"कविता का लिखा जाना एक घटना नहीं एक सायास षड्यंत्र है"

कवि और कविता , , शुक्रवार , 29-12-2017


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संदीप नाईक

कविता के नोट्स – एक कहानीकार के नजरिये से

(भाग-1)

लम्बे समय तक कहानी लिखता रहा और फिर सोचा कि काम की व्यस्तताएं हैं इसलिए लम्बी कहानी लिखना संभव नहीं हो पा रहा है, पर लिखने की तड़प थी, और पढ़े-लिखे बिना चैन नहीं पड़ता, बल्कि यूँ कहूं कि लिखने-पढ़ने से ही शान्ति मिलती है, वर्तमान हालात को जज्ब करना और मुर्दा शान्ति से जी लेना एक संवेदनशील व्यक्ति के लिए संभव नहीं है लिहाजा कविता में लगा कि थोड़ा काम कम है कहानी की तुलना में। सो कविता को लिखने के साथ कविता के बारे में पढ़ना भी शुरू किया। ‘नई कविता के प्रतिमान’ नामवर जी की किताब से शुरू हुआ यह स्वाध्याय हिंदी के कई कवियों के रचनाकर्म और रचना प्रक्रिया पर खत्म सा होता नजर आया। इस बीच कविताएँ लिखीं और शुक्र कि पाठकों, संपादकों को पसंद आई। अस्तु यहाँ वहाँ छपी भी। देश के कई जगहों पर कविता पाठ के लिए बुलाया गया सो गया और तालियाँ भी समेट कर लाया। इस पूरी प्रक्रिया में हिंदी के काव्य संसार से दो चार होने का मौक़ा मिला। कवियों से मिला –छोटे, बड़े, स्थापित, घिसे पिटे, पुरस्कृत और पुरस्कार की लालसा में मृत प्रायः हो रहे कवियों से भी मिलना हुआ। उनके साथ बातचीत भी हुई, शराब के दौर भी और निजी जीवन भी शेयर किया। 


मुझे लगा की यह हिंदी कविता का ऐसा दौर है जहां प्रकाशक हिंदी कविता की किताब छापने से डरता है और इधर कवि पापड़ बड़ी उद्योग की तरह रोज कविता पे कविताएँ लिखे जा रहा है। सोशल मीडिया पर अमूमन दस हजार कविताएँ रोज संभवतः लिखी जा रही हैं और इनमें से बहुत कुछ अच्छी भी हैं बहुत खराब भी। 


बहरहाल, इस दौरान मैंने कुछ नोट्स लिखे थे जो यहाँ एकत्रित किये हैं कि शायद इनसे कुछ समझ बनें:-


भाषा, शिल्प, अलंकार, उपमा और शब्द खो देने पर कवि के पास कुछ भी नही बचता सिवाय निंदा, जलन, ईर्ष्या और कुंठा के और यह क्रमिक मौत की शुरुआत है।

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कविता को पढ़ना, गुनना या ज्यादा उत्साही होकर अमर बनाने से उसे वर्तमान के सापेक्ष देखना जरूरी है। अक्सर कवि अतीतजीवी होते हैं जो न खुद प्रासंगिक हो पाते हैं न कवित्व कर पाते हैं।

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दरअसल कविता को छोड़कर कवि सब कुछ लिखता है और फिर उसकी बेचैनी और भटकन ही उसे अपयश देती है। यह शब्दों के घातक उपयोग, जबरदस्ती के प्रयोग, अतिवाद और लिखते समय यश की कामना ही एक खराब कविता को जन्म देकर कविता को दिव्यांग बनाती है।

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कविता का लिखा जाना एक घटना नहीं एक सायास षड्यंत्र है साहित्य में, इसकी व्यूह रचना से लेकर इसे पोषित करने और खड़ा कर परोसने में कवि माहिर ही नहीं निष्णात भी होता है।

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ज्यादा भाषाई होने से या एकदम कम भाषाई होने से भी कविता का लालित्य और फ्लो खत्म होता है। हिंदी का कवि अपना ज्ञान या शेखी बघारने के चक्कर में ये दोनों भूलें अक्सर करता है और फिर फ्रस्ट्रेट होता रहता है। कुढ़न में कुंठित होकर आखिर में अपने आप को खत्म करता है। 

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हिंदी की कविता में लगभग तीस प्रतिशत योगदान प्राध्यापकों का है - कम से कम अस्सी के बाद की कविता में और इसमें भी अंग्रेजी पढ़ाने वालों का और भी ज्यादा, इनके साथ दिक्कत यह है कि ये मानक अंग्रेजी से लेते है और घटिया कविता हिंदी में परोस कर भीड़ से अलग दिखने की कोशिश में वे इलियट या जॉन किट्स, कोलरेज या वर्ड्सवर्थ को अपना आदर्श मानते हैं परन्तु इनके पास हिंदी का डिक्शन नहीं और प्रतीकों की तो स्पष्ट समझ भी नहीं है।

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कविता का कोई धर्म नहीं होता - ना ही विचारधारा, वह सिर्फ कविता होने की मांग करती है पर हमारे कवि लट्ठ लेकर कविता में कविधर्म निभाते हुए विचारधारा का तड़का लगाकर अपने को महान बना लेते हैं और इस तरह से कविता को खेमों में बांटकर कवि आत्ममुग्ध होता रहता है।

