‘वीरेन’… मानी पैदा करता जीवन : मंगलेश डबराल

पुण्यतिथि पर विशेष , , बृहस्पतिवार , 28-09-2017


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मंगलेश डबराल

यह यकीन करना कठिन है कि वीरेन हमारे बीच और इस दुनिया से चला गया है. बार-बार यह भ्रम होता है कि वह यहीं कहीं है, कभी भी मिल जायेगा, मिलते ही गले से लगेगा और अपने मस्तमौलापन में हमें इस तरह बहा ले जाएगा कि हमारी उदासी या नहूसत कम से कम उतनी देर के लिए दूर हो जाएगी जितनी देर वह हमारे साथ रहेगा. ‘जाना’ क्रिया की उसके व्यक्तित्व से संगति नहीं बैठती थी, वह हमेशा ‘आता’ हुआ होता था और उससे पहली बार मिलनेवाले को भी यह नहीं लगता था कि वह पहली बार मिल रहा है. लगातार कम होती हुई संवेदनाओं के इस समय में जब पुराने परिचित भी कभी-कभी इस तरह मिलते हैं जैसे पहली बार मिल रहे हों, वीरेन की शख्सियत में एक शाश्वत आत्मीयता थी. ‘दोस्तो, तुम कि जिनसे ज़िंदगी में मानी पैदा होते हैं’—शमशेर बहादुर सिंह की यह मशहूर पंक्ति वीरेन की  ज़िंदगी पर पूरी तरह लागू होती थी.

आउटलुक हिंदी से साभार।

"ऐ ग़मे दिल क्या करूँ"

वीरेन से पहली मुलाक़ात को याद करने पर सरोजिनी नगर की बाबू बस्ती का वह कमरा याद आता है जहाँ त्रिनेत्र जोशी और मैं एक सरकारी कर्मचारी शर्माजी के क्वार्टर में ‘सबलेटिंग’ में रहते थे. सरोजिनी नगर के पास सफदरजंग हवाई अड्डे से सटी हुई सड़क देर रात हम आवारगी करते हुए घूमते थे. रात की उस वीरानी के बीच आसमान में चाँद निकला होता और नीचे वीरेन मजाज़ की मशहूर नज़्म ‘आवारगी’ को गाता हुआ चलता : ‘फिर महल की आड़ से नकला वो पीला माहताब/ जैसे मुल्ले का अमामा जैसे बनिये की किताब/ जैसे मुफलिस की जवानी जैसे बेवा का शबाब/ ऐ गमे दिल क्या करूँ / ऐ वहशते दिल क्या करूँ.’ हम दोस्त लोग भी तब मुफलिस की जवानी जैसे दौर में थे  और यह नज़्म हमारे जीवन का अक्स लगती थी: ‘ये रुपहली रात और आकाश पर तारों का जाल/जैसे सूफी का तसव्वुर जैसे आशिक का ख़याल/ हाय लेकिन कौन जाने कौन समझे जी का हाल’. यह शायद सन १९७० या ७१ की बात है. मैं उन दिनों साप्ताहिक ‘हिंदी पेट्रियट’ में था जहाँ मुझे बहुत काम करना पड़ता था. त्रिनेत्र उन्हीं दिनों दिल्ली आया था और रोज़गार खोज रहा था. दोस्तों का एक अच्छा-खासा समूह इर्द-गिर्द जमा हो गया था और तमाम अभावों के बीच हम लोगों ने इस दिल्ली के भीतर अपनी एक दिल्ली खोज ली थी जो कनॉट प्लेस के शामियाना कॉफ़ी हाउस (जिसे शहर के व्यवस्था-विरोधी बुद्धिजीवियों का अड्डा होने के कारण इमरजेंसी के दिनों में संजय गाँधी ने ढहा दिया), मोहन सिंह प्लेस के टेरेस वाले  कॉफ़ी हाउस, दोस्तों की नौकरी के छोटे-मोटे दफ्तरों और सड़कों को पैदल नापने तक फैली हुई थी. कुछ ही समय पहले हुई नक्सलबाड़ी की ‘वसंत गर्जना’ की गूँज दिल्ली की हवाओं में भी व्याप्त थी और बौद्धिक दुनिया में लोहियावाद और गैर-कांग्रेसवाद का फैशन था. अकविता-अकहानी आन्दोलन के लेखक और उस समय के प्रतिष्ठित साहित्यकार प्रायः कुछ संभ्रांत किस्म के टी हाउस में बैठते, लेकिन हम उसे यथास्थितिवादी जगह मान कर मोहन सिंह प्लेस को बेहतर समझते जहाँ के कई बेयरों से हमारी इस क़दर दोस्ती हो गयी थी कि हम न सिर्फ खाने-पीने का उधार करते, बल्कि घर लौटने के लिए बस का किराया भी उनसे मांग लेते. कॉफ़ी हाउस के निचले तल्ले पर भी चाय की एक दूकान थी जिसके मालिक एक मुस्लिम थे. लेकिन लोग उन्हें ‘पंडित-जी’ कहते थे. उनसे भी इसी तरह उधारी का रिश्ता था. आनंद स्वरूप वर्मा, आलोक धन्वा, अजय सिंह, सईद, प्रभाती नौटियाल, इब्बार रब्बी, गिरधर राठी, असग़र वजाहत आदि से दोस्ती भी इसी दौर की देन है जब कठिन संघर्षों के बावजूद हम लोग बेपरवाह थे और परिवर्तनकारी लहरों के साथ खुद को शिद्दत से बहता हुआ महसूस करते थे. तमाम मुफलिसी के बावजूद एक तत्कालीन स्वप्न और उम्मीद से हमारे चहरे चमकते रहते थे. जीवन इस क़दर सामूहिक था कि अदृश्य-सा कम्यून हमारे दिल और दिमाग में बसा हुआ था और हमारे अलग-अलग नाम भी समूहवाचक संज्ञाओं की तरह थे. वीरेन तब इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ता था और जब भी आता, हमारे साथ रुकता. उन दिनों एक पत्रिका में छपी  उसकी कविता ‘भूगोल-रहित’ की चर्चा थी.

