति की औरत थी। जिसे ठाकुरों का बलात्कार प्रसाद समझ कर सिर माथे लगाना चाहिये था? 

जीते जी शरीर और हत्या के बाद आत्मा के इस अपमान ने मुझे बहुत दुखी किया था गांधी जी। पर सच कहूं तो अब मुझे आपका हाल देख कर हंसी आ रही है। मेरा हत्यारा पकड़ा गया पर अभी तक हत्यारा साबित नहीं हुआ। आपका हत्यारा पकड़ा गया साबित हुआ फांसी हुई। पर फांसी के बाद भी वो बरी कर दिया जाएगा। देश के लिए जान दांव पर लगाने वाला शूरवीर कहलाएगा।

मैं कौन मेरी औकात क्या? आपके राम राज्य के वंशजों ने तो आपको भी नहीं बख्शा! मेरी तरह कोई विद्रोह न करे इसलिए मेरे गांव, मोहल्ले में मेरे हत्यारे की मूर्ति लगाकर राजपूत उसकी पूजा करते हैं। पर गांधी जी, आपके हत्यारे गोडसे का मंदिर? किस लिए? अगर आपका हत्यारा देशभक्त है तो आप क्या हैं? 

गांधी जी गर्दन नीची किए ज़मीन पर लाठी ठोके जाते हैं पर कुछ कहते नहीं। और फूलन है कि चुप नहीं होती। उसने फिर कहा - ‘‘धरती पर आजकल किसी फिल्म में रानी पद्मावती के किरदार को दरबार में छोटा ब्लाउज पहनाकर नचवाने को लेकर घमासान मचा हुआ है। रानियां दरबार में घूमर नहीं करतीं। छोटी कोटी नहीं पहनतीं। ये रानियों का अपमान है। रानी-महारानी से लेकर हर जाति-धर्म की औरत इस अपमान पर आगबबूला है। सुना है रानी पद्मावती एक काल्पनिक कथा की राजपूतानी हीरोइन है। किसी लेखक की कलम ने उसे जनम दिया और जौहर करवाया। 

दिन-रात लगातार एक के बाद एक न जाने कितने तथाकथित राजपूतों ने मेरा बलात्कार किया। और फिर नंगी कर पूरे गांव के सामने घुमाना। क्या ये जायज था? न उस वक्त उस गांव की महिलाएं मेरे अपमान पर कुछ बोलीं न आज तक देश की महिलाओं ने मेरा साथ दिया। क्योंकि मैं नीची जाति की थी? सुना है मेरे कातिल पर सभाओं में महिलाएं फूल बरसाती हैं। पद्मावती की आत्महत्या गौरव की बात है, और फूलन का प्रतिशोध घृणा की मिसाल?

गांधी जी न फूलन की तरफ देख पा रहे हैं न कुछ कह पा रहे हैं। जो फूलन के साथ हुआ। न हुआ होता और जो आज उनके और राम के नाम के साथ हो रहा है न हो रहा होता तो गांधी जी पद्मावती के जौहर की कथा को हिंसा पर अहिंसा की जीत बता कर पैरवी कर रहे होते शायद। पर आज उनकी अहिंसा की लाठी और इंसानियत के पैरोकार उनके बंदर संघ, योगी-मोदी समर्थित करणी सेना के कब्जे में हैं। फूलन से कुछ कहें भी तो कैसे?

(वीना पत्रकार और फिल्मकार हैं।)










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J L Chavda :: - 11-21-2017
Encouraging story by Vina .Congratulations

Mahesh bhartiya :: - 11-18-2017
Nice ....*****

Umesh Nazir :: - 11-18-2017
बहुत ही बेहतर औऱ समसामयिक टिप्पणी है, जिसके कई पाठ संभव हो सकते हैं औऱ हर पाठ अपने-आप में मुक्कमल है।