ग़ैरों के लिए रैफेल का धंधा, अपनों के लिए फांसी का फंदा!

आड़ा-तिरछा , , शनिवार , 10-02-2018


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वीना

लड़ाकू विमानों के सौदे में भी अपनी नाक घुसेड़ दी। 500 करोड़ का जो एक जहाज आना था वो अब आएगा 1500 सौ करोड़ में। कुल आने हैं 36 जहाज़। यानि हर जहाज़ पर एक हज़ार करोड़ के हिसाब से 36 हज़ार करोड़ फालतू। ये किसके पेट में जा रहा है? क्यों भई, क्या इस बार चुनाव का खर्चा रैफेल की सवारी कर पार्टी फंड में लैंड करेगा? अपने 6 हज़ार करोड़ के जुगाड़ के लिए एक ही झटके में जनता की 36 हज़ार करोड़ की जेब काट ली! 

जी हां प्रधान सेवक जी, जब किसी को बग़ैर बताए, बग़ैर पूछे उसकी जेब का पैसा उड़ा लिया जाए तो उसे जेब काटना ही कहते हैं।

“लिखबा त ना, मिटकैबा त दूनों हाथै।“ यानि लिखा तो कुछ नहीं पर मिटा दिया दोनों हाथों से। भोजपुरी की ये कहावत हमारे प्रधान सेवक के लिए ही बनी है शायद। अब तक देश के लोगों को दिया तो कुछ नहीं पर उनकी मेहतन की पूंजी को दो हाथों से हज़ार हाथों की तरह लुटा रहे हैं। 

क्या कारण है कि हमारे प्रधान सेवक पराए आंगन के तंदुरुस्त बालकों को पालने-पोसने के लिए बड़े उतावले रहते हैं? इतने कि अपने कुपोषितों की बनियान-लंगोटी नोच-बेचकर विदेश उड़कर भाग जाते हैं और वहां से हज़ारों करोड़ के तोहफे लाकर गै़रों की झोलियां भर देते हैं। 

सुना है जुम्मा-जुम्मा चार दिन की पैदाईश कंपनी रिलायन्स डिफेंस को हज़ारों करोड़ की फ्रांसीसी रैफेल बोतल से दूध पिलाया है हमारे प्रधान सेवक ने। और अपने घर की सरकारी जवान-जहान, समझदार हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड कंपनी के हाथ आए रोज़गार को छीनकर पकौड़े का ठेला थमा दिया। 

सरकारी कंपनी हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स 500 करोड़ में भी अपने पढ़े-लिखे युवाओं को उनकी योग्यता के मुताबिक रोज़गार देती। निजी रिलायन्स डिफेंस 1000 करोड़ हड़पकर अपने महल में झूमर लटकाएगी। और रोज़गार के नाम पर ठेंगा दिखाएगी। 

अपने घर के नंग-धड़ंग, भूख से बिलखते बालकों को सूखी रोटी का एक टुकड़ा तक नसीब नहीं। भूख से मरते किसी बालक ने ग़लती से कुर्ता पकड़ कर कह दिया - ‘‘बाबा भात’’ तो धक्के के साथ लताड़ मिली - परे मर कम्बख़त...मेरा सूट ख़राब कर दिया..!’’ अपने बालक का भूखा-कमज़ोर शरीर धक्का खाकर उठा या हमेशा के लिए धरती का हो गया बाबा ने मुड़कर भी नहीं देखा। सूट बदलकर संसद को निकल लिए। रैफेल की दूध की बोतल का हिसाब उज्ज्वला योजना और स्वच्छता अभियान की डींग के नीचे दबाने को।

भोजपुरी की एक और कहावत है - ‘‘गांव जरल जाय मंगरू बहू कहस मांग टीक द।’’ - गांव जल रहा है और मंगरू की बहू को मांग में सिंदूर भरने की लगी है। दोनों सदनों को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद जब सरकार लिखित निबंध पढ़ते हैं - ‘‘मेरी सरकार ने बिजली की खपत कम करने के लिए एलईडी बल्ब बांटे, उज्ज्वला योजना लाई, स्वच्छता को मिशन बनाया इसलिए मेरी सरकार ‘‘महान’’ है।’’ तो मुझे महामहिम राष्ट्रपति जलते गांव में मांग टीकने वाली मंगरू सरकार की बहू से अधिक कुछ न लगे। 

अगर राष्ट्रपति मंगरू सरकार की बहू न होकर देश के नागरिकों के पिता होते तो उन्हें सेंट्रल हॉल में उल्टे रखे पंखों पर सीधी लटकी किसानों की लाशें ज़रूर नज़र आतीं। इसी सेंट्रल हॉल में सीना तान कर न बैठे होते उनके किसान बच्चों के गले में फंदा डालने वाले मुजरिम। 

इस सेंट्रल हॉल की शोभा स्वतंत्रता सेनानियों, महान नेताओं की पेंटिंग आदिवासी, दलित, मुस्लिम, बेबस ग़रीब औरतों-बच्चियों के जिस्मों से नोचे गए खून सने चीथड़ों के अंबार के बोझ और हवस की बास के नीचे दबी पड़ी हैं। इन चीथड़ों को यहां तक पहुंचाने वाले बहुत से हाथ भी यहीं इसी सेंट्रल हॉल में टेबल पीटने पहुंचते हैं।

इन महान भवनों की दीवारों से बारह मास ख़ून रिसता है। हर पल गोली-बारूद से छलनी होने वाली हज़ारों लाशे अपने क़त्ल की गवाही देने इन दीवारों से टकराती हैं। 

संसद भवन के फ़र्श पर चस्पा है शूद्र-अतिशूद्रों के जिस्मों का चमड़ा। ये बेंच जिन पर ये सफेद कलफ़ लगे कुर्ते आकर तशरीफ़ रखते हैं, अपने हक़ मांगने की एवज में जान गंवाने वालों की अनगिनत लाशों से पटे पड़े हैं। यहां की मेहराबों से हर वक़्त चीख़ती हैं वो आवाजें जो सच बोलने के जुर्म में ख़ामोश कर दी गईं। पर मंगरू सरकार की बहू को इस भयानक मंज़र को नज़रअंदाज़ करने की हिदायत है।

जलते हुए मुल्क़ में मांग टीकने के लिए इन मंगरू सरकर की बहुओं को खूब सम्मान हासिल है। ग़ुलामी के दौर की प्रतीक आलीशान बग्घी, शानदार बाग़, महल-मुलाज़िम घोड़ा-गाड़ी, रुतबा। इतना सब कुछ हो जब किसी के पास मुफ़्त में भोगने के लिए तो जलते देश की तरफ़ देखकर क्यों अपना मिजाज़ ख़राब करे कोई? 

तथाकथित ऊंच जात ठाकुरों के  खि़लाफ़ उत्तर प्रदेश के सहारनपुर के नौजवान च्रदशेखर आज़ाद रावण की ललकार में अगर देश के लाखों नौजवानों की आवाज़ आकर न मिली होती, तो हो सकता है तथाकथित नीच दलित जाति से आने वाले रामनाथ कोविंद जी को अपने नाम के आगे ‘‘महामहिम राष्ट्रपति’’ नसीब न होता। 

फिर भी मंगरू सरकर की बहू में हिम्मत नहीं है कि वो बेटे चंद्रशेखर आज़ाद के साथ होने वाले अन्याय के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाए। क्या मांग टीकने का मोह बेटे की जान और सम्मान से बढ़कर है?

( वीना पत्रकार के साथ फिल्मकार भी हैं।)






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