वीरेन के साथ एक ही घर में

कुछ वर्ष बाद जब मैं भोपाल से होता हुआ दैनिक ‘अमृत प्रभात’ के रविवारी परिशिष्ट को निकालने इलाहाबाद पंहुचा तो वीरेन के साथ एक ही घर में रहने का संयोग हुआ. उन दिनों दिल्ली रंगमच के विख्यात अभिनेता, शास्त्रीय संगीत के गहरे जानकार और मेरे लिए बड़े भाई का दर्जा रखने वाले विश्व मोहन बडोला वहाँ ‘नॉर्दर्न इंडिया पत्रिका’ में समाचार संपादक थे, इस अंग्रेजी दैनिक ने आज़ादी की लड़ाई में अंग्रेजों का विरोध करने के कारण प्रतिष्ठा अर्जित की थी और अब वह हिंदी दैनिक निकालने जा रहा था. मेरे इलाहाबाद पहुँचने से पहले ही बडोला-जी ने मेरे रहने की जगह तय कर दी थी: ज़्यादातर बंगाली लोगों और शेखर जोशी, भैरव प्रसाद गुप्त, नरेश मेहता और ज्ञानरंजन जैसे कई लेखकों की बस्ती लूकर गंज और खुसरो बाग रोड पर उपेन्द्रनाथ अश्क के घर के बीच एक मकान में एक फ्लैट था जिसके एक  कमरे में वीरेन और उसकी पत्नी रीता भाभी थीं और एक कमरा मेरे पास था जहाँ कुछ दिनों बाद मेरी पत्नी संयुक्ता भी आ गयी थीं. रसोई और बैठक साझा थीं. रात में रेलवे स्टेशन से ट्रेन के भोंपू की आवाज़ आती तो घर के पास स्थित ‘बमपुलिस’ से कुत्तों का भौकना सुनाई देता. कभी-कभी देर रात को घर लौटते समय कुत्तों का समवेत भौंकना तेज़ हो जाता तो वीरेन घबरा जाता, लेकिन  मैं कहता: ‘डरो नहीं. बस अपनी  चाल में थोड़ा सा फ़ौजी अकड़ पैदा करो, कुत्ते खुद ही डर जायेंगे’, और यह तरकीब कारगर साबित होती.

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वीरेन का शोध और ख़बरों का संपादन

वीरेन ‘हिंदी कविता में मिथक और प्रतीक’ विषय पर  शोध करने के लिए बरेली कॉलेज से अवकाश लेकर आया था, लेकिन शोध की तरफ कम ही तवज्जो देता था. सुबह मैं दफ्तर चला जाता तो कुछ देर बाद वह  भी तैयार होकर एडमंस्टन रोड पर ‘पत्रिका हाउस’ का रुख करता जहाँ उसके कई दोस्त बन गए थे जिनमें मनोहर नायक प्रमुख था जिसके साथ उसने मेरे इलाहाबाद से लखनऊ चले आने के बाद ज़्यादातर वक़्त बिताया. ‘अमृत प्रभात’ में वह मनोहर के साथ बैठकर खबरें बनाने लगता तो कभी रविवारी परिशिष्ट की रचनाओं का संपादन करके बेहतर बना देता. उसने ‘घूमता आइना’ नाम से एक साप्ताहिक स्तंभ लिखना भी शुरू किया जिसमें आम तौर पर खबरों से बाहर रहने वाली घटनाओं, स्थितियों, जगहों और लोगों के बारे में चुस्त और विलक्षण टिप्पणियाँ होती थीं. शहर के विशाल बंगलों की निर्वात नीरवता, उनके पेड़ों पर जमी धूल, उनके स्थिर पत्तों, विश्वविद्यालय और उसके इर्द-गिर्द के जीवन की हलचलों, भारी-भरकम अंग्रेजी नामों वाली सड़कों की दुर्दशा और ऐसी ही विडंबनाओं की पड़ताल के कारण यह एक लोकप्रिय स्तंभ बन गया था. एक बार वीरेन ने प्रेमचंद के बेटे और जाने-माने साहित्यकार अमृत राय के घर की नफासत और सजावट का ज़िक्र करते हुए लिखा कि ‘ प्रेमचंद अगर होते तो उन्हें वहां प्रवेश करते हुए घबराहट होती.’ याद आता है कि अमृत राय इस टिप्पणी से नाखुश भी हुए थे. पत्रकारिता से गहरा लगाव वीरेन को बाद में लखनऊ के ‘अमृत प्रभात’ में शौकिया राजनीतिक रिपोर्टिंग करने और अंततः अध्यापन से छुट्टी लेकर ‘अमर उजाला’ की संपादकी तक ले गया जहाँ उसने कई और कुछ अच्छे कुछ खराब युवा पत्रकारों को संवारने का भी काम किया.

