‘निर्मित सच’ को पहचानने का वक्त

सम-सामयिक , नई दिल्ली , शुक्रवार , 29-09-2017


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उपेंद्र चौधरी

नई दिल्ली। कई बार हमारे आस-पास से ऐसी खबरें भी गुजरती हैं,जो हमें छूकर निकल जाती हैं। हालांकि उसका असर बड़ा होना चाहिए,मगर ऐसा होता नहीं है। दूसरी तरफ ऐसी खबरों से भी हमारा सामना होता है,जिसका असर न दूरगामी होता है और न गहरा,फिर भी वह हमारे पास बहुत मंडराती है । इसकी बहुत बड़ी वजह हमारे दिमाग में बारीकी से बनाया गया वह सच होता है,जो सही मायने में सच तो नहीं होता,मगर उसका असर हमारे आस-पास के असली सच से कहीं बड़ा दिखायी देता है।

अंतर्राष्ट्रीय राजनीति और कूटनीति में इस निर्मित सचका बहुत बड़ा योगदान होता है। यही कारण है कि हम अनेक बार अपने ही खिलाफ खड़े कर दिये जाते हैं,लेकिन हम उसे महसूस करने की हालत में बिल्कुल नहीं होते हैं। हम ऐसे लड़ाकों में बदल दिये जाते हैं,जिसकी लड़ाई अपने ही हितों से होती है। मगर हमारी मनोदशा को भी हमारे अंदर से उभारे गये उसी लड़ाके के साथ खड़ी कर दी जाती है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अनेक शासन का खात्मा और कई नये शासन की स्थापना इसी निर्मित सचके परिणाम होते हैं। सच की इस निर्मित कला का इस्तेमाल आजकल हर देश की व्यवस्था अपने यहां की राजनीति में धड़ल्ले से कर रही है। अब तो किसी भी देश की शासन प्रणाली के निचले स्तर पर भी इस कला का उपोयग किये जाने लगा है।

अपने ही दायरे में कॉर्पोरेट इस कला का माहिर खिलाड़ी रहा है। कंपनियां अपने कर्मचारियों के भीतर अपने कार्यों से कहीं ज्यादा उस कंपनी की वफादारी का पाठ पढ़ाती है,जिसमें कोई भी इंप्ल्वायी कार्य कर रहा होता है। उसे बार-बार महसूस कराया जाता है कि कंपनी रहेगी,तभी तक कर्मचारियों का अस्तित्व है। इसलिए कर्मचारियों को चाहिए कि वह कंपनी के लिए जिये,कंपनी के लिए स्वस्थ रहे और कंपनी के लिए कुर्बानी दे। बहुत कम बार ऐसा होता है कि कर्मचारियों को उसकी कुशलता का अहसास कराया जाता हो, उसे उसकी कुशलता को और ज्यादा निखारे जाने पर बल दिया जाता हो और उसे इस बात का अहसास कराया जाता हो कि उसकी कुशलता ही उस कंपनी में उसके होने की गारंटी है। इसके विपरीत यह अहसास बार-बार कराया जाता है कि किसी के हुनर के मुकाबले उसका अपने बॉस और कंपनी के प्रति समर्पण ही उस कंपनी में उस कर्मचारी के होने की गारंटी है। यही कारण है कि कंपनी जहां एक तरफ अपने कर्मचारियों से हाड़तोड़ मेहनत करवाती है और बाकियों के लिए उसे मिसाल बनाती है,उसके मुकाबले दूसरी तरफ उसकी कुशलता के माझने के लिए कोई उपाय नहीं करती है,बल्कि ज्यादातर मामलों में व्यक्ति की कुशलता उसके अपने ही प्रयासों का नतीजा होती है। जो व्यक्ति अपने ही प्रयासों से कुशल से कुशलतम होने की दिशा में लगातार बढ़ता है,वह आगे चलकर किसी कंपनी का कर्मचारी नहीं रहकर उद्यमी बनने की राह पर चल देता है। लेकिन कंपनी में कार्य करने वाले कर्चमारी नौकरी में बने रहने के लिए अपनी कुशलता का दाम थामने से कहीं ज्यादा अपने बॉस या कंपनी की वफादारी का दामन थामता है।

दुनिया भर की राजनीति में सिस्टम को चलाने में इसी कला का इस्तेमाल होता रहा है।लेकिन जनता को हांकने में पहली बार इस कला का माइक्रो लेवल पर इस्तेमाल किया जा रहा है। आर्थिक सवालों को धार्मिक सवालों के आगे बेचारा बना दिया जाता हैय रोजगार के सवालों को,गढ़ी गयी सांस्कृतिक संकट के आगे बौना रख छोड़ा जाता हैयमहिला सशक्तिकरण के सवाल के आगे धार्मिक ग्रन्थों के बनाये दीवारों को बड़ा और खड़ा कर दिया जाता हैय शिक्षा और स्वास्थ्य के बुनियादी प्रश्नों का सांप्रदायिक प्रश्नों से मुठभेड़ करा दिया जाता है,आदि-आदि।हम ऐसे अनेक निर्मित सचके तरंगों के बीच उमंग से भर दिये जा रहे हैं,जिसमें असली सचको इतनी गति से नाचाना शुरू कर दिया जाता है किवह’,’वहनहीं लगता,जो असल में वहहोता है ! दुनिया भर के लोगों के साथ भारतीय नागरिकों का भी असल में इसी निर्मित सचसे मुकाबला है,क्योंकि सिस्टम को सुहाने वाले ये निर्मित सच’,वास्तव में नागरिक हित के पक्के शत्रु हैं।










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