“मेरी मां का ख़ुदा इतना निर्दयी क्यूं है?” ...कवि अदनान कफ़ील दरवेश को भारत भूषण सम्मान

सम्मान-पुरस्कार , , बुधवार , 01-08-2018


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जनचौक डेस्क

इस वर्ष का भारत भूषण अग्रवाल सम्मान युवा कवि अदनान कफ़ील दरवेश को उनकी कविता ‘क़िबला’  के लिए दिए जाने की घोषणा की गई है। अदनान कफ़ील दरवेश का जन्म 30 जुलाई 1994 को उत्तर प्रदेश के बलिया ज़िले के ग्राम गड़वार में हुआ था। 

इस वर्ष के पुरस्कार का चयन प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल ने किया। 

प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल की टिप्पणी

"अदनान की यह कविता माँ की दिनचर्या के आत्मीय, सहज चित्र के जरिेए “माँ और उसके जैसी तमाम औरतों” के जीवन-वास्तव को रेखांकित करती है। अपने रोजमर्रा के वास्तविक जीवन अनुभव के आधार पर गढ़े गये इस शब्द-चित्र में अदनान आस्था और उसके तंत्र यानि संगठित धर्म के बीच के संबंध की विडंबना को रेखांकित करते हैं। 

 

 ‘क़िबला’  इस्लामी आस्था में प्रार्थना की दिशा का संकेतक होता है। लेकिन आस्था के तंत्र में ख़ुदा का घर सिर्फ मर्दों की इबादतगाह में बदल जाता है, माँ और उसके जैसी तमाम औरतों का क़िबला मक्के में नहीं रसोईघर में सीमित हो कर रह जाता है। स्त्री-सशक्तिकरण की वास्तविकता को नकारे बिना, सच यही है कि स्त्री के श्रम और सभ्यता-निर्माण में उसके योगदान की पूरी पहचान होने की मंजिल अभी बहुत बहुत दूर है—आस्थातंत्र के साथ ही सामाजिक संरचना की इस समस्या पर भी कविता की निगाह बनी हुई है।  

 

अदनान की यह कविता सभ्यता, संस्कृति और धर्म में स्त्री के योगदान को, इसकी उपेक्षा को पुरजोर ढंग से रेखांकित करती है। उनकी अन्य कविताओं में भी आस-पास के जीवन, रोजमर्रा के अनुभवों को प्रभावी शब्द-संयोजन में ढालने की सामर्थ्य दिखती है। 

......


आइए अब पढ़ते हैं अदनान कफ़ील दरवेश की पुरस्कृत कविता

क़िबला


माँ कभी मस्जिद नहीं गई

कम से कम जब से मैं जानता हूँ माँ को

हालाँकि नमाज़ पढ़ने औरतें मस्जिदें नहीं जाया करतीं हमारे यहाँ

क्यूंकि मस्जिद ख़ुदा का घर है और सिर्फ़ मर्दों की इबादतगाह

लेकिन औरतें मिन्नतें-मुरादें मांगने और ताखा भरने मस्जिदें जा सकती थीं

लेकिन माँ कभी नहीं गई

शायद उसके पास मन्नत माँगने के लिए भी समय न रहा हो

या उसकी कोई मन्नत रही ही नहीं कभी

ये कह पाना मेरे लिए बड़ा मुश्किल है

यूँ तो माँ नइहर भी कम ही जा पाती

लेकिन रोज़ देखा है मैंने माँ को

पौ फटने के बाद से ही देर रात तक

उस अँधेरे-करियाये रसोईघर में काम करते हुए

सब कुछ करीने से सईंतते-सम्हारते-लीपते-बुहारते हुए

जहाँ उजाला भी जाने से ख़ासा कतराता था

माँ का रोज़ रसोईघर में काम करना

ठीक वैसा ही था जैसे सूरज का रोज़ निकलना

शायद किसी दिन थका-माँदा सूरज न भी निकलता

फिर भी माँ रसोईघर में सुबह-सुबह ही हाज़िरी लगाती.