सिविल लाइन्स की शामें

अक्सर हम लोग शामें बिताने सिविल लाइन्स आ जाते जहां एक छोर पर नीलाभ प्रकाशन और कॉफ़ी हाउस थे, जिनके सामने रेलिंग थीं, जिनके ऊपर नीम के दरख्तों से गिरी हुई पत्तियों ढेरियाँ बनाकर जलाई जाती थीं और उनका कसैला सा धुआं हवा में मंथर रफ़्तार से घुलता रहता. सिविल लाइन्स एक विस्तीर्ण जगह था, जिसकी धूप-छांह की झिलमिलाहट चमत्कृत करती थी. उसे अंग्रेजों ने बहुत व्यवस्थित तरीके से बसाया था, लेकिन उसमें एक खास ग्रामीणता बची हुई थी. हमारा कुछ समय नीलाभ प्रकाशन में बीतता और कुछ उससे सटे हुए कॉफ़ी हाउस के भीतर या उसके अहाते में, जहाँ बहुत से नामी-अनामी वकील, लेखक और प्राध्यापक आते-जाते दिखते. इलाहाबाद के प्रायः सभी लेखक कॉफ़ी हाउस आते थे. सबकी अपनी मंडलियाँ थीं. नयी कविता  या ‘परिमल’ दल के लोग—विजय देव नारायण साही, रामस्वरूप चतुर्वेदी, जगदीश गुप्त, विपिन कुमार अग्रवाल, लक्ष्मीकांत वर्मा, केशवचंद्र वर्मा आदि प्रायः साथ बैठे नज़र आते. हम लोग इन इलाहाबादी दिग्गजों से एक खास दूरी बना कर रहते. वीरेन रामस्वरूप जी के निर्देशन में शोध कर रहा था और अपने काम पर ज़रा भी ध्यान नहीं देता था इसलिए उनसे कतराता और उन्हें देखकर टॉयलेट में भी चला जाता. यह पता चलने पर रामस्वरूप-जी ने एक दिन वीरेन को रोका और अपराध-बोध के साथ कहा: ‘वीरेन-जी, क्या आप मुझे देखकर टॉयलेट में चले जाते हैं? भई, ऐसा मत कीजिये. आप आराम से शोध कीजिये. जब कभी  कोई अध्याय पूरा हो जाये तो मुझे दिखा दीजियेगा.’ साही-जी की बौद्धिकता और रोमांचकारी मिथकीय कविता के प्रति हम लोगों में वाकई सम्मान था लेकिन उनके निकट जाने से भी परहेज़ करते. एक दिन उन्होंने मुझे बुलाकर कहा: ‘अरे, आप तो मिलते ही नहीं. मैंने अभी आपकी ‘रेल में सात कविताएँ’ पढ़ीं और मुझे युवा शमशेर की याद आ गयी.’ सिविल लाइन्स के कोने पर एक ‘लैंडमार्क’ की तरह स्थित उस बड़े चर्च के पास भी हम लोग बैठते, जिसकी ख़ामोशी उसके आकार जितनी बड़ी लगती. इतने बड़े चर्च में कोई दिखाई नहीं देता था इसलिए उसका सन्नाटा दिन में भी कुछ रहस्यमय लगता और उसके अहाते में जाकर जोर से किसी को पुकारने की इच्छा होती. उसकी रेलिंग पर बैठकर दो-चार बार हमने शराबनोशी भी की.

महादेवी-जी से मुलाकात

वीरेन के पास एक पुराना लम्ब्रेटा स्कूटर था और मनोहर के पास एक पुरानी साइकिल, जिसका एक पैडल टूटा हुआ रहता था. इन वाहनों पर बैठकर मैंने इलाहाबाद की सड़कों की काफी सैर की. मनोहर नायक की साइकिल की विचित्र गति थी: भीड़-भरी सड़कों पर वह बहुत तेज़ हो जाती, लेकिन जैसे ही सड़क खाली मिलती, मनोहर का उत्साह और साइकिल का वेग, दोनों मंद पड़ जाते. मनोहर किसी खिलाड़ी की तरह अजब करतब करता हुआ साइकिल चलाता था. एक बार उसने एक तांगे के घोड़े के मुंह के नीचे से ही साइकिल निकाल ली और तभी संयोग से तांगेवाले ने अपना चाबुक फटकारा, जो मेरी पीठ पर लगा. मनोहर के साथ कभी-कभी महादेवी–जी के घर जाना भी होता था जहां वीरेन के पुराने मित्र रामजी पांडे के परिवार से मिलना अछा लगता. रामजी महादेवी-जी का लम्बा साथ देने वाले साहित्यकार गंगाप्रसाद पांडे के पुत्र थे और उसी घर में सपरिवार रहते थे. हम लोगों के आने पर अक्सर महादेवी-जी  बैठक में चली आतीं और हमें कुछ खाये बगैर नहीं लौटने देतीं, लेकिन हमारे पास उनसे बात करने के लिए कुछ ख़ास नहीं होता था क्योंकि कुछेक गीतों को छोड़कर हमें महादेवी की रचनाएँ पसंद नहीं थीं और महादेवी भी शहर के साहित्यिक दायरे में करुणा की निष्क्रिय प्रतिमूर्ति बन चुकी थीं. अच्छी बात यह थी कि कुछ शालीन शालीन वाक्य कह कर वे थोड़ी देर बाद चली जाती थीं. मनोहर पर उनका विशेष स्नेह था क्योंकि उसकी सितारवादक मां महादेवी-जी के महिला विद्यापीठ की छात्रा और महादेवी की प्रिय शिष्य रह चुकी थीं. उन्हीं दिनों एक खबर या अफवाह भी सुनी कि महादेवी-जी को ‘शुद्धता’ और ‘पवित्रता’ का ऐसा जुनून है कि हर बार किसी से मिलने के बाद वे स्नान करती हैं और इस तरह उन्हें दिन में कई बार नहाना पड़ता है.

