प्रेमचंद की “प्रेत-छाया” से निकलने का वक्त

जयंती पर विशेष , , मंगलवार , 31-07-2018


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संदीप नाईक

हिंदी में क्या है आपके पास प्रेमचंद और मुक्तिबोध, नागार्जुन, निर्मल वर्मा और थोड़े से नामवर तो फिर कुछ नहीं जब तक आप लोग प्रेमचंद से और उसके लिखे से मुक्त नहीं होंगे तब तक ना नया कुछ रचा जाएगा ना स्मृतियों में कुछ रहेगा। प्रेमचंद के नाम पर भी दो चार पांच कहानियां, उपन्यास और वैचारिकी है जिसे प्रलेस और जलेस वाले अपने-अपने हिसाब से घोल-घोलकर पीते पिलाते रहते हैं।

बाकी ना किसी ने गम्भीरता से पूरा पढ़ा होगा ना हिम्मत होगी सिवाय पीएचडी घिसने वालों के और मास्टरों की एक खास जमात ने जो जन्म से जीवन खत्म होने तक प्रेमचंद को ओढ़ते बिछाते रहेंगे। हिंदी की दुविधा यह है कि एक आदमी इतना काम जीवन में कर गया कि उसके बाद उसे सिर्फ ढोया ही जा सकता है और विश्व विद्यालयों से लेकर शिशु मंदिरों में सिर्फ जयंती ही मनाई जा सकती है बाकी इतना लिखा जा चुका है और शोध हो चुका है कि गंगा में डालें तो वह पलटकर भगीरथ की चोटी में पुनः समा जाएगी।

 प्रेमचंद ठीक राधाकृष्णन की तरह हैं या सीवी रमन की तरह जिन्हें हर बरस किसी धार्मिक अनुष्ठान की तरह से श्राद्ध कर निपटाया जाता है, वस्तुतः होना तो यह चाहिए था कि हमें 70 बरसों में अरबों प्रेमचंद, राधाकृष्णन या सीवी रमन जैसे लोग पैदा कर लेने थे पर इससे धंधे बन्द हो जाते। मुझे लगता है कि जितनी विकट परिस्थिति आज है किसानों से लेकर युवा, स्त्रियों या सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार की उतनी तो प्रेमचंद ने सोची भी नहीं होगी, मूल्यों के ह्रास में जितनी प्रवीणता से हमने पारंगतता हासिल की है वह कुल जमा अंग्रेज़ी शासन काल से निम्न और नीच है, जितना दलित उत्पीड़न और भेदभाव हमने शिक्षित समाज और सम्पूर्ण साक्षरता हासिल कर विचित्र समाज बना लिया है उतना तो प्रेमचंद की मेधा विचार भी नहीं कर सकती थी।

इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा कि प्रेमचंद के नाम पर बनें अड्डों पर जातीय भेदभाव, दक्षिणपंथी और कट्टर ताकतों का कब्जा है, इतिहास को अपने स्वार्थवश गलत ढंग से व्याख्यायित करने वाले आसीन हैं और प्रेमचन्द पर मौलिक रूप से काम करने वाले छात्र सड़कों पर भटक रहे हैं और आत्महत्या करने को आतुर हैं क्योंकि ये मठाधीश उन्हें ना आगे आने दे रहें ना रास्ता छोड़ रहें हैं। 

पत्र पत्रिकाओं में कूढ़मगज लोगों का विशुद्ध कब्जा है और पत्रकारों के नाम पर हमने एक अराजक और घोर मूर्खों को लाकर लेखन और जनपक्षधरता को हाशिये पर डाल दिया है। ऐसे में मुझे लगता है कि अब प्रेमचंद को विलोपित करने का समय है। यह समय की चुनौती है कि उस सबको खारिज़ कर हम नया रचें, सृजन करें और वास्तव में कुछ नया रचें , प्रेमचंद के मानकों को "अनलर्न कर पुनः लर्न " करने का जोखिम उठाना ही होगा क्योंकि नए लोगों के लिए उनके उपन्यास सिर्फ एक औपनिवेशिक संजाल के प्रतीक और घर में एंटीक के मानिंद ही हैं।

अस्तु पढ़ने लिखने से तो रहें खैर, अब प्रेमचंद जयंती मनाने का कोई अर्थ नहीं है सिवाय इसके कि फेसबुक पोस्ट, एक घटिया न्यूज जिसमें अपने चमकते थोबड़े, कुछ लोगों को बुलाकर सुनकर उपकृत कर दो ग्लूकोज के बिस्किट और चाय का पानी पीना हो क्योंकि अब कहने सुनने को कुछ है नहीं और जो कह रहे हैं और आयोजना बना रहे हैं वे सिर्फ कर्मकांडी ब्राह्मण की तरह प्रेमचंद का प्रेत काँधे पर उठाए बजट खर्च कर इतिश्री कर रहे हैं। 

बेहतर है प्रेमचंद को जनश्रुतियों से लेकर पाठ्यपुस्तकों तक से खारिज किया जाए और नवसृजन के लिए कुछ अंकुरित बीज इस बांझ जमीन पर डाले जाएं, दुकानें बंद हों, अनुदान, गढ़ और मठ बन्द हों, शिष्य वृत्तियों की बंदरबांट पर रोक हो और फिर देखें कि कैसे सृजनहार नए भारत के वर्तमान सन्दर्भों में लिखते हैं पूरी प्रतिबद्धता और निष्पक्षता से। 

(संदीप नाईक लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। और आजकल इंदौर में रहते हैं।)








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