“लकड़बग्घे की हंसी” को बेपर्दा कर चले गए देवताले

श्रद्धांजलि , , मंगलवार , 15-08-2017


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मुकुल सरल

यह दहशत तो है...चुनौती भी...लकड़बग्‍घा हंस रहा है...इन विशिष्ट पंक्तियों के लेखक वरिष्ठ कवि चंद्रकांत देवताले नहीं रहे। उनका जाना पूरे साहित्य जगत को शोक संतप्त कर गया है। जनवादी लेखक संघ और जन संस्कृति मंच समेत तमाम साहित्यिक-सांस्कृतिक संगठनों और लेखकों ने उनके निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया है।

जनवादी लेखक संघ।

जनवादी लेखक संघ के महासचिव मुरली मनोहर प्रसाद सिंह और उप-महासचिव संजीव कुमार की ओर से जारी श्रद्धांजलि पत्र में कहा गया है कि वरिष्ठ कवि श्री चंद्रकांत देवताले का निधन हिन्दी के लेखक-पाठक समाज को शोक-संतप्त कर देनेवाली ख़बर है। वे एक महीने से अधिक समय से दिल्ली के पटपड़गंज स्थित एक अस्पताल में भर्ती थे, जहां कल रात उनका देहावसान हुआ। आज ( मंगलवार, 15 अगस्त) दिल्ली के लोधी रोड के विद्युत शवदाहगृह में दिन के 2:30 बजे उनका अंतिम संस्कार किया गया। 

1936 में बैतूल में जन्म

81 वर्षीय देवताले जी का जन्म 1936 में मध्यप्रदेश के बैतूल ज़िले के जौलखेड़ा गाँव में हुआ था। मध्यप्रदेश के विभिन्न राजकीय कॉलेजों में अध्यापन करते हुए और फिर सेवानिवृत्त जीवन जीते हुए वे लगातार सृजनशील बने रहे। साठ के दशक में ही हिन्दी कविता के एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर के रूप में उनकी पहचान क़ायम हुई, अलबत्ता पहला संग्रह सत्तर के दशक में शाया हुआ। अपने पचपन सालों से अधिक के साहित्यिक जीवन में उन्होंने 13 कविता-संग्रह और एक आलोचना-पुस्तक के अलावा एकाधिक संपादित और अनूदित पुस्तकें हिन्दी को दीं। जीवन से गहरा जुड़ाव, संघर्षों का ताप, विषयों की अद्भुत विविधता और अतिसाधारण चीज़ों से बड़ी कविता निकाल लाने वाली संवेदनात्मक तीक्ष्णता उनकी कविताओं की विशेषता है।

साभार

13 कविता संग्रह

उनके संग्रह हैं:  हड्डियों में छिपा ज्वर (1973), दीवारों पर खून से (1975), लकड़बग्घा हँस रहा है (1980), रोशनी के मैदान की तरफ (1982), भूखंड तप रहा है (1982), आग हर चीज में बताई गई थी (1987), बदला बेहद महँगा सौदा (1995), पत्थर की बैंच (1996), उसके सपने (1997), इतनी पत्थर रोशनी (2002), उजाड़ में संग्रहालय (2003), जहां थोड़ा सा सूर्योदय होगा (2008), पत्थर फेंक रहा हूँ (2011) मुक्तिबोध पर 'मुक्तिबोध: कविता और जीवन-विवेक' शीर्षक से उनकी आलोचना-पुस्तक है। मराठी के महत्वपूर्ण कवि दिलीप चित्रे की कविताओं का उन्होंने अनुवाद किया जो 'पिसाटी का बुर्ज़' नाम से पुस्तकाकार प्रकाशित है.

साहित्य अकादमी समेत कई पुरस्कार
देवताले जी को अपने जीवन-काल में साहित्य अकादमी पुरस्कार समेत अनेक पुरस्कार और सम्मान प्राप्त हुए। इनमें मुक्तिबोध फेलोशिप, माखनलाल चतुर्वेदी कविता पुरस्कार, मध्य प्रदेश शासन का शिखर सम्मान, सृजन भारती सम्मान, कविता समय पुरस्कार, मैथिलीशरण गुप्त सम्मान और पहल सम्मान मुख्य हैं।
जनवादी लेखक संघ श्री चन्द्रकांत देवताले के महत्वपूर्ण योगदान को याद करते हुए उन्हें अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता है। 

जन संस्कृति मंच।

जसम की श्रद्धांजलि

जन संस्कृति मंच के लिए राम नरेश राम की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि हंसते हुए लकड़बग्घे की शिनाख़्त करने वाले कवि देवताले का इस समय जाना दुखदायी है। साठोत्तरी हिंदी कविता के प्रमुख हस्ताक्षर देवताले जी उच्च शिक्षा में अध्यापन कार्य से संबद्ध रहे हैं। 'उजाड़ में संग्रहालय' शीर्षक संग्रह में उन्होंने लिखा-

'महानायकों महाकथाओं से रहित
खंख होते समय में पत्थर की खड़ा रहा मैं देर तक
सोचने लगा जिन औरतों को 
नंगा करके सताया और घुमाया जा रहा है
शायद वे भी पत्थर, मिट्टी-सीमेंट की कैद से 
आज़ाद हुई होंगी'

देवताले जी की कविता में समय और सन्दर्भ के साथ ताल्लुक रखने वाली सभी सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक प्रवृत्तियाँ समा गई हैं। उनकी कविता में समय के सरोकार हैं, समाज के सरोकार हैं, आधुनिकता के आगामी वर्षों की सभी सर्जनात्मक प्रयोग हैं।  

