डॉक्टर प्रवीण तोगड़िया के आंसू!

आड़ा-तिरछा , अहमदाबाद, बृहस्पतिवार , 18-01-2018


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बसंत रावत

आंसू छलक आना कोई शर्म की बात नहीं। हर कोई, कभी न कभी ज़िंदगी में रोया है। कभी किसी के ग़म में, कभी ख़ुशी के मारे और कभी किसी दूसरी वजह से। लेकिन जब प्रवीण तोगड़िया जैसा महारथी, हिंदुत्व का झंडाबरदार, सार्वजनिक रूप से रोता है तो बात कुछ ज्यादा ही संगीन हो जाती है। क्योंकि पहली बार तोगड़िया को किसी ने इस तरह बेबश और लाचार देखा। कभी अपने भाषणों में वीर रस की बरसात करने वाले तोगड़िया के आंसू नहीं थम रहे हैं। तोगड़िया जैसे लोग जो कभी हिंदुत्व का शंखनाद किया करते थे। उनका इस तरह से रोना ख़तरे की किसी घंटी से कम नहीं है। आख़िर क्यों? रोना उनकी फ़ितरत तो नहीं। फिर वो क्यों रोए? 

ज़रूर कोई ऐसी डरावनी बात होगी जिसने तोगड़िया को अंदर से झकझोर दिया और उन्हें हिला कर इतना तोड़ दिया होगा कि उनके भीतर से आंसुओं की धारा फूट पड़ी। आंसू मानों कहने लगे हों, सुनो तोगड़िया तुम्हारे शब्द नाकाफ़ी हैं मेरी वेदना बयान करने में। इस लिए मुझे बहने दो, अपना दर्द ख़ुद का बयान करने दो। मुझ पर क्या गुज़र रही है, आंसुओं को ही कहने दो। और इस बेदर्द ज़माने को पता लगने दो कि तोगड़िया क्यों रोया। उसे किसने रुलाया। असल में तोगड़िया के आंसू साधारण आंसू नहीं हैं। हिंदुत्व के एक घायल, परास्त योद्धा के आंसू हैं। जिसे कुछ ताकतें जबर्दस्ती राजनैतिक बनवास देने पर आमादा हैं। मजबूरी में कुछ दिन का अज्ञातवास दोस्त के हॉस्पिटल में गुज़ारना चाहा, पर अफ़सोस षड्यंत्रकारियों ने यहां भी ढूंढ निकाला। अब इतने बड़े आर्यावर्त में जायें तो जायें कहां। 

कमबख़्त धरती पर इकलौता हिंदू राष्ट्र नेपाल भी अब वह भी हिंदू राष्ट्र नहीं रहा। कहां शरण लें। तोगड़िया की समझ में नहीं आ रहा। कई बार अच्छे अभिनय की दरकार में कुशल नेता भी रो लेता है। रोना रुलाना नेताओं का राजधर्म है। गुजरात के कई बार नेताओं के ये आंसू हम सब ने देखे हैं। लेकिन तोगड़िया का रोना अनोखी बात है। त्रिशूल दीक्षा का स्वप्न द्रष्टा जब रोता है, तो बात दूसरी हो जाती है। क्योंकि वो प्रलाप नहीं करता, अभिनय नहीं करता। उसका रोना-रोना है, प्रलाप नहीं। तोगड़िया का कहना है वे एक साज़िश के शिकार हैं। उन्हें हर पल मौत दिखायी देती है। अपनी अकाल मौत। शायद राजनीतिक मौत। यक़ीनन ये अंदर की बात है। अंदर की उस साजिश से वाक़िफ़ हैं तोगड़िया। उनका डरना और रोना दोनों लाजिमी भी है। उनका डर भी अंदरूनी है। डर इतना ज्यादा है कि अहमदाबाद पुलिस की पूरी क्राइम ब्रांच तोगड़िया को कांस्पिरेसी ब्रांच दिखायी देती है। 