ज्ञानरंजन का आना

इलाहाबाद तब हमारे लिए जीवंत और जादुई हो उठता था जब जबलपुर से ज्ञानरंजन आते थे. वे जबलपुर में बस गए थे, लेकिन इलाहांबाद उनके भीतर से जाता नहीं था, वह उनकी आत्मा में अपनी ही एक कहानी ‘अमरूद के पेड़’ या शहर में होनेवाले बड़े आकार के मीठे अमरूदों की खुशबू की तरह बसा हुआ था. वे लौट-लौटकर इलाहाबाद आते जैसे कभी गए न हों और उनके प्यार में इतनी भावुकता थी कि जब  शहर बर्बाद होने और भू-माफिया और बिल्डरों के कब्जे में आने लगा तो हताश होने के बावजूद उनके प्रेम में कोई कमी नहीं आयी. उनकी आखिरी कहानी ‘ अनुभव’ इस त्रासद बदलाव को दर्ज भी करती है. ज्ञान भाई के दो संस्मरण और कई कहानियाँ  इसके उदाहरण हैं कि वे किस नायाबी और अनंतता  के साथ अपने शहर को जीते थे. यह कहना बेहतर होगा कि उनकी हर रचना का विषय इलाहाबाद है, भले ही उसमें इलाहाबाद न हो. ज्ञान इस शहर के महान ‘लघुमानवों’ के साथ भूल कर भी नहीं बैठते थे, बल्कि उनकी दोस्ती वीरेन, नीलाभ, बडोला-जी और मुझसे थी या फिर उन लोगों से, जिनका साहित्य से कोई नाता नहीं था, जो आवारगी और हर जगह ‘मिसफिट’ रहने का जीवन पसंद करते थे. उनकी गहरी मित्रता कवि प्रभात से भी थी जो कुछ अद्भुत कवितायेँ लिखने के बावजूद या इसी वजह से पागलपन के शिकार हो गए थे. कहते थे कि एक प्रेम-प्रसंग में निराश होने के बाद वे खुद को संभाल नहीं पाये. प्रभात कभी एकदम सुबह पैदल आकर हमारे घर में दस्तक देते, हम उन्हें चाय-नाश्ता  और कभी-कभी वापस जाने का किराया भी देते. कवि होने का ऐसा तर्कातीत और विचलित करनेवाला आयाम मैंने पहली बार देखा था. हम उनसे इतने सम्मान से पेश आते जैसे अपने दौर के निराला से मिल रहे हों. ज्ञान भाई के आने पर जैसे पूरा इलाहाबाद चहक उठता और शहर एक बुद्धिजीवी भी खुश हो उठते जैसे कोई बिछुड़ा हुआ घर लौट आया हो. इलाहाबाद आलोचकों और पर-निंदकों के लिए भी मशहूर रहा है, लेकिन ज्ञान भाई की कभी कोई निंदा सुनने में नहीं आयी. हद से हद लोग यह शिकायत करते थे कि शहर का सबसे योग्य साहित्यिक बेटा यहाँ से चला गया.

बडोला-जी से ज्ञानरंजन की गहरी दोस्ती इलाहाबाद में ही शुरू हुई. उनका घर भी लूकरगंज में ही था. जहाँ बहुत सी शामें गुज़रतीं , पीना-पिलाना होता और बडोला-जी अपनी बांसुरी जैसी मीठी आवाज़ में शास्त्रीय गायन करते. मालकौंस, यमन, शुद्ध कल्याण, मिश्र गारा, पीलू, शिवरंजनी, जनसम्मोहिनी, खम्भावती, मालगुंजी  और बहुत से पहाड़ी गीत. फ़िल्मी गीत वे कभी नहीं गाते थे और सिर्फ ‘मन तड़पत हरि दर्शन को आज’ या ‘कोई सागर दिल को बहलाता नहीं’ और ‘हाये रे वो दिन क्यूँ ना आये’ को मालकौंस और जनसम्मोहिनी रागों का उम्दा उदाहरण मानते. उन्होंने कई वर्ष तक बाकायदा शास्त्रीय गायन की शिक्षा ली थी और कुछ समय डागर बंधुओं से ध्रुपद भी सीखा था, लेकिन फिर पत्रकारिता और रंगमंच को समर्पित हो गए. मुझमें शास्त्रीय संगीत के लिए एक दीवानगी थी, इसलिए कभी–कभी तरंग में आकर मैं भी गाने लगता और फिर शरारतन पूछता कि बताइए, यह कौन सा राग है, तो वे कहते, ‘‘हाँ, तुम भ्रष्ट कल्याण गा रहे हो!’. मेरा तथाकथित गायन शुरू होने पर वीरेन अपने दोनों कानों पर अंगुलियाँ रख लेता या मेरा मजाक उड़ाते हुए खुद गाने लगता. लेकिन उनके घर की ये बैठकें सिर्फ मौज-मज़े के लिए नहीं थीं, बल्कि उनसे हमारी संगीत संवेदना पुख्ता हुई और ‘पहल’ के कविता अंक की योजना भी यहीं बनी जो बाद में ‘इस नवान्न में’ नाम से पुस्तक रूप में छपा और आज भी याद किया जाता है. बडोला-जी के घर सुशीला भाभी का बनाया हुआ स्वादिष्ट भोजन भी खूब किया. खाने की यादें अश्क-जी के घर की भी हैं जहाँ हम अक्सर टमाटर वाले ऑमलेट-परांठे खाते थे. अश्क –जी की पत्नी कौशल्या-जी ‘गुड्डे’ यानी नीलाभ का दोस्त होने के नाते हमारी खूब आवभगत करतीं और अश्क-जी चाहते कि हम नीलाभ से ज्यादा उनकी संगत में बैठें. नीलाभ से अक्सर सुबह की नमस्ते हो जाती थी जब वह अपनी छत पर आता था. वीरेन बहुत पारिवारिक किस्म का प्राणी था इसलिए उस घर के सभी लोगों का चहेता था. 