कविता की विशेषता
सैद्धांतिक दृष्टि से आप उत्तरआधुनिकता को मानें या न मानें,देवताले जी की कविता में आधुनिक सभ्यता की क्रूरताओं, विडम्बनाओं और त्रासदियों को धुंधला बनाने वाली कोई छाया नहीं है। वे सच का उसकी समूची वीभत्सता में बयान करते हुए भी उसे गहरी मानवीय करुणा का स्पर्श दे सकने की दुर्लभ क्षमता रखने वाले कवि हैं। व्यवस्था द्वारा की जा रही सुव्यवस्थित हत्याओं पर मुआवज़ा बांटने वाले लकड़बग्घे की हंसी को बेपर्दा करने का दम देवताले की कविता में ही था।  
उनकी कविताओं के अनुवाद प्रायः सभी भारतीय भाषाओं में और कई विदेशी भाषाओं में भी हुए हैं।
देवताले की कविता की जड़ें गांव-कस्बों में

देवताले की कविता की जड़ें गाँव-कस्बों और निम्न मध्यवर्ग के जीवन में हैं। उसमें मानव जीवन अपनी विविधता और विडंबनाओं के साथ उपस्थित हुआ है। वह अपनी बात सीधे और मारक ढंग से कहते हैं। उनकी  कविता की भाषा में  पारदर्शिता और अर्थ की लय नए कवियों के लिए सीखने की चीज है।
अपने कवि के प्रति जन संस्कृति मंच श्रद्धांजलि अर्पित करता है। 

दिवंगत कवि चंद्रकांत देवताले। साभार

सोशल मीडिया पर भी बहुत कवि-लेखकों ने देवताले जी को श्रद्धांजलि देते हुए उनकी कविताएं साझा कीं।

ऐसी ही एक विशेष कविता आज के समय में बार-बार पढ़ने लायक है 

 

''जिसे सड़क से उठा सिंहासन पर बिठाया तुमने 

और बदले में जिसने 
दुःस्वप्नों के जंगली कुत्तों को छोड़ा तुम्हारी नींद में 
वही दयालु प्रभु 
आ रहा फाँसीघर का शिलान्यास करने 

जय दुन्दुभी बजाने में कोई कसर नहीं रहे 
सताये हुए लोगो 
तुम्हारी सहिष्णुता सदियों चर्चित रहेगी इतिहास में''

 

अंत में देवताले जी की बेहद चर्चित कविता एक बार फिर पढ़ते हैं 

 

'लकड़बग्घा हंस रहा है'

फिर से तपते हुए दिनों की शुरुआत

हवा में अजीब-सी गंध है
और डोमों की चिता
अभी भी दहक रही है
वे कह रहे हैं
एक माह तक मुफ्त राशन
मृतकों के परिवार को

और लकड़बग्‍घा हंस रहा है... 

हत्‍यारे सिर्फ मुअत्तिल आज
और घुस गए हैं न्‍याय की लंबी सुरंग में
वे कभी भी निकल सकते हैं
और किसी दूसरे मुकाम पर
तैनात ख़ुद मुख्‍त्‍यार
कड़कड़ाते अस्‍पृश्‍य हड्डियों को
हंस सकते हैं अपनी स्‍वर्णिम हंसी
उनकी कल की हंसी के समर्थन में
अभी लकड़बग्‍घा हंस रहा है

जुल्‍म के पहाड़ों को
पुख्‍ता कर रहे हैं
कमज़ोर अस्थिपंजर
अनपढ़ आखों में थरथराते
इतिहास के भयभीत साये
जबकि यह गांव में
विलाप की रात है
और चारों औरतें
अपने तेरह बच्‍चों के साथ
छाती कूटती
फोड़ती हुईं चूडि़यां
अपने रूदन से
भय की छाया को गाढ़ा करती हुई...
और पागल कुत्‍तों के दांत
अंधेरे के भीतर
वक्‍त की पिंडली पर

तभी वह आता है
आकाश और हवा से होता हुआ
सूक्ष्‍म राजदूत
और देश-भर के कान में
सगर्व करता है घोषणा
चारों रांडों को बच्‍चों समेत
एक माह मुफ्त राशन
तीस दिन दोनों जून
बिना चुकाए भकोस लेंगे तेरह धन चार
और दश के नाभि केंद्र में
गांवों की सरहदों के पास
बच्‍चों के सपनों को आतंकित करता
लकड़बग्‍घा हंस रहा है...

घिग्‍घी बंध गई थी जो नदियों की
खुल गई
दिल का दौरा पड़ा था देश के पहाड़ों को
हुआ दुरुस्त
कितनी बड़ी राहत की सांस ली
अवसन्‍न पड़े पठारों ने...
लाशों की राख को ठिकाने पहुंचा
अब इस सगर्व राहत उपचार के बाद
प्रश्‍न उठा क्‍या विलायत के गोरों को
हरा देंगे हॉकी में भारत के शूरवीर?

और मैं...
फिर से खड़ा हूं
इस अंधेरी रात की नब्‍ज़ को थामे हुए
कह रहा हूं
ये तीमारदार नहीं
हत्‍यारे हैं
और वह आवाज़
खाने की मेज़ पर
बच्‍चों की नहीं  
लकड़बग्‍घे की हंसी है
सुनो...

यह दहशत तो है
चुनौती भी
लकड़बग्‍घा हंस रहा है...










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