“एक समय के बाद कवि को लिखना बंद कर देना चाहिए”

कविता के नोट्स , , रविवार , 31-12-2017


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संदीप नाईक

कविता के नोट्स – एक कहानीकार के नजरिये से 

(तीसरा और अंतिम भाग)

जो लोग अपने व्यक्तिगत जीवन में अपने घर, परिवार, बीवी, बच्चे या शहर-कस्बे से एकसार न हो सकें, जहाँ नौकरी की - वहाँ प्रतिबद्धता या इंटिग्रिटी नहीं दिखा सकें, बेहद अश्लील किस्म का व्यवहार करते हुए अलग दिखने के अपराध बोध से ग्रस्त रहते हुए भोग विलास में लिप्त रह रहे हैं और विचारधारा के नाम पर देश प्रदेश और अबोध युवाओं को ज्ञान का रायता पिलाने का स्वयंभू ठेका लेकर झंडाबरदारी कर रहे हों - जिनसे न गद्य सधा, न कविता - वे कविता में विचार और विचार में व्यभिचार पर ज्ञान दे रहे हैं। कमाल ये है कि ये कामरेडी तड़का दाल से मंचूरियन और खीर से आइसक्रीम में भी लग रहा है, हिंदी कविता को इन कवि टाइप लोगों से बचना चाहिए जो खाते तो अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की हैं शोध अध्ययन के नाम पर और बात करते है मजदूर और सर्वहारा की।

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कविता आग्रह की वस्तु है जैसा सद्वाक्य बोलकर, लिखकर कविता की पोटली लेकर घूमने वाले इस संसार में बहुतेरे हैं जो मौका मिलते ही दाग देते है बदबूदार कविताएं और पूरे वातावरण को दूषित कर देते हैं। ये कवि आपको बाजार से लेकर हलवाई के बूचड़खाने तक मिल जाएंगे और अपनी किताब को मरघट में कपाल क्रिया का इंतज़ार कर रहे लोगों को बेचने से भी परहेज नहीं करेंगे और यदि आपने कुछ बोला तो अपने ख़ौफ़ज़दा चेहरे की कालिख को ताक पर रखकर विचारधारा के पक्षधर बनते हुए अपने को क्रांतिकारी और आपको बुर्जुआ या दक्षिणपंथी घोषित कर देंगे। अपंग, लाचार, साहित्य या प्रशासनिक सेवा के रिटायर्ड खब्ती बूढ़ों के काँधों पर पैर रखकर अपनी हांकने वाले ये कवि नही वस्तुतः भाट और चारण हैं।

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कुंठित वासनाओं, अतृप्त दमित इच्छाओं, अधूरी शिक्षा, भयावह बचपन, छोटे कस्बों के दंश, महानगरों के सीखे कुसंस्कार, विलोपित सी शब्द सम्पदा, किसी भी स्तर पर पारंगत ना होने का भान, अपढ़ अभिभावक, पहली शिक्षित पीढ़ी होने का गुमान, अंग्रेज़ी न आने का गहन अपराध बोध, निम्न आर्थिक स्थिति, गहरा काला या गेहुआँ रंग, ऊंचे सम्पर्कों का अभाव और उच्च महत्वकांक्षाएं एक कमजर्फ शख्स को कविता में ले आती हैं। खासकर सन् 1975-80 के बाद का परिदृश्य यही कहानी बयां करता है। ठेठ ग्रामीण या कस्बाई संस्कृति से आये कवियों में ये भाव व्यवहार में कम उनकी गंवई कविता में ज्यादा दिखते हैं और तीस पर त्यौरी ये कि कुछ महानगरों में धँसकर कुलीन भी हो गए। हिंदी कविता की झिर इन्होंने बन्द करके नया पानी कुओं में आने से रोका है।

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लेखन एक शौक, एक अदा, एक अभिव्यक्ति, एक तरह का प्रतिपक्ष रचना और अपनी बात कहना है और इसे यदि हम अपने रोज के कार्यकलापों के साथ कर पाएं तो बहुत बड़ी और सम्मानजनक बात है और मेरी नजरों में आप बहुत संवेदनशील और जवाबदेही से परिपूर्ण शख्स हो - मानवता से ओत प्रोत व्यक्तित्व, पर यदि आप इसी लेखन को चाहे वो लेख, शोधपरक लेख, कहानी, आलोचना, ललित निबंध, उपन्यास या कविता को ही अपना धन्धा बनाकर बाजार में दुकान जमाकर बैठ जाओ, बेचने लगो और हर जगह मुंह मारकर पुरस्कारों की जुगाड़ और फिर पुरस्कार या घर वापसी में जुगत जमाकर समाज में महान बनने की घटिया कोशिश कर रहे हैं या कर चुके हैं और अन्य बुरी आदतों की तरह इसके अभ्यस्त हो चुके हैं तो मुआफ कीजिये आप अपने जीवन का मूल मकसद खो चुके हैं, आपको किसी डॉक्टर शाहनी या चोपड़ा की जरूरत है। 

