रौशनी को आइसक्रीम की जगह ठेंगा , फिर भी मेरा बजट महान

आड़ा-तिरछा , , रविवार , 03-02-2019


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वीना

संसद में अस्थाई वित्तमंत्री पीयूष गोयल अपने अंतरिम यानी मन बहलाऊँ बजट का बहीखाता बांच रहे थे। जब मध्यम वर्ग को खुश करने वाली घोषणा की गई तब  बाप बेटे की शादी में घोड़ी के आगे मगन होकर नाचने वाले बाप की तरह सेंसेक्स 400 पॉइंट उछला।

और जब किसानों को बहलाने या कहें मूर्ख बनाने के लिए हर साल 6 हज़ार रुपये देने की बात कही गई तो सेंसेक्स भाईसाब की नानी मर गई। और तुरंत 200 पॉइंट नीचे गिर कर शोक मनाने लगा।

"ए रोसनी तोपै कोई पइसा है?" (रौशनी तेरे पास कुछ पैसे हैं?) धूल से लिपटा चेहरा, सिर पर रखी घांस की गठरी के नीचे से झाँकता फटा दुपट्टा और जगह-जगह थेगड़ी (पैच) लगे मैले-कुचैले कमीज सलवार पहने क़रीब 12-13 साल की लड़की ने झेंपते हुए  सहेली रौशनी से  सवाल किया। 

और अपनी सहेली के ही दरिद्र हुलिए वाली रौशनी ने खिसियाते हुए आइसक्रीम वाले की तरफ देखकर कहा -"ना, आज तो ना है मोपै" (नहीं, आज तो मेरे पास नहीं है)

आइसक्रीम वालों ने दोनों को ऊपर से नीचे तक देखा और खामखाह वक़्त बर्बाद कर रही हैं के अंदाज़ में गर्दन झटक कर आइसक्रीम की साईकिल आगे बढ़ा दी।

दोनों लड़कियां सिर पर रखे बोझ को भूलकर देर तक आइसक्रीम वाले की साईकिल पर रखे आइसक्रीम के खोके को ललचाई आंखों से देखती रहीं। और मन ही मन ये तय करती रहीं कि अगर उनके पास पैसे होते तो वो कौन सी आइसक्रीम लेतीं। जीभ और होंठ लाल कर देने वाली लाल या मज़ेदार मलाई के स्वाद वाली सफ़ेद।

और जब आइसक्रीम वाला बहुत दूर निकल गया तो दोनों की पसंदीदा आइसक्रीम का रंग खंजर की तरह उनके सीने में उतर गया। अपने फटे दुपट्टों से दोनों ने आइस्क्रीम के स्वाद से  ललचाए मुंह को पोंछा और घास की गठरी का बोझ जो पहले से अब कुछ ज़्यादा भारी लग रहा था उठाए हुए अपनी रोज़ की राह चल दीं।

ये वही राह थी जहां वो आज की तरह आइसक्रीम वाले को कहती हमें भी एक-एक आइसक्रीम दे दे। और आइसक्रीम वाला उन पर हिकारत की नज़र डाल कर लताड़ते हुए पूछता - "पैसे हैं?" और उन्हें फिर वैसे ही आइसक्रीम की मृगतृष्णा का घाव लिए जाना होगा जैसे आज चली दोनों।

रौशनी और उसकी सहेली समाज में तथाकथित नीच कहे जाने वाले भूमिहीन पिताओं की बेटियां थीं। जो अपने जानवरों के लिए ज़मीदार किसानों के खेतों-मेढ़ों से कभी चोरी-छुपे, कभी इजाज़त लेकर घास काटकर घर ले जाया करती थीं।

ये हिंदू-स्थान की उस गलीच जाति-व्यवस्था का हिस्सा थीं जो देखने में ज़रूर इंसानों जैसी लगती थीं पर अक्सर जानवरों से भी बदतर हालात में रहना पड़ता था। और यही इनकी ज़िन्दगी के लिए भला समझा जाता था। आइसक्रीम की चाहत इनकी हिमाक़त थी।

