देश के प्रधानमंत्री के नाम एक गरीब, मेहनतकश नागरिक का पत्र

बेबाक , , बुधवार , 31-05-2018


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संदीप नाईक

मेरे प्रिय प्रधानमंत्री जी, 

नमस्कार

आपके भक्त अक्सर मुझे अपनी चुनी हुई सरकार से और आपसे सवाल पूछने पर धमकाते रहते हैं और अक्सर क्षुद्रता पर उतर आते हैं अस्तु आपको पत्र लिख रहा हूं। कृपया शांत दिमाग से पढ़ सकें तो पढ़ें - जवाब देना आपकी शान के खिलाफ है इसलिए उम्मीद भी नहीं है।

मैं बार-बार और आज फिर कह रहा हूं मेरी इस नरेंद्र दामोदर दास मोदी नामक व्यक्ति से दुश्मनी नहीं वरन मोदी नामक कारपोरेट की कठपुतली से मतभेद है- जिसे ना अनुभव है- ना ज्ञान और जो सरेआम जनता की पसीने की कमाई को धता बताकर देश को एक ऐसे मोड़ पर ले आया है जहां गहन अंधेरे, निरंकुश पश्चाताप और डिप्रेशन के कुछ नहीं है - मैं बोलता हूं और बोलूंगा क्योकि भुगत रहा हूं, जनता के बीच काम करता हूं, मेहनत से दो जून की रोटी का जुगाड़ करता हूं। कल यदि एंजियोग्राफी भी करवाना पड़े तो मेरे पास संचित धन नहीं है और ना ही कुछ चल अचल संपत्ति है।

बोलना इसलिए जरूरी है कि वह इस देश का प्रधानमंत्री है जिसका मैं नागरिक हूं और पचास पैसे की भी कोई चीज खरीदता हूं तो टैक्स देता हूं, सड़क से गुजरता हूं तो टोल का पेमेंट करता हूं, कमाता हूं तो टीडीएस कटवाता हूं, मनोरंजन करता हूं तो टैक्स देता हूं, बीमार होता हूं तो टैक्स देता हूं, किसी को खून देता हूं तो जांच के लिए जीएसटी भरता हूं, कोई परिजन मर जाता है तो लकड़ी कंडे का भी टैक्स नगर निगम को देता हूं। 

बड़ी बेशर्मी से रोजगार खत्म करके, देश की संपत्ति बर्बाद करके, भ्रम फैलाकर, साम्प्रदायिकता का विष घोलकर , विपक्ष को ठिकाने लगाकर, सत्ता हासिल करने के लिए सभी प्रकार के घृणित कार्य करके, संवैधानिक संस्थाओं को बर्बाद करके, न्याय जैसे पवित्र मूल्यवान संस्कार को दूषित कर क्या नहीं किया।

कांग्रेस ने तो देश का विनाश सत्तर में से लगभग 55 वर्ष सत्ता में रहकर किया ही था आपको लाये ही इसलिए थे कि जिस बड़बोलेपन और अलंकृत भाषा से गली मोहल्लों में चुनावी सभाएं कर यश हासिल किया था और एक गरीब भुखमरी से जूझ रही अवाम में सपने जगाए थे वे सब कहां गए मोदी जी? 

आप व्यक्ति नहीं संस्था हैं, पार्टी के आदमी नहीं देश के सेवक हैं, तानाशाह नहीं लोकतंत्र के रखवाले हैं , अमीरों के गुलाम नहीं गरीब-गुर्बों के हिमायती हैं, दलगत नहीं दलों से ऊपर हैं, आप लोगों की आवाज दबाने को नहीं उभारने के लिए हैं, जवाब ना देना नहीं आपको सवाल पूछने के लिए प्रेरित करना होगा, विपक्ष को खत्म करना नहीं विपक्ष को मजबूत करना होगा, सत्ता हथियाने का नहीं लोकतंत्र के उच्च मूल्य स्थापित करने होंगे , आम लोगों में हंसी का पात्र नहीं बल्कि आदर्श व्यक्ति बनकर जगह छोड़नी होगी - यदि ये मूल समझ और सिद्धांत आपको पल्ले नहीं पड़ते तो आपको कोई हक नहीं है 126 करोड़ जनता जनार्दन को त्रस्त करने का और सिर्फ अम्बानी और अडानी को तरजीह देने का। 

एक बार सूट बूट छोड़कर और अपने चापलूसों की बिरादरी से निकल कर लोगों के बीच जाईये, सब छोड़ दीजिए - विदेश भ्रमण, भाषणबाजी, गुटबाजी, बैठकें, झूले, अभद्रता से ताड़ना, षड्यंत्र और कुटिल कार्य, सिर्फ लोगों को जाकर देखिये, सुनिए और समझने का प्रयास करिये , अपनी ही पार्टी के बड़े बूढ़ों के साथ शांति से बैठकर सुनिए कि आपकी चार साल की उपलब्धि उनकी नजर में क्या है, संघ के लोगों से पूछिए कि जमीन पर क्या हालात हैं, आपके प्रचारक जब लोगों के घर रोज सुबह शाम खाना खाने जाते हैं ( आम और गरीब लोगों के यहां - पेट भरे मध्यमवर्गियों या चित पावन मराठी ब्राह्मणों के घर नहीं ) तो वे बताएं कि सब्जी और दाल में पानी कितना है और रोटी परोसते हुए गृहणी की आंखें शर्म से झुकती हैं और वो रोटियां गिनती हैं क्या? 

अपनी असफलताओं और अमर्यादित व्यवहार के अभेद्य किलों से बाहर निकलने का जमीन पर दोनों पैर जमाकर रखने का समय आ गया है और यह भी कि जिस तरह से इतिहास का मखौल उड़ा रहे हो - अपने जीते जी इससे बड़ा मजाक देखोगे हमारे सामने ही आडवाणी से लेकर राहुल, सोनिया, मनमोहन सिंह, येचुरी, ममता, मुलायम, अखिलेश , मायावती, लालू , सिद्धारमैया से लेकर कई उदाहरण हैं नेहरू और इंदिरा को तो छोड़ ही दो। 

कितने अफसोस की बात है कि चैनल्स की भीड़ में नौकरी करने वालों में बाजार की मांग को पूरा कर अपने को तयशुदा ढांचों में सहलाने वाले या ढालने वाले पत्रकारों को रुपया देकर अपनी कीर्ति पताकाएं फहरानी पड़ रही हैं वो भी अरबों रुपया खर्च करके वो भी तब जब आपके भाई और माँ बहुत ही साधारण जिंदगी गरीबी में जी रहे हों और पत्नी पेंशन पर और तिस पर भी एक Ravish Kumar से इतने दहशत में आ गए कि उनके पीछे पड़ गए या राणा अय्यूब जैसी देश की बहादुर बेटी की जान लेने पर उतारू हो गए , अगले पांच साल में क्या आप सबको मार दोगे ? 

देश के प्रधानमंत्री आज जो एक पैसा पेट्रोल पर कम हुआ है उसका कितना मखौल उड़ाया गया है यह सुन लेते या समझ पाते तो कोई भी नैतिकता से भरा आदमी चुल्लू भर पानी में .......

(संदीप नाईक सामाजिक कार्यकर्ता हैं और आजकल मध्य प्रदेश में रहते हैं।)








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