भारत जल रहा है नीरो डायस बजा रहा है!

आड़ा-तिरछा , , शनिवार , 19-08-2017


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वीना

15 अगस्त 2017 को लाल किले की प्रचीर पर रंग-बिरंगी, कलफ लगी, लंबी पूंछ वाली पगड़ी पहन कर मोदी की जिह्वा कुछ और कह रही थी और भाव-भंगिमाएं कुछ और। सारे जहां से अच्छा की धुन पर डायस का तबला बजाते प्रधानमंत्री को देखकर ये ख्याल तुरंत दिमाग़ से टकराया - ‘‘रोम जल रहा था और नीरो बांसुरी बजा रहा था।’’ 2002 में जब गुजरात जल रहा था तो ये हिंदू नीरो किस सुकून में रहा होगा साफ-साफ पूरे देश ने देखा।

फैक्टरियां बंद हो रही हैं। लाखों-करोड़ों लोग बेरोज़गार हो रहे हैं। स्थाई नौकरियां खत्म करके ठेकेदारी प्रथा कायम की जा रही है। ऑक्सीजन की कमी से बच्चे-नौजवान अस्पताल में मर रहे हैं। गुजरात समेत देश के विभिन्न हिस्सों में लोग बाढ़ से मर-जूझ, बर्बाद हो रहे हैं। हर रोज़ प्रधानमंत्री की नाक के नीचे सीवर साफ करने वाले जहरीली गैसों की चपेट में आकर जान गवां रहे हैं। सीमा पर जवान कत्ल हो रहे हैं। आदिवासियों के हक़-अधिकार छीनने के लिए उनकी हत्याएं की जा रही हैं। किसान आत्महत्या को मजबूर हैं। दलित-मुसलमान गाजर मूली की तरह छीले-काटे, मारे जा रहे हैं। पर हिंदुस्तानी नीरो मस्ती में डायस बजा रहा है। उसकी सवा सौ करोड़ की गिनती में कोई कमी नहीं आती।

प्रतीकात्मक चित्र।


आने वाले समय में किसी दिखावे, लल्लो-चप्पो की ज़रूरत नहीं रहेगी। गला खराब हो गया झूठी उपलब्धियां गिनवाते-गिनवाते। बस कुछ वक़्त और फिर नो सवाल-जवाब। नो सफाई, केवल तानाशाही। हां-हां हमें पता है जनता कि तुझे पता है कि अब भी हमारी तानाशाही ही चल रही है। बस हम मान नहीं रहे। यकीन मान हमें भी उतनी ही घुटन है जितनी तुझ जनता जनार्दन को है। जनता खुलकर जान दांव पर लगाए और तानाशाह खुलकर फांसी चढ़ाए, गोली खिलाए। उस खेल का मज़ा ही कुछ और है। इस छिपे आशय के साथ जब मोदी लाल किले पर प्रत्यक्ष में गला-फाड़-फाड़ वादे-इरादे, कामयाबियां गिनवा रहे हैं ठीक उसी समय गुजरात में दलित बालक को पीट-पीटकर उसकी आज़ादी को औकात में रहने की कार्रवाई को अंजाम दिया जा रहा है। शूद्र आज़ादी का झंडा फहरायेंगे? वो भी ‘हिंदू राष्ट्र’ में। ये घोर पाप भला कैसे होने दिया जा सकता है? पढ़ाई-लिखाई में ब्राहमण बालकों से आगे निकल गया तो क्या औकात भूल जाएगा!

मीडिया ने अभी खूब शोर मचाया सीवर मज़दूरों की सुरक्षा, सम्मान और तनख्वाह बढ़ाने के लिए, हमने कान दिए क्या? यहां लाल किले पर भाषण देने का अधिकार झपटने वालों में से किसने उस जनता के लिए कुछ किया जिसके लिए भगत सिंह ने फांसी कुबूल की थी। भगत सिंह होता तो वो अपनी दबी-कुचली जनता के लिए जो करना चाहता करता। हम अपनी धन्नासेठ बिरादरी के लिए कर रहे हैं। इसमें गलत क्या है?

व्यंग्य लेखन।


सीवर सफाई कर्मचारी भले ही अपनी मौतों को देश-समाज, सरकार की बेकदरी का नतीजा करार दें। चिल्ल-पौं मचाते रहें शहीदों का दर्जा पाने के लिए। मगर मोदी इसे शूद्रों द्वारा खुशी-खुशी किया गया आवश्यक कार्य ही मानेंगे। उन्हें रटाई गई धर्म बही के अनुसार ये अपने पापों से ऐसे ही मुक्ति पाएंगे। मनु ने आदेश दिया है मनुस्मृति में कि अगर कोई शूद्र किसी तरह धन इकट्ठा कर ले तो ब्राहमण उसका धन छीन लें। शूद्र को धन-सम्मान का अधिकार नहीं है। उसे केवल अपने से ऊंची जातियों द्वारा फेंके गए टुकड़ों पर जिंदा रहना है। इससे अधिक सोचना भी पाप है।

शूद्रों का ‘‘अगला जनम संवारने’’ का काम सभी लीडरान और पार्टियों ने पूरी ईमानदारी से किया है। फिर चाहे वो कम्युनिष्ट पार्टियां ही क्यों न रही हों। जिनके लिए जात-धर्म, जनम-मरण के ढोंग कोई मायने नहीं रखते। सवर्णों के आगे बढ़ने के आज़ादी के 70 साल, तथाकथित शूद्रों-अतिशूद्रों और मेहनतकशों के लिए पीछे की ओर चल रहे हैं। हिंदू राष्ट्र की पुनः स्थापना के लिए संस्कृति-समाज, नस्ल बिगाडू विद्वानों का दिमाग़ ठिकाने लगाने का काम भी ज़ोरों पर है। जय हिंद, जय भारत।
(वीना फिल्मकार होने के साथ स्वतंत्र पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहती हैं।)

 










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