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जब वीरेन ने कविता को गंभीरता से लेना शुरू किया

इलाहाबाद का वह समय सुन्दर और उर्वर था. जयशंकर प्रसाद की एक कविता पंक्ति याद करें तो ‘यौवन तेरी शीतल छाया’ में बैठने की तरह. अजनबी हवाओं में उड़ते पत्ते जैसी मेरी ज़िंदगी में कुछ स्थिरता आयी, वीरेन ने कविता को अपेक्षाकृत गंभीरता से लेना शुरू किया और हमारी वैचारिक प्रतिबद्धता मज़बूत हुई. अक्सर मैं वीरेन को कविता लिखने के लिए कोंचता रहता और वह कहता: यार, कल कुछ लाइनें लिखी थीं. मैंने किताबों के बीच कहीं उस कागज़ को तिरछा और आड़ा करके रखा है. कभी वह कहता कि मैंने उसे कहीं गोल करके रखा हुआ है और फिर उस तिरछी और आड़ी और गोल कविता को ढूँढने की कवायद शुरू हो जाती. इसके बावजूद वीरेन ने उस दौर में कुछ बेहतरीन कवितायेँ लिखीं. मसलन, ‘समय’, ‘मक्खी’,’समोसे’, ‘छावनी’,’गाय’, ‘ऊँट; ‘मेरा बच्चा’,’कवि’, ‘सड़क के लिए सात कवितायेँ’ आदि और ‘पर्जन्य’, वरुण’,’इंद्र’, ‘द्योस’ जैसी वैदिक सन्दर्भों की और ‘रामसिंह’ जैसी कविता भी, जिन्होंने वीरेन  को एक महत्वपूर्ण जनवादी कवि के रूप में पहचान दी. मेरी ही तरह  वीरेन के लिखने की रफ़्तार बहुत कम थी क्योंकि कविता के प्रति उसके भीतर कुछ ऐसा भाव था जैसे वह एक पवित्र और मानवेतर काम हो—प्रेम करने की ही तरह—और हम जैसे नश्वर दुनियावी लोग उसे कभी -कभी और वह भी थोडा-सा कर सकते हों. ’इश्क मीर एक भारी पत्थर है, कब ये तुझ नातवां से उठता है’—मीर तकी मीर का यह शेर हमारा आदर्श वाक्य था. लगता था कि कविता के लिए एक दूसरी तरह का, कबीर, निराला और मुक्तिबोध जैसा बीहड़ जीवन ज़रूरी है. वीरेन कबीर की पंक्तियों को भी उद्धृत करता था: ‘कबिरा सैल सिषर घर, बाट सलेली सैल/ जहाँ न पिपीलिका चढ़ी सके, लोगन लादे बैल.’ मीर का एक और शेर याद आता: ‘ले सांस भी आहिस्ता कि नाज़ुक बहुत है काम/आफाक की इस कारगहे शीशागरी का’ और इसी के साथ शमशेर-जी की कीमियागरी भी याद आती जिनके अद्भुत स्नेह की छाया मुझे दिल्ली में नसीब हुई  थी. इस तरह हम कविता न लिख पाने की ग्लानि से बचे रहते थे और हमारी लापरवाही और आलस्य का आलम यह था कि ज्ञान भाई मज़ाक में हम दोनों को प्रेमचंद की कहानी ‘कफन’ का ‘घीसू-माधव’ कहने लगे थे. हम दोनों इस बात पर सहमत थे कि अच्छा मनुष्य होना अच्छा कवि होने से कहीं ज्यादा ज़रूरी है. किसी बात की आलोचना करने के लिए ‘अमानवीय’ एक ऐसा शब्द था जो मेरे कारण चलन में आ गया था.

कोई मतभेद या विवाद नहीं

हम लोग करीब तीन वर्ष साथ रहे, लेकिन याद नहीं आता कि हमारे बीच कोई गंभीर मतभेद या विवाद हुआ हो. वीरेन के बेटे तुर्की का जन्म हो गया था और वह अपनी अराजकता और गृहस्थी के बीच एक प्रीतिकर संतुलन बनाये रखता और इन दो दुनियाओं को मिलाने में कोई तनाव नहीं महसूस करता. वह शुरू से ही उत्फुल्ल, नाटकीय और लोगों को खुश रखने वाला मनुष्य था. दूसरी तरफ मैं अगर असामाजिक नहीं तो कुछ गैर-सामाजिक किस्म का व्यक्ति ज़रूर था जिसे अपनी हताशाओं और अवसाद से प्रेम था, और मुझे सामाजिक शऊर देने और थोडा-बहुत खुश रहना सिखाने में जिन लोगों की बड़ी भूमिका रही, उनमें  वीरेन भी था. ज्ञान भाई की ही तरह उसे भी इलाहाबाद से जैविक किस्म का लगाव था: उसकी पढाई वहां हुई थी, उसकी ससुराल वहां थी और अब वह डी-लिट करने भी वहाँ आ गया था. उसकी ‘इलाहाबाद: १९७० ‘ और ‘सड़क के लिए सात कविताएँ’ इस प्रेम का उदाहरण हैं:’ मैं तुझे ले जाता हूँ अपने साथ/ जैसे किनारे को ले जाता है जल.’ उस घर में शहर और बाहर के भी बहुत से मित्रों की आवाजाही थी. वह कई कॉमरेडों का रात का ठिकाना भी था जो उन दिनों भूमिगत होने के कारण छद्म नामों से जाने जाते थे और जिनमें से कुछ के  वास्तविक नाम हमें बहुत बाद में तब  पता चले जब वे भूमिगत जीवन से बाहर आ गये. वे प्रायः देर रात में प्रवेश करते और सुबह होते ही प्रस्थान कर जाते. उनके आने पर वीरेन कुछ ख़ुशी और कुछ आशंका से भर उठता, लेकिन हम यह ज़रूर महसूस करते कि क्रान्तिकारी परिवर्तन के काम में हमारा यह न्यूनतम योगदान है. एक बार इब्बार रब्बी हमारे घर रुका तो शाम को मौज में आकर वीरेन और उसने लोकनाथ गली में जाकर भांग वाले गुलाबजामुन खा लिये. वीरेन उसे झेल गया लेकिन रब्बी अगले पूरे दिन लगभग बेसुध लेटा रहा. मुझे चिंता हुई कि पता नहीं क्या होगा, लेकिन वीरेन इस वानस्पतिक नशे से ग्रस्त विश्वविद्यालय के छात्रावासों में रह चुका था और भांग के ऐसे असर से परिचित था.    

