सवारियों को उनकी मंजिल तक पहुंचाने का नाम है प्रीति

बदलाव , , रविवार , 06-08-2017


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ऋचा साकल्ले

महिलाओं की स्थिति यूं तो पूरे देश में ही विषम है लेकिन अगर राजस्थान की बात करें तो वहां का हाल भी किसी से छिपा नहीं है। इस मामले में सबसे बदतर राज्यों में आता है राजस्थान। यहां महिला भ्रूण हत्या की दर सबसे ज़्यादा है। इसके साथ ही यहां महिलाओं की सबसे कम साक्षरता दर भी है। जल्दी विवाह होना, गर्भावस्था के दौरान अधिक मृत्यु होना, अधिक बच्चों को धारण करना, महिलाओं के खिलाफ अधिक अपराध होना और महिलाओं को बाहर कम काम करने देने वाले राज्यों में शुमार है राजस्थान। अगर आप 2011 की जनगणना के आंकड़ों पर नज़र डालेंगे तो ये बात साफ़ हो जाएगी कि यूपी, बिहार और राजस्थान महिलाओं के मामले में कहां ठहरते हैं। तो ऐसे राजस्थान में जहां महिलाएं डायन, कुल्टा और चुड़ैल बताकर मारी-पीटी जाती हों, जहां महिलाएं सती कर दी जाती हों, जहां आए दिन दिल दहला देने वाले बलात्कार होते हों। वहां मेरे लिए अपनी पिछले महीने की राजस्थान यात्रा में खाटू श्याम जी से सालासर के रास्ते बस में प्रीति कुमारी से मिलना और बात-चीत करना एक सुखद अनुभव रहा। क्योंकि उसने राजस्थान का एक उजला पक्ष भी दिखाया।

कौन है प्रीति कुमारी?

सीकर ज़िले की रहने वाली प्रीति कुमारी राजस्थान परिवहन की सरकारी बसों में कंडक्टर हैं। एक निडर, जुझारू और बेबाक़ महिला। वो 2014 से बस कंडक्टरी कर रही हैं। पहले वो कांस्टेबल रह चुकी हैं लेकिन पुलिस विभाग उन्हें पसंद नहीं आया। सो कंडक्टरी की राह पकड़ लीं। प्रीति को गर्व है कि वो उन चुनिंदा लड़कियों में से एक निकलीं जो इस पद के लिए सेलेक्ट हुई थीं। वो 12 घंटे ड्यूटी करती हैं फिर घर आकर घर का काम भी करती हैं। दो बच्चे हैं। पति बाहर नौकरी करते हैं वो 15-20 दिन में एक बार मिलने आ जाते हैं। यानि ड्यूटी के साथ परिवार संभालने की पूरी ज़िम्मेदारी प्रीति निभाती हैं।

बस के ड्राइवर।

प्रीति की इज़्ज़त करते हैं पुरुष कंडक्टर और बस यात्री

कंडक्टरी महिलाओं के लिए एक ग़ैर परंपरागत पेशा माना जाता है। उस पेशे में प्रीति ने अपनी मेहनत अपनी निडरता और अपने बेबाकपन से सबका सम्मान पाया है। इस ग़ैर परंपरागत पेशे में जहां मर्द कडंक्टर-ड्राइवर मां-बहन की गाली के बिना बात नहीं करते वहां प्रीति के सामने किसी की हिम्मत नहीं जो गाली मुंह से निकाल ले। 

प्रीति की कुछ महिला कंडक्टर दोस्तों को जब कुछ साथी पुरुष कंडक्टरों ने छेड़ने या बदसलूकी करने की कोशिश भी की तो प्रीति ने उन महिलाओं के साथ मिलकर सबकी शिकायत की और अच्छा सबक़ सिखाया।

महिला बस यात्रियों से पूछने पर मैंने पाया कि वो प्रीति पर नाज करती हैं। उन्हीं में से एक कहती है कि प्रीति बाई सा को देखकर फक्र होता है। और बस में उनके होने से हमको डर नहीं लगता। पुरुष बस ड्राइवर का कहना है कि पहले एक महिला के साथ काम करना अटपटा लगता रहा क्योंकि हमारे यहां घूंघट होता है पर अब अजीब नहीं लगता। अब लगता है महिलाएं आगे आएं तो अच्छा है।

दोहरी भूमिका निभाने के मुद्दे पर पारंपरिक सोच 

प्रीति घर परिवार दोनों जगह ज़िम्मेदारी संभालती हैं। उनके पति बाहर रहते हैं लेकिन वो अकेले रहते हैं। बच्चे प्रीति के पास। मेरे पूछने पर कि ऐसा क्यों, प्रीति कहती हैं कि घर और बच्चे संभालना तो महिलाओं का काम है। मैंने कहा कि काम तो काम है जब आप ऐसा मानती हो कि स्त्रियां सब काम कर सकती हैं। आप ख़ुद भी ऐसा काम कर रही हो जो मर्दों का काम माना जाता है फिर पुरुष घर का काम क्यों नहीं कर सकते? वो बोली मेडम जी ये तो हंसी की बात होगी भला समाज में ऐसा होता है क्या। हम समाज में रहते हैं तो समाज के बनाए नियम-क़ानून से तो चलना ही होगा।

बस के यात्री।

बदलाव अधूरा है

यहां दृश्य मेरे लिए थोड़ा विरोधाभासी हुआ लगा कि बदलाव अभी बाकी है। क्योंकि दबंगई से बाहर सबका मुक़ाबला करने वाली प्रीति, शोषण के ख़िलाफ़ बाहर अपनी महिला मित्रों की मदद करने वाली प्रीति घर में अनजाने हो रहे इस शोषण से एकदम इत्तफ़ाक़ रखती है। जहां बाहरी और घरेलू दोनों ज़िम्मेदारी उसी पर हैं।

दरअसल समाज लड़कियों को इसी शर्त पर आगे बढ़ने देता है, कैरियर बनाने की छूट देता है कि पैसे कमाकर तो लाओ पर घर भी तुम्हें ही संभालना होगा। सोशल कंडीशनिंग की मारी महिलाएं भी इसे अपनी ड्यूटी मानती हैं और यहां बराबरी की बातें भूल जाती हैं और होने देती हैं शोषण।

प्रीति का संदेशा महिलाओं के नाम

जो भी हो प्रीति ने अपनी जगह ख़ुद बनाई है इसलिए वो कहती हैं कि लड़कियों अपनी लड़ाई तुम्हें ख़ुद ही लड़नी होगी। किसी का इंतज़ार मत करो, कोई तुम्हारे लिए लड़ने नही आएगा, आज अभी अपने लिए ख़ुद उठो और लड़ो ज़ितना लड़ सकती हो।

(लेखिका टीवी पत्रकार हैंआप ट्विटर पर @richakiduniya और फ़ेसबुक पर @Richa Sakalley को फ़ॉलो कर सकते हैं।)










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