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कविता छूटने लगे और कवि चुकने लगे तो फिर वह निरापद हो जाता है और सिर्फ अध्यक्षीय वक्तव्य, बीज वक्तव्य या गपोड़ी की भूमिका निभाने के लायक रहता है। कुल मिलाकर वह एक गेरू पुता निर्लज्ज पत्थर हो जाता है भेरू, जिसे कहीं भी किसी भी हालात में बैठाया जा सकता है। हिंदी में इन दिनों बहुतेरे ऐसे कवि हैं जो निरापद हैं, इनके पास सिर्फ अतीत की वीभत्स कहानियाँ हैं। गपोड़ी किस्म की हरकतें झेलने, घर से बाहर दूसरे शहर में रात बिताने और इनकी भड़ास सुनने के लिए एक अवांगर्द भीड़ की इन्हें जरूरत होती है। अनुभव और बातचीत के नाम ये कविता की हत्या कैसे की गई और तत्कालीन साहित्य में कवि और कविता की छिछालेदारी कैसे, किसने की यही शेष होता है। विचित्र है कि इन्हें महान कहा जाता है समकालीन समय में।

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सुरा, सुंदरी और कविता का सहसम्बन्ध हमेशा से ही समानुपातिक रहा है इसलिए यदि कविता गोष्ठी, कविता पाठ, कविता पर बातचीत या कविता के अनुशीलन की मीमांसा हो या निकष की बात हो तो आप मानकर चलिये यह कविता के बहाने व्यक्ति विशेष, किसी सुंदरी या समुदाय के चारित्रिक गुण दोषों तक जाकर खत्म होगा। मजेदार यह है कि बेचारी कविता या विचारधारा व्यर्थ ही माध्यम बनते हैं- जबकि यह नितांत कवियों के आपसी निजी मुआमले होते हैं- व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा और अहम तुष्टि या जातिवादी मुद्दे होते हैं जिसे कवि शाब्दिक चतुराई और धूर्तपन से कभी शिल्प, बिम्ब , उपमा के बहाने सामने रखता है या विचारधारा के नाम पर दूसरे की अवमानना करता है। इस सुरा की लौ में बहते हुए वह नए नवेले कवियों के सामने पूरी मर्दानगी साबित करने के लिए होश खोने का नाटक करते हुए उन सब कवियों को भी महफ़िल में जीवित कर देता है जिनकी चार घटिया कविता छपने के बाद षोडशी की जरूरत पड़ गई थी। कविता की ये कलुषित छवि घातक ही नहीं बल्कि शर्मनाक भी है।

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इंसानी फितरत है या यह प्राकृतिक है कि हम अक्सर चीजों को, अपने आसपास को प्रायः खांचों में ही देखते हैं और यह बात को सोद्देश्य नहीं बल्कि अपने आप होती है इसलिए जब साहित्य को भी हम इसी तरह से विभिन्न विधाओं में बांटकर देखते हैं और उसमें भी छिद्रान्वेषण करते हुए काल, वाद, अदलित और दलित के रूप में बांट देते हैं तो यह विभाजन कविता के लिए थोड़ा मुश्किल या भारी हो जाता है। इसमें भी दिक्कत नहीं पर जब यह कविता के बहाने वर्ग, वर्ण या इंसानी बंटवारे पर आता है तो सबसे ज्यादा नुकसान होता है। इससे बाकी तो सब गड़बड़ होता ही है पर सबसे ज्यादा मोल कविता को चुकाना पड़ता है।