‘अरे, उरे, पूरे, उपूरे, दरे, दपूरे’

वीरेन को छंद बहुत आकर्षित करते थे और उन पर उसकी पकड़ भी थी. जनता की पक्षधर कविता तो वह लिखता ही था, लेकिन ऐसी कविता भी लिखने की इच्छा रखता था जिसके शब्दों का कोई अर्थ न हो, बल्कि जिसके शब्दों का कहीं अस्तित्व न हो और वे उस कविता में ही पहली बार प्रकट हुए हों. इसके लिए कविता और उसके ढाँचे में बड़ी तोड़फोड़ ज़रूरी थी. हमारे सामने अकविता के दौर में लिखी गयी मुद्राराक्षस की ‘द्रा द्रा द्रा मु मु मु रा रा रा’ जैसी कविताओं के उदाहरण थे, लेकिन वीरेन  का मकसद यह नहीं, एक सर्वथा अनस्तित्वात्मक कविता लिखना था. बाद में उसने एक कविता में ‘अरे, उरे, पूरे, उपूरे, दरे, दपूरे’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल ज़रूर किया लेकिन वे निरर्थक नहीं थे, बल्कि रेलवे डीविजनों के संकेतक थे. दरअसल वीरेन की संवेदना में निराला-शमशेर सरीखा क्लासिकी तत्व और तोड़फोड़ करने वाला अवांगार्ड एक साथ मौजूद थे. बाद के वर्षों में उसने ‘सूअर के बच्चे का प्रथम वर्षा-दर्शन’, ‘मानवीकरण’, ‘कुछ कद्दू चमकाए मैंने’ जैसी कविताओं से यह बताया कि वह एक तरफ छंद और दूसरी तरफ विरूपता को किस खूबी के साथ कविता में साध सकता है. उसने जनगीत-नुमा रचनाएँ भी लिखीं जिनमें से ‘इतने भले नहीं बन जाना साथी’, आयेंगे उजले दिन ज़रूर’ और ‘यह हमने कैसा समाज रच डाला है’ गोष्ठियों में काफी पढ़ी-गायी जाती हैं. चीज़ों को देखने के उसके विलक्षण कोण की बाबत नीलाभ ने एक बार एक प्रसंग सुनाते हुए कहा : ‘सोवियत संघ और फ़िनलैंड के बीच समुद्र में मछली पकड़ने पर गहरा विवाद हो रहा था और विश्लेषक कहीं सोवियत तो कहीं फ़िनलैंड के नज़रिए से टिप्पणियाँ कर रहे थे. इस पर एक टिप्पणीकार ने कहा कि अब मछलियों के नज़रिए से इस समस्या को देखा जाना चाहिए. वीरेन के पास वही मछलियों वाला नजरिया है.’

आउटलुक हिंदी से साभार।

लखनऊ-इलाहाबाद छूटा पर वीरेन का साथ नहीं छूटा

सन १९८० में जब ‘अमृत प्रभात’ लखनऊ  से शुरू हुआ तो मुझे सम्पादकीय टीम को जुटाने के लिए वहाँ भेज दिया गया. इलाहाबाद से जाना किसी सुखद सपने से बाहर आने की तरह था जिसका बस एक स्पर्श या आभास हमेशा के लिए भीतर छूट गया हो. लखनऊ में भी कुछ पुराने दोस्त जुट गए थे: अजय सिंह, मोहन थपलियाल, अनिल सिन्हा. लेकिन वीरेन जब-तब वहाँ आता रहता. अखबार के समाचार संपादक कमलेश बिहारी माथुर उसकी रिपोर्टिंग और भाषा से प्रभावित थे और वीरेन भी पत्रकारिता में आना चाहता था. लखनऊ आकर उसने इंदिरा गाँधी के रायबरेली दौरे की अच्छी रिपोर्टिंग की थी, लेकिन अंततः इलाहाबाद लौट गया ताकि अपना शोध कार्य पूरा कर सके. तीन साल बाद दिल्ली से ‘जनसता’ का प्रकाशन हुआ तो मुझे उसके संस्थापक-संपादक प्रभाष जोशी ने बुला लिया. मैं लखनऊ नहीं छोड़ना चाहता था क्योंकि ‘नवभारत टाइम्स’ के संपादक राजेंद्र माथुर ने मुझे वहा से प्रकाशित होने जा रहे संस्करण में नियुक्ति दे दी थी, लेकिन वीरेन और मनोहर नायक ने मुझे जबरन और बगैर टिकट अपने साथ  ट्रेन के एसी डिब्बे में ठूंस दिया जहाँ संडास के पास बेंच पर हमें जगह मिली. मनोहर को भी ‘जनसत्ता’ में इंटरव्यू के लिए जाना था, लेकिन वीरेन ने अपने घर बरेली उतरकर हमारे लिए दो टिकट लिए और दोनों को दिल्ली पंहुचा दिया. इलाहाबाद और लखनऊ इस तरह मुझसे छूट गए, लेकिन वीरेन का साथ नहीं छूटा और अंत तक बना रहा.