शायद उन्हें बीते दिनों की याद आ गयी हो। याद आ गये हों क्राइम ब्रांच के कारनामे, वो अमानवीय और घिनौने ‘पराक्रम’। जिसके लिए ये ब्रांच कुख्यात रही है! ये उनकी कैसी मजबूरी है। जनता की अदालत में तोगड़िया ख़ुद गवाही दे रहे हैं। और शीघ्र ही उसके कुछ राज जनता के सामने लाने की भी बात कह रहे हैं। पूरा देश उन्हें सुनना चाहेगा। अगर वो सुनाने के लायक बचे रहे और अगर उनकी हिम्मत जवाब ना दे गयी तो। कभी हिंदुओं के हृदय सम्राट रहे तोगड़िया का आज अपना कोई नहीं। खासकर सत्ता के गलियारों में। उन्हें किसी पर भरोसा नहीं। सत्ता के गलियारों से लेकर सड़क तक कभी उनकी तूती बोलती थी। गुजरात सरकार का रिमोट कंट्रोल उनके हाथ में हुआ करता था। आज वो एक घायल शेर की तरह अपने चारों ओर देख रहे हैं। अपने उन तमाम पुराने भक्तों की ओर कातर नजरों से देख रहे हैं जो किसी और के चीयर लीडर बन गए हैं। बुरा वक्त है। या कहिए वक़्त की मार है। या क़ुदरत का न्याय। 

वीएचपी के उच्च पद की कीमत ढेले के बराबर भी नहीं रही। एक तरह से मिनिस्टर विदाउट पोर्टफोलियो। राम मंदिर के निर्माण के उनके बीड़े को भी दुश्मनों ने किसी श्री श्री नाम के ठेकेदार को सौंप दिया। सब कुछ लुटाकर आज तोगड़िया युद्ध के मैदान में अकेले खड़े हैं। भला हो करनी सेना का जिसने हिंदुत्व की लाज रख ली और तोगड़िया की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी लेने की बात कही। इतना दिलाशा काफ़ी है किसी ख़ौफ़ज़दा इंसान को कुछ दिन और ज़िंदा रखने के लिए। कुछ दिन और रोने के लिए। हिंदू राष्ट्र, राम मंदिर के अरमानों को आंसुओं की धार से अभिषेक करने के लिए।

रोने रोने में फ़र्क़ होता है। ये फ़र्क़ तोगड़िया ने समझाया और दिखाया। हर कट्टर आदमी बिना दिल के नहीं होता। ये अलग बात है कि कट्टर आदमी रुलाता ज्यादा है रोता कम है। अगर तोगड़िया के दुश्मनों का बस चले तो वो उनके आंसुओं की जांच करा दें। नक़ली पाए जाने पर उन्हें सज़ा हो सकती है। फिर उन्हें असल में रोना पड़ सकता है-सलाखों के पीछे। जहां वे जय श्रीराम सुनने तक को तरस जाएंगे। ये गुजरात है।

तोगड़िया जानते हैं। यहां कुछ भी हो सकता है। आंसुओं पर महाकाव्य लिखा जा सकता है। और उसे अच्छे दिनों की सौगात की तरह पेश भी किया जा सकता है। और तड़ीपार का परम पारितोषिक भी दिया जा सकता है। रोने रुलाने के लिए यहां बहुत कुछ है। यक़ीन नहीं आता तो तोगड़िया से पूछ लीजिए। शर्माइये नहीं। आंसू बहुत काव्यात्मक होते हैं। 

(बसंत रावत वरिष्ठ पत्रकार हैं और अहमदाबाद में दि टेलीग्राफ के ब्यूरो चीफ रहे हैं।)










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Hemlata parekh :: - 01-18-2018
Nice .. .basantg ki paini kalam se togdiya ka mirrar. Aur moral bkhubi by a hua dhanyvad....