अब मसखरों का कोई काम नहीं, ये महक़मा हमारा है!

आड़ा-तिरछा , , रविवार , 03-06-2018


pm-modi-saitire-rss

वीना

जाने क्या ढूंढती रहती हैं ये आंखें मुझमें, राख के ढेर में शोला है ना चिंगारी है। धमेंद्र अभिनीत फ़िल्म शोला और शबनम का ये गीत सुनकर मुझे धमेंद्र की जगह बरबस ही अपने प्रधान सेवक नज़र आने लगे। और आदतन, जैसा कि सब जानते हैं, भले ही ख़्याल आपका हो पर अगर उसमें प्रधान सेवक हों तो वो आपकी ख़्याली कार्यवाही पर भी अपना ठप्पा लगाने से नहीं चूकेंगे। सो, प्रधान सेवक कुछ यूं इस गीत को गुनगुनाने लगे-‘‘जाने क्या ढूंढती रहती है ये जनता मुझमें, सिर्फ संघी हूं, मुझमें मुल्क के लिए हमदर्दी है न ज़िम्मेदारी है...’’

क्या कै़फी का गीत गुनगुनाकर जनता का वोट डकारने वाला कोई संघी भी कुछ पलों के लिए बन सकता है पवित्र पापी? क्या संघियों में भी गिल्ट जैसा कुछ होता है कभी-कभी? जब जनता अपने विश्वास, अपनी उम्मीदों का पूरा फल देकर कहती है - "लो हमने बहुमत से भर दिया तुम्हारा पेट। अब हमारे बारे में भी सोचना, हम इंतज़ार में हैं।"

इसी गीत में आगे कुछ यूं है जिसे मोदी जी हू-ब-हू अलाप जाते हैं - ‘‘आरज़ू जुर्म, वफ़ा जुर्म, तम्मना है गुनाह...ये वो दुनिया है जहां प्यार नहीं हो सकता...कैसे बाज़ार का दस्तूर तुम्हें समझाऊं, बिक गया जो, वो ख़रीदार नहीं हो सकता...बिक गया जो, वो ख़रीदार नहीं हो सकता...’’ अजीब बात है! साहब इस लाइन पर अटक गए हैं! ‘‘बिक गया जो, वो ख़रीदार नहीं हो सकता...’’ न चाहते हुए भी इन लफ़्ज़ों ने उनकी ज़ुबान पर काबू कर लिया है..! मैंने जब इस गीत के लेखक का पता लगाया तो पाया कि मोदी जी की ये धर-पकड़ मशहूर कम्युनिष्ट शायर कै़फ़ी आज़मी की कैफ़ियत का नतीज़ा है। बेचारे साहब! दामन छुड़ाएं तो कैसे। बताओ! सरेआम कुबूल करवा लिया..! जैसे-तैसे खुद पर काबू पा साहब अब झुंझलाते-बड़बड़ाते जाते हैं - ‘‘झूठ कहते हैं ये कम्युनिस्ट नास्तिक ख़ुद को। इनके भूत तो इनके लफ़्ज़ों में छुपे बैठे हैं..! आकाओं ने सुन लिया तो क्या होगा..?

देखो जनता, तुम्हारा हक़-अधिकार, वाजिब मेहनताना आखि़र कौन दबाए बैठा है तुम अब भी न समझो तो तुम्हारी मर्ज़ी। मेरे मुंह से तो हक़ीक़त बयान करवा ही दी है कम्बख़्त कम्युनिष्ट कै़फ़ी ने।

बड़े निष्ठुर हैं ये अपने आका लोग भी। इनके काम का न रहा तो दौड़ा-दौड़ाकर पिटवाएंगे। सोने के तार वाला सूट तो क्या लंगोटी भी नहीं छोड़ेंगे। थोड़े ही देखेंगे कि इनके लिए मैंने सैकड़ों किसानों की हत्याएं कर दीं जिन्हें ख़ुद किसान आत्महत्या कहते हैं। किसानों के कुल 30-40 हज़ार करोड़ के कर्ज़ माफ़ नहीं किए हमने। पर अडानी-अंबानी आदि-आदि आकाओं के 2 लाख करोड़ के एनपीए बट्टे-खाते लगा दिए। हम बैंक बदनाम करवा रहे हैं उनकी ख़ातिर। रोज़ किसान-आदिवासी मरवा रहे हैं। छोटे व्यापारियों को लुटवा रहे हैं, उनके दुकान-घर तुड़वा रहे हैं। नौजवानों से पकौड़े-पान बिचवा रहे हैं। देश के किसान-मज़दूरों की मेहनत के रूपये-पैसे का विदेशी बैंकों में मुंह काला करवा रहे हैं। फिर भी आका जाने, क्या होगा 2019 में अबकी बार...’’ जब सोच-सोचकर साहब के पसीने छूटने लगे तो एक पल रुक, पसीना पोंछकर ख़ुद से बोले -

