दुआ करिए, प्रधानमंत्री आपके शहर भी आएं

बदलाव , , मंगलवार , 10-07-2018


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जितेंद्र भट्ट

कई बार कुछ ऐसी बातें होती हैं। जिनसे हम विस्मय में पड़ जाते हैं। अरे ! ऐसा कैसे हो सकता है?

वो दिन भी हमेशा की तरह सुस्ती के साथ शुरू हुआ। अनमने ढंग से जैसे एक बच्चा आलस समेटे घर से स्कूल के लिए निकलता है। मैं भी ऑफिस के लिए निकल गया।

घर से दफ्तर का बीस किलोमीटर का आधे से ज्यादा रस्ता बड़े सुकून से गुजरा। वही बड़े-बड़े गड्ढे। ऊंचे स्पीड ब्रेकर। बेतरतीब ट्रैफिक। लेफ्ट साइड का सिग्नल देकर राइट साइड की तरफ निकलती गाड़ियां। और अस्सी की स्पीड में चलते बाइकर का अचानक ब्रेक लगाकर बीस की स्पीड पर आ जाना। सारा कुछ वैसा ही था, जैसा रोज होता है। मतलब इस सड़क पर लाइफ जैसा चाहा, वैसा पाया वाले अंदाज में भाग रही थी।

लेकिन आधे रास्ते के बाद सब कुछ बदल गया। कार ने जब आधा किलोमीटर तक हिचकोले नहीं खाए, तो जोर का झटका लगा। सड़क के बीचों-बीच बने आधे-आधे फीट के गड्ढे, जिनका मैं कई महीनों से अभयस्त हो गया था; रातों रात भर दिए गए थे। ये और भी झटका देने वाली बात थी। 

आखिर ये कैसे हुआ? पहले चार पांच मिनट यही सोच-सोचकर दिमाग चकराता रहा। अभी इन्हीं सवाल जवाबों में उलझा था कि आगे सड़क के दोनों किनारों पर सफेद और काले रंग की पेंटिंग करते मजदूर दिखाई दिए। इस रास्ते पर चलते हुए कोई चार साल होने को आए हैं, पर ऐसा पहली बार हो रहा था।

घर से दफ्तर के दरम्यान उस बीस किलोमीटर की सड़क पर कहां कहां गड्ढे हैं और कहां स्पीड ब्रेकर कुछ साल में पूरी तरह रट सा गया है। इसलिए जब कोई गड्ढा या स्पीड ब्रेकर आता है, तो पैर स्वत:स्फूर्त तरीके से ब्रेक की तरफ बढ़ चलते हैं। उस दिन भी वैसा ही हुआ।

मैं सवालों के स्पीड ब्रेकर में हिचकोले खाकर थोड़ा सुस्त हो गया था। तभी अचानक ये सोचकर की स्पीड ब्रेकर आ गया है, मेरा पैर अपने आप कार के ब्रेक को दबाने लगा। वहां पर एक ऊंचा स्पीड ब्रेकर हुआ करता था। जब भी इस रास्ते से गुजरता हूं, ये स्पीड ब्रेकर बहुत परेशान करता है। अगर किसी दिन ध्यान भटक जाए, तो कार ऐसे उछलती है, जैसे फुटबॉल पर किसी ने जोर की लात मार दी हो। लेकिन उस दिन ब्रेक लगाना बेकार गया। करीब करीब आधा फीट ऊंचा स्पीड ब्रेकर गायब था। उसके आगे दो और स्पीड ब्रेकर भी हट गए थे।

मैंने आंखों को हाथ से मला, ये क्या हो रहा है; मैं मन ही मन बुदबुदाया। स्पीड ब्रेकर के नहीं होने से भी झटका लग सकता है। ये पहली बार महसूस हुआ।

थोड़ा आगे बढ़ा, महीनों से सड़क के किनारे मिट्टी से भरी नालियों की सफाई चल रही थी। जिन नालियों की सुध बारिश से पहले तक भी नहीं ली गयी, जुलाई के पहले हफ्ते के आखिरी दिनों में उनके अच्छे दिन आ गए थे।

हर पंद्रह बीस कदम पर काम युद्धस्तर पर चल रहा था। कहीं पेंटिंग हो रही थी। तो कहीं सड़क की अगल बगल नालियों की सफाई। सड़क और चौराहे के बीच के हिस्से में लाल वाली बजरी डाली जा रही थी। पेड़ों पर पड़ी धूल झाड़ने के लिए पानी के फौव्वारे चलाए गए। अफसरों ने साज सज्जा में कोई कमी नहीं छोड़ी। खूबसूरत प्लांट से सजे गमले सड़क के किनारे लगाए दिए गए। महीनों से खराब लाल बत्ती भी चकाचक जलने लगी। 

सरकारी सिस्टम इतनी तेजी से काम भी कर सकता है। ये पहली बार महसूस हुआ। नोएडा की सजावट शुक्रवार के दिन शुरू हुई, और रविवार तक नोएडा के सेक्टर 81 से लगे इलाके चकाचक दिखने लगे। जहां कोशिशों के बाद भी सफाई करना मुमकिन नहीं था, वहां अफसरों ने हरी टाट लगा दी।