एक-दूसरे की आदत

हमें एक दूसरे की इतनी आदत हो गयी थी कि वह जब भी दिल्ली आता, शायद पहला फ़ोन मुझे ही करता. इन वर्षों के दौरान हमने मस्ती की, एक साथ जगह-जगह की यात्राएँ कीं, ट्रेनों के टॉयलेट तक  में शराब के हालक़ से  उतारी,  झगडे भी किये, लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ कि वीरेन ने मेरी किसी बात की गाँठ बाँध ली हो. कितना भी विवाद हो, अगले दिन फ़ोन पर उसकी आवाज़ ज़रूर सुनाई पड़ती : ‘कहो भइए!’  एक बार एक जाने-माने आलोचक ने एक महत्वपूर्ण  समकालीन कवि की आलोचना में कुछ कहा जो मुझे गलत और अनुचित लगा और मैंने उनकी बैठक से यह कह कर वाकआउट कर दिया कि हम कवि लोग हिंदी का नमक नहीं खाते हैं. कुछ देर बाद मैंने पीछे मुड़कर देखा कि वीरेन भी चला आ रहा है. मित्रताएं कसौटियों, आइनों और प्रकाश स्तंभों की तरह होती हैं, हम उनमें  खुद को देखते हैं, खुद को उन पर कसते-परखते हैं ताकि पता चल सके कि हम  सही हैं या नहीं और कहीं भटक तो नहीं गए हैं. हम शायद इसी तरह के मित्र थे—एक दूसरे के भीतर कोई राह ढूँढते हुए, एक दूसरे के लिए ‘साउंडिंग बोर्ड’ का काम करते हुए. वीरेन के लिए तो शायद सभी दोस्तियाँ आइनों की मानिंद थीं जिनमें वह अपना अक्स देखना चाहता रहा. शमशेर जी ने एक बार रघुवीर सहाय को पत्र में लिखा था कि किसी भी कवि के लिए तीन चीज़ें ज़रूरी है: ऑक्सीजन, मार्क्सवाद  और अवाम के आईने में अपनी छवि. हम इस कसौटी को खुद पर भी लागू करना चाहते थे. यह अकारण नहीं था कि वीरेन मेरी बहकों और सनकों की आलोचना भी करता और यह कहते हुए उन्हें दुरुस्त करने की कोशिश करता कि ‘मुझे दूसरों की नहीं, तुम्हारी चिंता है.’ हमारे परिवार में संयुक्ता और दोनों बच्चों से उसे गहरा लगाव था और उसके आने पर वे ख़ुशी से भर उठते. कुल मिलाकर वह हमारी पीढ़ी का सबसे चहेता कवि हो गया था. कभी-कभी यह ज़रूर लगता कि वह हरदिलअजीज़ी की गिरफ्त में आ रहा है, किसी के जीवन में हस्तक्षेप करने से कतराता है और हरेक की जड़ता या यथास्थिति को स्वीकार कर लेता है.

कैंसर से बहादुरी से लड़ा

यह वीरेन की जीवनोन्मुखता ही थी कि वह कई वर्ष तक कैंसर जैसे रोग से बहादुरी के साथ लड़ता रहा. बार-बार की सर्जरी ने उसके शरीर को जर्जर बना दिया था. कभी-कभी यह आशंका होती थी कि कोई भी मुलाक़ात उससे आखिरी मुलाक़ात हो सकती है और यह ख़याल आने पर आँखें नम हो जातीं, लेकिन फिर उसके जीवट को देखकर कुछ भरोसा बंधता और उसकी कविता की पंक्ति याद आती: ‘ जब आये हैं यहाँ तलक चलकर /तो आगे भी चलकर जायेंगे’ या अर्नेस्ट हेमिंग्वे के उपन्यास द ओल्ड मैन एंड द सीका यह वाक्य याद आता कि ‘इंसान को ख़त्म किया जा सकता है,  लेकिन उसे पराजित नहीं किया जा सकता’.’ गंभीर बीमारी से जूझने के बावजूद उसने हताशा को घर नहीं करने दिया और उसके व्यवहार में ज़रा भी आत्मदया नहीं आयी. इसका साक्ष्य उन कविताओं में भी मिलता है जो उसने इस दौरान लिखीं और जिनमें सारी यंत्रणा के हवालों के बावजूद प्रतिरोध, प्रेम और महान आशावाद का उसका पुराना जज्बा बरकरार दिखता है: ‘अहर्निश चलते इस महासंग्राम में/ हे महाजीवन चल सकूं कम से कम/ एक कदम तेरे साथ/ प्रेम के लिए/ शांति के लिए/ उन बच्चों के लिए/ जिन्होंने अभी चलना ही सीखा है/ और बहुराष्ट्रीय पूंजी के कुत्ते/ देखो अभी से उन पर घात लगाए हुए हैं.’ इसी कविता में वीरेन अपने जीने की लालसा की वजह भी बतलाता है:‘ उसी आदमखोर जबड़े को थोडा सा भी /टूटता हुआ देखने के लालच से भरे है/ ये मेरे युद्धरत देह और प्राण.’ अपनी देह और प्राणों के साथ युद्धरत वीरेन अंततः वीरेन चला गया, लेकिन यह जाना एक अपराजेय व्यक्ति का जाना है.

