‘पके धान की गंध’ छोड़कर चले गए प्रो. सुरेंद्र स्निग्ध

स्मृतिशेष , नई दिल्ली/पटना, बुधवार , 20-12-2017


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जनचौक स्टाफ

प्रसिद्ध कवि-कथाकार और अध्यापक प्रो. सुरेंद्र स्निग्ध के निधन से साहित्य जगत में गहरा शोक है। वे पिछले कुछ दिनों से फेंफड़े में गंभीर संक्रमण की वजह से जगदीश मेमोरियल अस्पताल में वेंटिलेटर पर थे। बाद में उन्हें आईजीआईएमएस, पटना ले जाया गया, जहां 18 दिसंबर की रात उनका निधन हो गया।

उनके निधन पर कई कवि-लेखकों, शिक्षकों और साहित्यिक-सांस्कृतिक संगठनों ने शोक व्यक्त किया है।

जन संस्कृति मंच की ओर से जारी शोक संदेश में कहा गया है कि बेहद संवेदनशील स्वभाव वाले प्रो. सुरेंद्र स्निग्ध बिहार के साहित्यिक-सांस्कृतिक और शैक्षणिक जगत की पहचान थे। उनका निधन बिहार के साहित्य-संस्कृति और शिक्षा के क्षेत्र के लिए अपूर्णीय क्षति है।

प्रो. सुरेंद्र स्निग्ध नहीं रहे। (फाइल फोटो)

प्रो. सुरेंद्र स्निग्ध का जन्म 5 जून 1952 को बिहार के पूर्णिया जिले के सिंघियान गांव में हुआ था। जन संस्कृति मंच की स्थापना में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। जन संस्कृति मंच की पत्रिका ‘नई संस्कृति’ के अतिरिक्त उन्होंने पटना विश्वविद्यालय की पत्रिका ‘भारती’ और ‘गांव-घर’ नामक पत्रिका का संपादन किया था। ‘प्रगतिशील समाज’ के कहानी विशेषांक और उन्नयन के बिहार-कवितांक का भी उन्होंने संपादन किया था।

जन संस्कृति मंच, बिहार के राज्य अध्यक्ष कथाकार सुरेश कांटक, राज्य सचिव सुधीर सुमन और राष्ट्रीय पार्षद संतोष सहर की ओर से जारी शोक संदेश में कहा गया है कि सत्तर और अस्सी के दशक में बिहार में उभरे क्रांतिकारी किसान आंदोलन और सामंतवाद-विरोधी सामाजिक बदलाव के आंदोलन से सुरेंद्र स्निग्ध गहरे तौर पर प्रभावित थे।

उनके उपन्यास ‘छाड़न’ में आजादी के आंदोलन की दो धाराओं के बीच संघर्ष से लेकर क्रांतिकारी नक्षत्र मालाकार के संघर्ष और नक्सलबाड़ी आंदोलन के प्रभाव में सीमांचल के इलाके में विकसित हुए क्रांतिकारी किसान आंदोलन को दर्ज किया गया है।

साभार

कई समीक्षकों ने उनके इस उपन्यास को रेणु के ‘मैला आंचल’ की परंपरा को आगे बढ़ाने वाला उपन्यास बताया है। शिल्प के स्तर पर इस उपन्यास में रिपोर्ताज, संस्मरण, कविता आदि कई विधाओं का उपयोग किया गया है।


प्रो. सुरेंद्र स्निग्ध अपनी पीढ़ी के जाने-माने कवि थे। ‘पके धान की गंध’, ‘कई कई यात्राएं’, ‘रचते-गढ़ते’ और ‘अग्नि की इस लपट से कैसे बचाऊं कोमल कविता’ उनके प्रमुख कविता संग्रह हैं। ‘जागत नींद न काजै’, ‘शब्द-शब्द बहु अंतरा’ और ‘नई कविता : नया परिदृश्य’ नामक उनकी आलोचना की पुस्तकें प्रकाशित हैं। उन्हें नागार्जुन सम्मान, साहित्य सम्मान और बिहार राष्ट्रभाषा परिषद का साहित्य सेवा सम्मान मिला।


प्रो. सुरेंद्र स्निग्ध ने पटना विश्वविद्यालय, हिंदी विभाग के अध्यक्ष और परीक्षा नियंत्रक की महत्वपूर्ण जिम्मेवारियां निभाईं। वे एक कुशल अध्यापक भी थे।

प्रसिद्ध लेखक और संस्कृतिकर्मी रामजी राय ने भी स्निग्ध जी को श्रद्धांजलि देते हुए लिखा है कि “तुम नहीं रहे यह खबर बहुत खाली कर गई। तुम्हें तुम्हारे साथी महेश्वर से अलग कर कभी नहीं देख पाता था, महेश्वर के गुज़र जाने के बाद भी। 

कितनी-कितनी यादें, मुलाकातें, बातें लेकर याद आओगे प्यारे सुरेंद्र स्निग्ध। ओह वह नोंक झोंक भरी लेकिन मुहब्बत से लबरेज़ बहसें कभी नहीं भूलेंगी।

आलोका जी आज अपने को कितना विपन्न और खाली पा रही होंगी यह सोच कर ही घबराहट हो रही है।

कुछ भी नहीं सूझ रहा इस वक़्त। बस उदास, खिन्न, खाली मन है और श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए जुड़े हैं हाथ!”

कवि-पत्रकार कौशल किशोर लिखते हैं- हमारे अत्यन्त प्रिय मित्र व कवि सुरेन्द्र स्निग्ध का निधन बहुत दुखद है। बीते इतवार को कथाकार व ‘कथान्तर’ के संपादक राणा प्रताप से बात हुई। उनसे पता चला कि हालत में सुधार हो रहा है। सुनकर थोड़ी राहत मिली थी क्योंकि खबर तो ऐसी थी कि उनका बच पाना मुश्किल है। लेकिन आखिरकार वे नहीं बच पाये। अब स्निग्ध अपने सृजन, कर्म और यादों के सहारे हमारे बीच रहेंगे।

आशुतोष प्रथेश्वर अपने श्रद्धांजलि संदेश में लिखते हैं- 

"तुम जीवित थे तो सुनने को जी करता था,

तुम चले गए तो गुनने को जी करता है।

तुम सिमटे थे तो सहमी सहमी सासें थी,

तुम बिखर गए तो चुनने को जी करता है।।"










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