ये वाकया करीब 50 साल की उम्र गुज़ार चुका है। मेरे पिता इसके आँखों देखें गवाह थे जो दोनों लड़कियों की बेबसी और इच्छा को हँसते और रोते हुए सुनाया करते थे। वो इस बात पर हंसते थे कि दोनों को पता था कि उनके पास पैसे न आज हैं न कल होने वाले हैं। फिर भी एक दूसरे से पूछकर आइसक्रीम वाले को ये जताना चाह रही थीं कि जैसे अक्सर उनके पास होते हैं बस आज ही नहीं है। और शायद उनकी बात में आकर आइसक्रीम वाला आइसक्रीम देते हुए कहे - चलो कोई बात नहीं आज आइसक्रीम खा लो कल पैसे दे देना।

वो बच्चियां ये जानने की उम्र में नहीं थीं की आइसक्रीम वाले के लिए उधार की ज़मानत उनके बोल नहीं हुलिया है। और वो हुलिया उधारी चुकाने के बदले ठेंगा दिखा रहा था।

आज किसानों की हालत रौशनी वाली है। ये वही मुल्क़ है जहाँ संविधान तो समाजवादी घोषित हो चुका है। पर पूँजीवाद सामन्तवाद का पल्ला अपने थ्री पीस सूट में बांधे घूम रहा है।

संविधान कह रहा है कि हर क़ीमत पर रौशनी और उसकी सहेली को आइसक्रीम मिलनी ही चाहिए। पर अम्बानी-अडानी, टाटा-बिड़ला आदि-आदि जमात चीख़ रहे हैं - "वॉट रबिश" देश के लिए बढ़ती जनसंख्या अच्छी बात नहीं। ये रौशनी-फोशनी को आइसक्रीम नहीं गोली खिलाओ।  रौशनी एंड परिवारों की जगह पर किसानों को लाओ। इन्हें किसी भी प्रकार की लॉलीपॉप देना हमें मंज़ूर नहीं। इनके खेत-खलियान हमारे हवाले करो। हम मज़दूरी देंगे इन्हें। 6 या 18 हज़ार रूपये इन पर यूँ ही बर्बाद करने का क्या मतलब?

और फिर धूर्त धनपशु बाज़ीगारों ने चेतावनी दी -  मारो-पीटो, जात-धर्म के नाम पर इनसे एक-दूसरे का ख़ून करवाओ, जो भी करो - इट्स योर जॉब" हमें ज़मीन का मालिक किसान नहीं, मज़दूर-किसान चाहिए। मज़दूर- किसान...समझे। जो ऐसा करने को तैयार... ईवीएम रिज़ल्ट उसका...

माई बाप हम तैयार हैं...हम तैयार हैं...आप चिंता न करें। ये छह हज़ार रुपल्ली का झांसा बस झांसा है। आप तो सर्व ज्ञानी हैं महाराज ही...ही... ही...क्या हम नहीं जानते, रौशनी  और उसकी सहेली के मुँह एक बार आइसक्रीम का स्वाद  लग गया तो फिर एंटीलिया में परोसे जाने वाले  56 हज़ार भोग उन्हीं की भूख मिटाएंगे। 

(वीना फिल्मकार, पत्रकार और व्यंग्यकार हैं।)








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dr.amit satanker :: - 02-04-2019
Vina ji ne Bharat ki Jo Dasha dikhai hai vo vastvik hai aaj bhi nimn jatiya dusro k gharo me Kam par jati hai unke bachhi k liye b.a. m.a.jaisi degree hai jinse job tak nahi milta

Umesh Chandola :: - 02-04-2019
About the strikes by Lenin in late 1999 tels us that strikes are Training Schools of Proletariat against War. First time Proletariat thinks about the society divided in 2 classes ie bourgeois and Proletariat. Ruling class consists of government and corporate. From last several years 10 Trade union centre reduced resistance to 2 days (. Not last even 2 hours in most places) .No posters,no pamphlets. Why?

Uday narayan :: - 02-03-2019
विना की क्रांतिकारी लेखनी को सलाम ।शब्दो का चयन बहुत साहित्यिक लेख आपको उच्च कोटि का जनवादी बुद्दिजीवी सिद्ध करता है