एक अच्छा कवि पहले एक अच्छा मनुष्य होता है

एक सच्ची रचना की मार्फ़त अक्सर उसके पीछे छिपे रचनाकार की पहचान उभर आती है और कविता हमें उस मनुष्य तक भी पंहुचा देती है जिसने उसे लिखा है. वीरेन पर यह बात पूरी तरह लागू होती थी कि एक अच्छा कवि पहले एक अच्छा मनुष्य होता है. दरअसल, कविता  वीरेन की पहली प्राथमिकता भी नहीं थी, बल्कि उसकी संवेदनशीलता और इंसानियत के भविष्य के प्रति अटूट आस्था का ही एक विस्तार, एक आयाम थी, उसकी अच्छाई की एक अभिव्यक्ति और एक पगचिन्ह थी. तीन कविता संग्रहों में प्रकाशित उसकी कविताएँ अपनी अनोखी विषय वस्तु और शिल्प के प्रयोगों के कारण महत्वपूर्ण हैं जिनमें से कई जन आन्दोलनों और सभाओं का हिस्सा बनीं. यह देखकर कुछ हैरत होती है कि उनकी रचना एक ऐसे कवि ने की है जो व्यवस्थित होकर नहीं लिखता रहा. यह कविता बहुत मामूली,  नगण्य कही जाने वाली चीज़ों और लोगों को प्रतिष्ठित करती है, उनके प्रति अपना प्रेम दर्शाती है और इसी के ज़रिये अपनी  प्रतिबद्ध और वाम राजनीति को भी तैयार करती है. वह एक अजन्मे बच्चे  को मां की कोख में फुदकते रंगीन गुब्बारे की तरह फूलते-पिचकते, कोई शरारत भरा करतब सोचते हुएमहसूस करती  है , दोस्तों की गेंद जैसी बेटियों को अच्छे भविष्य का भरोसा दिलाती है और उसका यह प्रेम मनुष्यों, पशुओं, पक्षियों, वनस्पतियों, हवाओं, रेलगाड़ियों, फेरी वालों, नींबू, इमली, चूने, पाइप के पानी, पोदीने, पोस्टकार्ड, चपाल और भात तक को समेट लेता है. इस उदात्त भावना में  पीटी ऊषा के लिए जितना लगाव है  उतना ही स्याही की दावात में गिरी हुई मक्खी और बारिश में नहाये सूअर के बच्चे के लिए भी है. यहाँ तक कि एक पेड़ पर पीले-हरे चमकते हुए पत्तों को देखकर कवि कहता है: पेड़ों के पास यही एक तरीका है/ यह बताने का कि वे भी दुनिया से प्यार करते हैं.’.

सचमुच एक दुनिया ख़ामोश हो गई

वीरेन की संवेदना के एक सिरे पर शमशेर बहादुर सिंह जैसे सौंदर्य के कविहैं तो उसका दूसरा सिरा जनकवि नागार्जुन की देशज और यथार्थपरक कविता से जुड़ता है. दोनों के बीच में निराला हमेशा दिखते हैं, जिनसे वीरेन आज के अँधेरे समय से लड़ने की ताक़त हासिल करता रहा: मैं कवि हूँ पाया है प्रकाश.उसकी कविता पूरे संसार को ढोनेवाली / नगण्यता की विनम्र गर्वीली ताक़तकी पहचान करती हुई कविता है जिसके विषय वीरेन से पहले हिंदी  में कभी नहीं आये. उसके दोस्तों और प्रशंसकों की दुनिया भी इतनी बड़ी थी जितनी  शायद किसी दूसरे समकालीन कवि की नहीं होगी. हम दोनों के साझा दोस्त असद जैदी ने वीरेन के निधन पर एक जगह मीर की रुबाई –‘’मिलिए उस शख्स से जो आदम होवे/ गुरूर अपने हुनर पे जिसे कम होवे’—का हवाला दिया था जिसमें किसी ऐसे व्यक्ति से मिलने की ख्वाहिश ज़ाहिर की गयी है जो सचमुच मनुष्य हो, जिसे अपने हुनर पर अहंकार न हो, जो अगर कुछ बोले तो पूरी दुनिया सुनने के लिए इकट्ठा हो जाए और जब वह खामोश हो तो लगे कि एक दुनिया ख़ामोश हो गयी है.वीरेन की  शख्सियत ऐसी थी कि लगता है, उसके खामोश होने से सचमुच एक दुनिया खामोश हो गयी है. यह ख़ामोशी, नीरवता और कमी उसके बेशुमार दोस्तों के भीतर बनी हुई रहेगी.

 

(उद्भावना की ओर से वीरेन डंगवाल की याद में जनवरी-2016 में प्रकाशित पुस्तक मैं तुम्हारा कवि हूं से साभार।)










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yashwant :: - 10-11-2017
पूरा पढ़ गया. वीरेन दा का चेहरा लगातार घूमता रहा. उन्होंने हम जैसे कई पत्रकारों को तराशा निखारा और संबल दिया. यशवंत

????? :: - 10-11-2017
पूरा पढ़ गया. वीरेन दा का चेहरा लगातार घूमता रहा. उन्होंने हम जैसे कई पत्रकारों को तराशा निखारा और संबल दिया. यशवंत