रोज़ धुएँ के बीच अँगीठी-सी दिन-रात जलती थी माँ

जिसपर पकती थीं गरम रोटियाँ और हमें निवाला नसीब होता

माँ की दुनिया में चिड़ियाँ, पहाड़, नदियाँ

अख़बार और छुट्टियाँ बिलकुल नहीं थे

उसकी दुनिया में चौका-बेलन, सूप, खरल, ओखरी और जाँता थे

जूठन से बजबजाती बाल्टी थी

जली उँगलियाँ थीं, फटी बिवाई थी

उसकी दुनिया में फूल और इत्र की ख़ुश्बू लगभग नदारद थे

बल्कि उसके पास कभी न सूखने वाला टप्-टप् चूता पसीना था

उसकी तेज़ गंध थी

जिससे मैं माँ को अक्सर पहचानता.

ख़ाली वक़्तों में माँ चावल बीनती

और गीत गुनगुनाती-

“..लेले अईहS बालम बजरिया से चुनरी”

और हम, “कुच्छु चाहीं, कुच्छु चाहीं…” रटते रहते

और माँ डिब्बे टटोलती

कभी खोवा, कभी गुड़, कभी मलीदा

कभी मेथऊरा, कभी तिलवा और कभी जनेरे की दरी लाकर देती.


एक दिन चावल बीनते-बीनते माँ की आँखें पथरा गयीं

ज़मीन पर देर तक काम करते-करते उसके पाँव में गठिया हो गया

माँ फिर भी एक टाँग पर खटती रही

बहनों की रोज़ बढ़ती उम्र से हलकान

दिन में पाँच बार सिर पटकती ख़ुदा के सामने.


माँ के लिए दुनिया में क्यों नहीं लिखा गया अब तक कोई मर्सिया, कोई नौहा ?

मेरी माँ का ख़ुदा इतना निर्दयी क्यूँ है ?

माँ के श्रम की क़ीमत कब मिलेगी आख़िर इस दुनिया में ?

मेरी माँ की उम्र क्या कोई सरकार, किसी मुल्क का आईन वापस कर सकता है?

मेरी माँ के खोये स्वप्न क्या कोई उसकी आँख में

ठीक उसी जगह फिर रख सकता है जहाँ वे थे ?


माँ यूँ तो कभी मक्का नहीं गई

वो जाना चाहती थी भी या नहीं

ये कभी मैं पूछ नहीं सका

लेकिन मैं इतना भरोसे के साथ कह सकता हूँ कि

माँ और उसके जैसी तमाम औरतों का क़िबला मक्के में नहीं

रसोईघर में था…...........।।


अदनान की एक और प्रसिद्ध रचना 


सन् 1992 


जब मैं पैदा हुआ 

अयोध्या में ढहाई जा चुकी थी एक क़दीम मुग़लिया मस्जिद 

जिसका नाम बाबरी मस्जिद था

ये एक महान सदी के अंत की सबसे भयानक घटना थी


कहते हैं पहले मस्जिद का एक गुम्बद 

धम्म् की आवाज़ के साथ

ज़मीन पर गिरा था 

और फिर दूसरा

और फिर तीसरा

और फिर गिरने का जैसे

अनवरत् क्रम ही शुरू हो गया


पहले कीचड़ में सूरज गिरा 

और मस्जिद की नींव से उठता ग़ुबार

और काले धुएँ में लिपटा अंधकार 

पूरे मुल्क पर छाता चला गया 

फिर नाली में हाजी हश्मतुल्लाह की टोपी गिरी 

सकीना के गर्भ से अजन्मा बच्चा गिरा

हाथ से धागे गिरे,

रामनामी गमछे गिरे,

खड़ाऊँ गिरे

बच्चों की पतंगे और खिलौने गिरे

बच्चों के मुलायम स्वप्नों से परियाँ चींख़तीं हुईं निकलकर भागीं 

और दंतकथाओं और लोककथाओं के नायक चुपचाप निर्वासित हुए


एक के बाद एक 

फिर गाँव के मचान गिरे 

शहरों के आसमान गिरे 

बम और बारूद गिरे 

भाले और तलवारें गिरीं

गाँव का बूढ़ा बरगद गिरा 

एक चिड़िया का कच्चा घोंसला गिरा

गाढ़ा गरम ख़ून गिरा 

गंगा-जमुनी तहज़ीब गिरी 

नेता-परेता गिरे, सियासत गिरी 

और इस तरह एक के बाद एक नामालूम कितना कुछ 

भरभरा कर गिरता ही चला गया 


"जो गिरा था वो शायद एक इमारत से काफ़ी बड़ा था.."