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कविता में एक उम्र होती है जो बिम्ब, उपमा, शिल्प और लय के साथ धीमे धीमे खत्म हो जाती है और बहुधा यदि इसे समय पर नहीं समझा गया तो कवि हंसी के पात्र हो जाते हैं। बुढ़ापे में युवाओं के साथ साथ अपने पाठकों की स्मृति में वे विदूषक बन जाते हैं और उन्हें विद्रूपता के साथ याद किया जाता है। बेहतर है कि एक समय के बाद कवि लिखना भी बंद करें, यहाँ वहाँ जाना भी और सार्वजनिक कार्यक्रमों में मंच से अपनी भद्द भी पिटवाने से बचें - अन्यथा इतिहास में जो भी चंद कागज़ आपके नाम पर दर्ज थे वे भी कालिख की शक्ल में जमा हो जायेंगे।

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हिंदी में कविता पाठ की शैली मंचीय कविताओं के हवाले कर देनी चाहिए जहां तालियाँ हैं, वाह वाही है, देशभक्ति या श्रृंगार की बहुलता हो। गंभीर किस्म की कविताओं का आस्वाद सिर्फ पढ़कर लिया जाता है, यदि कविताएँ अच्छी हों और बहुत तल्लीनता से लिखी गई हों तो गोष्ठियों में फोटो कॉपी करवाकर बाँट दो, पोस्टर बना दो, छोटे कागजों पर प्रिंट करके टांग दो - लोग बारी बारी से तसल्ली से पढ़ लें पर यदि इन कविताओं को कवि मंच से माइक पर किसी अभिनेता सा पढ़ेगा, समझ की उम्मीद करेगा, और तालियों की बाट जोहेगा तो माफ़ कीजिये वह कविता की यह निर्मम ह्त्या कर रहा है और शायद अपने अन्दर के कवि के वजूद की समाप्ति भी। ध्यान रहे कि अच्छी कविताओं को अच्छे कवि ही खत्म करते हैं और पाठकों से दूरी बनाने के वे अजेय दुर्ग साबित होते हैं।

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कविता में स्त्री को अब चूल्हा, चौका, रोटी-माटी या बेसन की गन्ध, फूल पत्ती से आगे आकर लिखना होगा क्योंकि अब स्त्री भी बदली है बहुत। जीवनानुभव की चौहद्दी में रहकर शोषण, पीड़ा और काल्पनिक दुनिया में उपेक्षित रहने का उपक्रम बहुत हो गया। आज वस्तुस्थिति यह है कि पुरुष की दुनिया भी उतनी ही एकान्तिक, शोषित और पूर्वाग्रहों वाली है तो क्या पुरुषों ने दीगर विषयों पर लिखना छोड़ दिया है - नहीं बल्कि वे ज्यादा मुखर और प्रखर होकर आवाज उठा रहे हैं विविध विषयों से।

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स्त्रियों को अपनी कविता में घर गृहस्थी से, प्रेम के अटपटे बिम्बों और आत्ममुग्ध सौंदर्यबोध से बाहर निकलना होगा क्योंकि यह सब लिखकर वह कुल मिलाकर पुरुष को ही सम्मोहित कर रही है और कविता की पितृ सत्ता उसकी इस कमजोरी का फायदा लेकर उसे पुनः उसी श्रृंगार और छायावादी युग ने धकेलने का कुचक्र रचता है जहां वह कहती रहें- मैं नीर भरी दुःख की बदली। 

स्त्रियो, कविता लिखने के नए बिम्ब चुनो और सदियों पुराने अनुष्ठानिक उपक्रमों को तोड़कर नया रचो वरना सभ्यता की दौड़ में तुम फिर एक काँधा ही तलाशती रहोगी और शिकारी कहानियाँ लिखते रहेंगे तुम्हारे सर्वस्व समर्पण की।


"कविता के नोट्स..." के पहले दो हिस्से यहां पढ़ सकते हैं

पहला भाग

http://www.janchowk.com/ART-CULTUR-SOCIETY/poet-and-poetry/1736

दूसरा भाग

http://www.janchowk.com/ART-CULTUR-SOCIETY/poet-and-poetry-part-two/1746

(लेखक संदीप नाईक एक कवि और कहानीकार हैं और देवास, मध्य प्रदेश में रहते हैं।)

(ये लेखक के निजी विचार हैं। आप इनसे सहमत-असहमत हो सकते हैं। अगर आप भी इस संदर्भ में कोई टिप्पणी या प्रतिक्रिया देना चाहते हैं, हस्तक्षेप करना चाहते हैं तो ‘जनचौक’ पर आपका स्वागत है। आप अपनी टिप्पणी या आलेख हमें janchowknews@gmail.com पर भेज सकते हैं। उचित आलेख को हम ‘जनचौक’ पर प्रकाशित करेंगे। धन्यवाद- संपादक)










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