कविता कोई पोस्टर या ब्रोशर नहीं है…

कविता के नोट्स , , शनिवार , 30-12-2017


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संदीप नाईक

कविता के नोट्स – एक कहानीकार के नजरिये से

(भाग-2)

जब तक कवि अपने संत्रास, अवसाद, पीड़ा, संताप, अपराध बोध और जलन जैसी स्वाभाविक प्रवृत्तियों से मुक्त नहीं होगा तब तक वह कम से कम कविता तो नहीं लिख सकता। प्रेम, देह, फूल, पत्ती, जुल्फों, घटाओं और ज्यादा से ज्यादा शोषण और स्त्रियों के शरीर पर भले ही कुछ बकवास जैसा लिख लें या अपने अतीत को शब्दों की बाजीगरी में उलीचकर उल्टियां करते रहें उससे कविता तो नहीं बनेगी।

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कविता को कुछ लोगों से वाकई बचना चाहिए खासकर उन लोगों से जो कविता को नुमाइश समझते हैं। कविता कोई पोस्टर या ब्रोशर नहीं है न ही किसी की उम्र का हिसाब करने का पैमाना कि आप दस बरस से चालीस, सत्तर साला वय सन्धि पर शरीर का नख शिख वर्णन करते हुए लिखते जा रहे हैं, खासकर स्त्रियां इसमें ज्यादा मुखर होकर सामने आईं और कुछ कवि भी। कविता की दुर्दशा यह तो नहीं है अगर दिशा न भी हो तो!!!

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हिंदी कविता को उन लोगों से बचाने की बेहद जरूरत है जो भाड़ खोलकर बैठे हैं और जैसा ग्राहक मांग रहा है- वैसा भूनकर दे रहे हैं और दिक्कत उनकी भी यह है कि ग्राहक भी पसेरी भर ज्वार, मक्का, बाजरा, धान या देसी चने छोड़कर हाईब्रीड सोयाबीन से लेकर खेसारी दाल ला रहे हैं भुनवाने के लिए, बाजार नकली और मिश्रित दलिया के गुणों की चारण परम्परा का राजधर्म निभा रहा है और इसमें सब कुछ झंझावात में पड़ गया है - ऐसे में जाहिर है श्रोता, पाठक, पुस्तकों, पत्रिकाओं और कवि के सामने चुनौती का गम्भीर सवाल है।

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कहानीकार और उपन्यासकार की भांति कवि भी अपने को स्वघोषित रूप से महान बनाने की अंधी दौड़ में लगा है पर वह यह नहीं जानता कि उनकी तरह से वह कविता में किसी को चीट नहीं कर सकता। कहानीकार और उपन्यासकार को यह छूट है कि वह कुछ भी वाहियात या अति लिखकर जमाने को बरगलाता रहे और घूम घूमकर अपनी महानता के किस्से छाती से चिपकाकर बांटता रहे पर कविता में बहुत थोड़े शब्दों में सच कहना होगा और कम से कम किसी आत्म दुष्प्रचार से बचना ही होगा।

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जो लोग कविता से सामाजिक, आर्थिक या राजनैतिक लक्ष्य हासिल कर अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं वे सिर्फ बकैत ही हो सकते हैं, ये वो कवि हैं जो खुद तो गले गले तक तो अनाचार, पाप, तिकड़म, मक्कारी, वासना और साहित्य के कुटिल साम्राज्य के मकड़जाल में फंसे हैं पर ज़माने से ईमानदारी की उम्मीद कर रहे हैं कि वह कविता जैसे भोंथरे हथियार से बदलाव की बयार ला दें।

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कवि को कविता से दिशा देने या सीधे कहूँ तो काडर बनाने की कोशिश छोड़ देनी चाहिए, ये काम उन लोगों को करने दें जो सिर्फ और सिर्फ अपने को इतिहास के हर्फ़ों में जमा करने के लिए अपने ही ताबूत में कीलें खोंस रहे हैं यहां वहां मुखौटे लगाकर। ये लोग साहित्य के काँधे पर चढ़कर अपनी छवि बनाकर लाशों का सौदा करना जानते हैं जो दूसरों की इमेज बिगाड़कर ही हो सकता है। कविता का काम इस सबसे आगे का है - जो मूल रूप से चेतना जागृत करने का है और कवि को यही करने का भरसक प्रयास करना चाहिए।