कहते-कहते अब्बा की आवाज़ भर्राती है 

और गला रुँधने लगता है

इस बार पासबाँ नहीं मिले काबे को सनमख़ाने से

और एक सदियों से मुसलसल खड़ी मस्जिद 

देखते-देखते मलबे का ढेर बनती चली गयी


जिन्हें नाज़ है हिन्द पर 

हाँ, उसी हिन्द पर

जिसकी सरज़मीं से मीर-ए-अरब को ठंडी हवाएँ आती थीं 

वे कहाँ हैं ?


मैं उनसे पूछना चाहता हूँ

कि और कितने सालों तक गिरती रहेगी 

ये नामुराद मस्जिद

जिसका नाम बाबरी मस्जिद है 

और जो मेरे गाँव में नहीं 

बल्कि दूर अयोध्या में है


मेरे मुल्क़ के रहबरों

और ज़िंदा बाशिंदों

बतलाओ मुझे 

कि वो क्या चीज़ है

जो इस मुल्क़ के हर मुसलमान के भीतर 

एक ख़फ़ीफ़ आवाज़ में न जाने कितने बरसों से 

मुसलसल गिर रही है 

जिसके ध्वंस की आवाज़ अब सिर्फ़ स्वप्न में ही सुनाई देती है !

............


1979 से दिया जा रहा है पुरस्कार

आइए अब आपको इस पुरस्कार के इतिहास के बारे में भी बताते हैं।

कवि, लेखक और आलोचक भारत भूषण अग्रवाल के नाम से यह पुरस्कार हर वर्ष 35 वर्ष से कम आयु के किसी कवि/कवयित्री की श्रेष्ठ कविता को दिया जाता है। भारत भूषण जी को मरणोपरांत मिले साहित्य अकादमी पुरस्कार की राशि से उनकी पत्नी बिन्दु जी ने 1979 में यह पुरस्कार आरंभ किया था। बिन्दु जी के देहांत के बाद उनकी पुत्री अनिवता अब्बी और बेटे अनुपम भारत इस पुरस्कार को जारी रखे हैं। पुरस्कार के तहत 25 हज़ार रुपये नगद और प्रशस्ति पत्र प्रदान किया जाता है। पुरस्कार वितरण समारोह हर पांच वर्ष में आयोजित किया जाता है।

 

निर्णायक मंडल में दिग्गज साहित्यकार

पुरस्कार के निर्णायक मंडल में वर्तमान में अशोक वाजपेयी, अरुण कमल, उदय प्रकाश, अनामिका और पुरुषोत्तम अग्रवाल शामिल हैं। बारी-बारी से हर वर्ष एक निर्णायक पुरस्कार के लिए कविता का चुनाव करता है। इस बार के निर्णायक पुरुषोत्तम अग्रवाल थे।

कई प्रतिष्ठित कवियों को मिला सम्मान

इससे पहले यह पुरस्कार अरुण कमल, अनामिका, देवी प्रसाद मिश्र से लेकर कुमार अंबुज और पंकज चतुर्वेदी तक कई अन्य प्रतिष्ठित कवियों को मिल चुका है। हाल के वर्षों में आर. चेतनक्रांति,  गीत चतुर्वेदी, व्योमेश शुक्ल, अनुज लुगुन और कुमार अनुपम को यह पुरस्कार दिया गया। पिछले बरस 2017 में यह पुरस्कार युवा कवि अच्युतानंद मिश्र को उनकी कविता ‘बच्चे धर्मयुद्ध लड़ रहे हैं’  के लिए दिया गया था।

पिछले कुछ सालों में इस पुरस्कार को लेकर कुछ विवाद भी रहे हैं और कवि और उसकी कविता के चुनाव को लेकर साहित्य जगत में काफी बहस रही है। फिलहाल अदनान की कविता को लेकर अभी ऐसा कोई विवाद सामने नहीं आया है। वैसे ऐसे विषयों पर व्यक्तिगत टिप्पणियों से अलग अगर संजीदा वाद-विवाद या बहस हो तो कोई बुराई नहीं क्योंकि उससे भी पता चलता है कि कवि और कविता को लेकर अभी प्रेम और चिंता बनी हुई है। 

 








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