‘‘कंट्रोल साहेब, कंट्रोल। अपनी संघी चोटियों के तरकश में अभी षड्यंत्रों के बहुत तीर बाक़ी हैं। उनका भी कौन सा कम काम किया है अपन ने। लव-जिहाद, ज़मीन जिहाद, पलायन जिहाद, नमाज़ जिहाद, गौ हत्या, जिन्ना-पाकिस्तान, अकबर-औरंगज़ेब, टीपू सुल्तान किसी को नहीं छोड़ा। फिर दो लाख करोड़ के एनपीए में आखि़र धुआंधार विज्ञापन बमबारी के बजट का तो अपना भी हक़ बनता है कि नहीं...गहरी सांस लो, और वापस कैरेक्टर में आओ।’’ साहब ने एक लंबी सांस ली और कै़फ़ी के चंगुल से ख़ुद को आज़ाद कर  वापस आ गए हैं अपने असली किरदार में। और फिर मस्त होकर साहब ने गुनगुनाया - ‘‘अब मसखरों का कोई काम नहीं, मैंने ये भी महक़मा संभाल लिया है...’’ 

ये किस फिल्म से मारा? अब इतना काम तो ख़ुद कर लीजिये! सीखिये साहेब से कुछ। बस चार घंटे सोते हैं। और आपकी चार साल में भी नींद पूरी न हुई जनता-जनार्दन!!! वैसे साहब, जो अभी आपने अलापा, ये महक़मा कब नहीं था आपके पास? 

ये बताईये आज की तारीख़ में क्या नहीं है आपके पास..! आपके पास रूपया-पैसा है, रिज़र्व बैंक है, चुनाव आयोग है, ईवीएम है, सीबीआई है, सुप्रीमकोर्ट है, सेना है, पुलिस है, जेलें हैं। भाड़े के गौरी लंकेश करने वाले तमंचाख़ोर भी हैं।

जनता के पास क्या है? हिंदू राष्ट्र का शेखचिल्ली ख़्वाब, गाय और उसका गू-मूत। मुसलमानों से बदला लेने की अनपढ़ मानसिकता। और विपक्ष के पास क्या है? एक ही राग - "हम भी मंदिर-मंदिर जा सकते हैं, वंदे-मातरम गा सकते हैं, चाहे नमूना देख लो..." आजकल फासीवाद विरोधी मोर्चे का जो फैशन चला है उसे तोड़ने के लिए तो शाह की शान ही काफ़ी है!

और... आपके पास तो वो अमिताभ भी है, जिसके पास काला धन है। अजय देवगन, अक्षय कुमार, इंदू सरकार, पोखरन, अनुपम खेर, परेश रावल क्या नहीं है आपके पास!!! मां और जसोदा भी काम आ ही जाती हैं यदा-कदा। तो...2019 में फिर ऐश-ओ-आराम, मौज-मस्ती पक्की?

(वीना फिल्मकार और व्यंग्यकार हैं।)

 










Leave your comment











?????? :: - 06-06-2018
बहुत ख़ूब ! धोती भी यही खींचते हैं, बचनों से हो चुका चीरहरण छिपाने के वोट भी माँगते हैं। कल कह रहे थे, “वाह!वाह, आप स्टार्टप वालों ने कमाल कर दिया, क्या सफल किया है देश को!” स्टार्टप वाले हमीं हैं, बगले झाँक रहे हैं, यह कहेगा, “देखो! आप की सफलता कैसी; आप तो बंगले झाँक रहे हैं!”

suraj :: - 06-03-2018
Excellent characterisation !!