करीब आधे घंटे का रास्ता इस उधेड़बुन में गुजरा कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? फिर पता करने की कोशिश की, तो पता चला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति 9 जुलाई के दिन नोएडा के सेक्टर-81 में सैमसंग कंपनी की नई यूनिट का उद्घाटन करने आ रहे हैं। और इसीलिए वो जिस रास्ते गुजरने वाले हैं, उसे चमकाया जा रहा है।

काम शुक्रवार को शुरू हुआ, संडे तक सारा चकाचक हो गया। सिर्फ तीन दिन में पूरा सरकारी अमला नोएडा-ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेसवे, सेक्टर-82, सेक्टर-93, सेक्टर-93ए सहित कई सड़कों की री-सरफेसिंग के काम में लग गया। माननीयों को सड़क पर झटके न लगें, इसलिए स्पीड ब्रेकर हटा दिए गए। स्मार्ट सिटी का फील आए, इसलिए सड़क के किनारे पेंटिंग की गई। और सजावट के लिए सुंदर गमले रखे गए। एक विदेशी मेहमान और एक प्रधानमंत्री के लिए शहर के एक हिस्से को चमकाने में पूरा सरकारी अमला लगा। पूरी मुस्तैदी के साथ।

ऐसी ही मुस्तैदी ठाणे के प्रशासन ने भी दिखाई होती, तो चालीस साल की मनीषा भोईर आज जिंदा होतीं।

जिस वक्त नोएडा में सरकारी अमला प्रधानमंत्री के स्वागत के लिए सड़कों को चमका रहा था। ठाणे में आम लोग उन्हीं गड्ढों से भरी सड़कों में हिचकोले खाते अपने अपने मुकाम तक पहुंच रहे थे।

वो आठ जुलाई का दिन था, आसमान से बारिश टपक रही थी। पानी की निकासी नहीं हुई तो सड़कें तालाब बन गईं। इसी तालाब में सड़क में बने गड्ढे ढक गए। मनीषा भोईर अपने रिश्तेदार के साथ बाइक पर जा रही थीं। शिवाजी चौक के पास एक गड्ढा उनका इंतजार कर रहा था। बाइक का पहिया गड्ढे में गया। संतुलन बिगड़ा और बाइक गिर गई। मनीषा भोईर और उनके रिश्तेदार सड़क पर आ गिरे। मनीषा भोईर पीछे से आती बस के पहियों के नीचे आ गईं। आगे वही हुआ, जो इस देश के आम नागरिक की नीयति है।

सरकार और प्रशासन खास लोगों के लिए ही मुस्तैदी क्यों दिखाते हैं?

सरकार को सड़क के गड्ढे तब तक क्यों नहीं दिखते? जब तक सड़क पर किसी खास को न गुजरना हो। मनीषा भोईर के परिवार वाले सोच रहे होंगे। काश आठ जुलाई को प्रधानमंत्री नोएडा की जगह ठाणे की सड़क से गुजरते। मनीषा भोईर जिंदा होतीं।

जिस देश में माननीयों के लिए स्पीड ब्रेकर तोड़ दिए जाते हैं। सड़कों के किनारे किलोमीटर तक पेंटिंग की जाती है। पेड़ों पर पड़ी धूल हटाने के लिए पानी छिड़का जाता है। उसी देश में आम नागरिक खुले गटर में गिरकर जान गवां देते हैं। माननीय की गाड़ी स्पीड ब्रेकर की वजह से उछलने न पाए, इसका ख्याल रखा जाता है। लेकिन आम नागरिक गड्ढों में गिरकर मर जाए। इससे न माननीय को फर्क पड़ता है। न सरकार को। न अफसरों को।

बात एक साल पुरानी है। लेकिन साल दर साल यही हो रहा है। 2017 का उनतीस अगस्त। भारी बारिश से मुंबई की सड़कें नाला बन गई थीं। सड़कों पर कार और गाड़ियों का चलना दूभर हो गया था। मुंबई के बॉम्बे हॉस्पिटल में पेट की बीमारी के मशहूर डॉक्टर दीपक अमरापुरकर एलफिन्स्टन वेस्ट में अपनी कार छोड़कर पैदल ही घर की तरफ निकल गए, लेकिन घर नहीं पहुंचे।

नगर निगम ने रास्ते में गटर के ढक्कन पानी जाने के लिए निकाल दिए थे। एलफिन्स्टन में मेनहोल का ढक्कन खुला था। ऐसे ही एक मेनहोल में डॉक्टर अमरापुरकर गिर गए। उनकी लाश वर्ली कोलीवाडा समुद्र में मिली।

तो क्या सड़क पर गड्ढे और खुले मेनहोल सिर्फ आम लोगों के लिए हैं? आखिर हर बार किसी गड्ढे में आम आदमी की बाइक ही क्यों फिसलती है? सरकार की नाकामी के गड्ढे में आम नागरिक ही क्यों गिरता है? गुस्सा आता है। और अंत में कहने का मन करता है कि मैं पढ़ना चाहता हूं वो खबर। जिसमें लिखा हो – मेनहोल में गिरकर मंत्रीजी नहीं रहे। या फिर फलां पार्टी के फलां नेता सड़क में बने गड्ढे में गिरकर निपट गए।

(जितेंद्र भट्ट पेशे से पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली के एक प्रतिष्ठित चैनल में काम कर रहे हैं।)

 








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