एक कवि की संदिग्ध मौत, साहित्यिक-सांस्कृतिक संगठनों ने की जांच की मांग

श्रद्धांजलि , स्मृति शेष, सोमवार , 28-08-2017


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जनचौक स्टाफ

दलित साहित्य के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर जय प्रकाश लीलवान की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। 23 अगस्त को वे गुड़गाँव में एक सड़क के किनारे पुलिस को बेहोशी की हालत में अपनी कार के पास पड़े मिले थे वहाँ से पुलिस उन्हें नजदीक के एक सरकारी अस्पताल में ले गई फिर उन्हें दिल्ली एम्स लाए गए, जहां चिकित्सकों ने उन्हें ब्रेन डेडघोषित कर दिया परिवार ने उम्मीद नहीं छोड़ी और उन्हें वहाँ से गुड़गाँव के मेदांता अस्पताल ले आया गया। जहां 26 अगस्त को दिन के करीब तीन बजे उन्होंने अंतिम सांस ली

साहित्यिक-सांस्कृतिक संगठनों ने उनकी मौत पर दुख प्रकट करते हुए मौत के कारणों की जांच की मांग की है। 'जनचौक' भी लीलवान जी को अपनी ओर से श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनकी मृत्यु के कारणों की जांच की मांग का समर्थन करता है। इन कारणों का जल्द खुलासा होना चाहिए।

जन संस्कृति मंच का लोगो।

जसम का शोक संदेश

जन संस्कृति मंच के लिए राम नरेश राम की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि समय की आदमखोर धुनके खिलाफ खड़े होने वाले कवि थे जयप्रकाश लीलवान। वे दलित साहित्य के अनुभवाधारित आक्रोश को विचारधारात्मक परिप्रेक्ष्य देने वाले थे। उनकी मौत संदिग्ध परिस्थितियों में हुई है उनकी कार का एक्सीडेंट नहीं हुआ वह सही-सलामत अवस्था में पुलिस को खड़ी मिली लीलवान को सिर्फ सिर में चोटें आईं ये चोटें गंभीर थीं और संभवतः अंदर खून जम गया था उनकी मौत के कारणों का शीघ्र खुलासा होना चाहिए
दिल्ली के बेर सराय में 11 नवंबर 1966 (स्कूली दस्तावेज के अनुसार 4 मई, 1965) में जन्मे जय प्रकाश लीलवान का परिवार मूलतः हरियाणा के झज्जर जिले की तहसील बहादुरगढ़ के निलोठी गाँव का था जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए., एम.फिल. करने के बाद वे इंडियन आयल कॉरपोरेशन लिमिटेड में राजभाषा अधिकारी हो गए थे इस साल वे पटियाला से स्थानांतरित होकर दिल्ली आ गए थे उनकी रचनात्मक सक्रियता बढ़ गई थी और वे एक साथ कई विधाओं में लेखन और प्रकाशन की योजनाएं बना चुके थे इसी साल उनके तीन महत्वपूर्ण काव्य संग्रह छपे थे
जय प्रकाश लीलवान के लेखन का आरंभ आलोचनात्मक निबंधों से हुआ था बाद में वे कविता विधा की तरफ मुड़े और फिर इसी को समर्पित हो गए उनकी कविताओं का पहला संग्रह अब हमें ही चलना हैसन 2002 में छपा उसके बाद 2009 में उनके दो चर्चित संग्रह प्रकाशित हुए- नए क्षितिजों की ओरऔर समय की आदमखोर धुन इसके बाद 2013 में ओ भारतमाता ! हमारा इंतजार करनाछपा चार साल के अंतराल के बाद 2017 में उनके चार संग्रह एक साथ आए- कविता के कारखाने में’, ‘लबालब प्यास’, ‘धरती के गीतों का गणतंत्रऔर गरिमा के गीतों का गणित उनकी चयनित कविताओं का अंगरेजी अनुवाद भी इसी साल आया
जय प्रकाश लीलवान आंबेडकरवादी समाजवाद में यकीन रखते थे मार्क्सवाद से उनका गहरा लगाव था और वे प्रगतिवादी चिंतकों, रचनाकारों से सतत संवाद में थे दलित कविता को दृष्टि संपन्न, विचार संपन्न और विजन संपन्न बनाने में उनका योगदान ऐतिहासिक माना जाएगा फासीवाद के भारतीय संस्करण की उन्हें गहरी पहचान थी और उनका मानना था कि एक समान विचार वालों का संयुक्त मोर्चा बनाए बगैर इस चुनौती का मुकाबला नहीं किया जा सकता उन्होंने अपनी अत्यंत महत्त्वपूर्ण लंबी कविता समय की आदमखोर धुनमें लिखा-
आओ कॉमरेड
कि हम आज
शत्रु के
उत्तेजित संवादों का 
सधा हुआ प्रत्युत्तर देने को
अपनी ऐतिहासिक 
अटूट एकता के 
संगठन में ढल जाएं

जन संस्कृति मंच अपने इस अग्निधर्मी कवि के प्रति अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता है।

जनवादी लेखक संघ का लोगो।

जलेस की श्रद्धांजलि

दरअसल / तुम / जिन चीज़ों के वारिस हो कवियो / विरासत के उन्हीं हथियारों से / इन्हीं खेतों में / हमारे हक़ों का / शिकार किया जाता रहा है.

ये पंक्तियां प्रखर दलित कवि जयप्रकाश लीलवान की हैं, जिनकी असामयिक मौत से हम सभी स्तब्ध हैं. दो दिन पहले ख़बर मिली थी कि वे एक दुर्घटना का शिकार होकर गुड़गांव के मेदांता अस्पताल में भर्ती हैं और डॉक्टरों ने उन्हें ब्रेन-डेड घोषित कर दिया है। दुर्घटना का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला था, क्योंकि वे अपनी जिस कार के दरवाज़े से बाहर सड़क पर पाए गए थे, वह पूरी तरह से सुरक्षित थी। उनके सिर पर गहरी चोटें थीं, ऐसा बताया जाता है।

जयप्रकाश लीलवान के कविता-संग्रह समय की आदमखोर धुनऔर नए क्षितिज की ओरअत्यंत महत्वपूर्ण संग्रह हैं। नया पथमें उनके संग्रहों की समीक्षा करते हुए वरिष्ठ आलोचक नित्यानंद तिवारी ने लिखा था: जयप्रकाश लीलवान की कविता जिस तरह दलितार्थगर्भित विद्रोही मनुष्य को खड़ा करती है, वह अपनी पूर्ववर्ती विद्रोही परम्परा से जुड़ती भी है, लेकिन उसके तापकी डिग्री, रूपांतर से अधिक एकदम नयी सामाजिक रचनाके विकल्प की ज़रूरत का संकेत करती है, जहां समताचरितार्थ हो सके. इस अर्थ में वह मूलगामी है।” 

लीलवान जी की आकस्मिक मृत्यु अत्यंत दुखद है। जनवादी लेखक संघ, इंडिया दिवंगत कवि को श्रद्धा-सुमन अर्पित करता है।

 










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