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प्रकाशक किसी भी रचना का नियंता नहीं हो सकता, विशुद्ध रूप से वह वणिक बुद्धि का वाहक है जो रचना को सिर्फ पाठक तक ले जाने का माध्यम है। कवियों का आधा समय इस प्रकाशक नामक प्राणी को रिझाने में चला जाता है जो पृष्ठों की संख्या या ले आउट के हिसाब से कतर ब्यौन्त करता है और कई बार तो इतना दुस्साहसी हो जाता है कि कविता के भाव ही बदल देता है और कवि उसके आश्वासनों पर - कि किताब की बिक्री दस लाख से ज्यादा करवा दूंगा, मर मिटता है और अपनी कविताओं की हत्या की सुपारी होशो हवास में इस प्रकाशक नामक सीरियल किलर को दे देता है।

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महाकवि कहलाने की होड़ में कितने नीचे गिर जाते हैं - लोग जो विचारधारा के पहरुए बने फिरते हैं वे आम लोगों सा जन्मदिन मनाते हैं, मनवाते हैं और उद्घोषणाएं करवाकर अपने को महान सिद्ध कर ही लेते हैं भले ही दो कौड़ी के किसी अख़बार में टुच्ची सी नौकरी करते हुए उस दरुए मालिक के सामने पिद्दी बने रहते हों पर बाहर आकर यूं दहाड़ते हैं जैसे कोई बड़ा युग दृष्टा आगाह कर रहा हो, ये महाकवि दुर्गुणों की खान में ही खप जाते हैं क्योंकि इनके आसपास वाले इन्हें महान बनाने से ज्यादा इनके मरने का इंतज़ार करते हैं। इन पर भरोसा करना यानी अपनी इज्जत दांव पर लगाना है पर एक बात है इनके चाटुकारों की जमात कविता ही नहीं, कहानी, उपन्यास और प्रकाशकों की गिद्ध बिरादरी में भी है।

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जीवनभर सरकार, पब्लिक सेक्टर, बनियों, साहूकारों, बीबियों और नगद नारायण की गुलामी करते हुए जो लोग घर-बाहर, दफ्तर और बाजार में लोगों का शोषण करते रहें, नौकरी छोड़कर कविता, कहानी और साहित्य की सेवा के नाम पर संगठन बनाकर यूनियनबाजी करते रहें वे हिंदी कविता के अश्लीलतम लोग हैं और इन लोगों को सिर पर बैठाकर इनकी हवाई कविता से आप उम्मीद करते हैं कि ये लोग अपनी एय्याशी और कम्फर्ट ज़ोन छोड़कर हिंदी के आखिरी सिरे पर खड़े आदमी के लिए कविता लिखेंगे तो जनाब आप भी इनकी महफ़िल में जाकर जॉनी वाकर का एक पेग लगाइए और भावनाओं का दरिद्र व्यापार करने वाली कविता लिखिए और सरकार के मुखिया को जनपक्षधरता दिखाते हुए जनता को बरगलाइये किसी बांध या विस्थापन को लेकर - बस जॉनी वाकर सरकार प्रायोजित हो।

(जारी...)

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(संदीप नाईक एक कवि और कहानीकार हैं और देवास, मध्य प्रदेश में रहते हैं। उनके ये नोट्स हम तीन किस्तों में प्रकाशित कर रहे हैं। तीसरा और अंतिम भाग कल, 31 दिसंबर को)

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?????? :: - 12-30-2017
इतना खरा-खरा बोलने का काम सिर्फ संदीप नाईक ही कर सकते हैं ....साधुवाद....मजा आ गया पढ़कर ।