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आज की कविता को चुके हुए और इतिहास हो चुके कवियों के शिकंजे से निकलना और निकालना बहुत जरूरी है क्योंकि ये पुराने लोग जो निहायत ही निठल्ले थे और रोज़ी रोटी की चिंता से मुक्त थे, फांकाकशी में भी निभा लेते हैं, सिर्फ कविता करते थे इसलिए बहुत लिख गए पर आज के कवि बाज़ारवाद से जूझ रहे हैं और इन्हें अपनी जिजीविषा इनके सारे साहित्यिक घटिया कृत्यों के साथ बनाये रखना है।

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हिंदी कविता से आप बदलाव की कोई उम्मीद न करें और न ही कविता किसी आंदोलन को लेकर लिखी जाती है। नर्मदा आंदोलन जो तीस पैंतीस साल चला मुझे स्व. श्याम बहादुर नम्र के अलावा कोई कवि याद नहीं पड़ता जिसने लाखों आदिवासियों की पीड़ा को साहित्य में दर्ज किया हो (और इस कविता को भी पाठकों ने दुर्लक्ष किया - सिर्फ एकलव्य नामक संस्था ने किताब छापी और फ्री में बांटी) जबकि मालवे में कवि इतने हैं कि पत्थर मारोगे तो ये उचक कर पकड़ लेंगे - जो नोबल लेने को बेचैन हैं ससुरे, पर निकृष्टता हमेंशा चरम पर रही है।

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कविता और सामाजिक बदलाव का कोई सह सम्बन्ध नहीं है, यह बात कवियों को गांठ बांध लेनी चाहिए। जिस दुष्यंत, गोरख पांडे, पाश या लाल सिंह को पढ़कर जोश में आये, कइयों ने एक्टिविज़्म की राह पकड़ी उनकी मौत की कहानी भयावह है। कवि या तो क्रांति लिखकर इस मौत को चुनें वरना श्रृंगार रस में रास रचें - सेनापति, बिहारी और रसखान बनकर इतिहास के सफों में जगह पाएं, या फिर हिम्मत हो तो ग़दर बनकर लाखों की भीड़ के सामने गाने की हिम्मत करें और वरवर राव सा सीना रखें।

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लोकप्रियता और पैठ तक जाना कविता के दो आयाम हैं, सड़क छाप कवि सम्मेलनों में भी कविता पैठ तक जाती है और लोकप्रिय होकर भी असर नहीं छोड़ती। कवि को यह तय करना होगा कि वह क्या और क्यों लिख रहा है। अपनी लोकप्रियता बढ़ाने के लिए कविता के काँधे पर रखकर बंदूक चला रहा है या एक परस्पर जलन और पीड़ा में लोकप्रियता हासिल करने के लिए बेहद घटियापन पर उतरकर अपने झंडे गाड़ना चाहता है या सच मे कविता को एक परम्परा में पैठ करने की हद तक पहुंचाने की सम्यक दृष्टि से लिख रहा है।

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कविता करना और कविता को जीना सिर्फ मुहावरा नहीं वरन एक शाश्वत सत्य है, इसके लिए विभिन्न प्रकार के अंतर आनुषंगिक सम्बन्ध, अनुशासनिक विषय और भाषाओं को सीखना होगा, खुद आगे होकर नया सीखने, पढ़ने, गढ़ने और रचने की तार्किक क्षमता बढ़ानी होगी, उम्र के लिहाजों से परे जाकर खुले दिल और उन्मुक्त दिमाग़ से सबको समझना और स्वीकारना भी होगा, आप सस्ते शब्दो, कुंद और जाले लगी मानसिकता से एक ही भाषा और पुरातन पंथी इतिहास के बरक्स अपने को महान मानकर कविता रचते रहेंगे तो वह कूड़े के अलावा कुछ और हो भी नहीं सकता।

(जारी...)

(संदीप नाईक एक कवि और कहानीकार हैं और देवास, मध्य प्रदेश में रहते हैं। उनके ये "कविता के नोट्स" हम तीन किस्तों में प्रकाशित करेंगे। दूसरा भाग कल, 30 दिसंबर को)

(ये लेखक के निजी विचार हैं। आप इनसे सहमत-असहमत हो सकते हैं। अगर आप भी इस संदर्भ में कोई टिप्पणी या प्रतिक्रिया देना चाहते हैं, इस बहस को आगे बढ़ाना चाहते हैं, हस्तक्षेप करना चाहते हैं या फिर कोई आपत्ति ही दर्ज कराना चाहते हैं तो ‘जनचौक’ पर आपका स्वागत है। आप अपनी टिप्पणी या आलेख हमें janchowknews@gmail.com पर भेज सकते हैं। उचित आलेख को हम ‘जनचौक’ पर प्रकाशित करेंगे। धन्यवाद- संपादक)










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?????? ????? :: - 12-29-2017
वाह... बेहतरीन आलोचना व विचारोत्पादक लेख. यह कटुसत्य है कि भाषा की समझ नहीं होते हुए भी लोग कविता मढ़ रहे हैं. शब्दावली का कोई स्तर नहीं होता... बस तुकबंदी करके स्वघोषित कविराज बन बैठे हैं.... #शुभकामनाएं

Rashmi :: - 12-29-2017
Very nice