हमारी पीढ़ी के असंख्य नौजवानों को राहुल सांस्कृत्यायन ने दिखाई राह: उर्मिलेश

जन्मदिन पर विशेष , , सोमवार , 09-04-2018


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उर्मिलेश

आज राहुल सांकृत्यायन की जयंती है। सन् 1893 के 9 अप्रैल को उनका जन्म यूपी के आजमगढ़ जिले के पंदाहा गांव में हुआ। वह दर्जन भर से ज्यादा भाषाओं के अच्छे ज्ञाता थे। पर हिंदी भाषी क्षेत्र में पैदा होने और राजनीतिक सामाजिक रूप से इसी क्षेत्र में सक्रिय होने के कारण उन्होंने अपना ज्यादा लेखन हिंदी में ही किया। 

यह बात मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि उनकी पुस्तकों से हिंदी भाषी क्षेत्र में हमसे पूर्ववर्ती और हमारी पीढ़ी के असंख्य नौजवानों को समाज के विकास और इतिहास की वस्तुपरक व्याख्या का एक नजरिया मिला। मैं समझता हूं, उनकी किताबों ने हिंदी भाषी क्षेत्र के किशोरों और युवाओं का मार्क्सवादी विचारधारा से परिचय कराया। उसमें गहरी रुचि जगाई और समाज में बदलाव की लड़ाई लड़ने के लिए प्रेरित किया।

राहुल जी की किताबों की दुनिया में मेरा प्रवेश किशोरावस्था में हुआ। अपने बड़े भाई के बलिया वाले घर में। गाजीपुर के अपने गांव में प्राथमिक शिक्षा के बाद उन्हीं दिनों मैं बलिया शहर पढ़ने पहुंचा था। तब मेरे भाई (दिवंगत) केशव प्रसाद वहां सतीश चंद्र कालेज में लेक्चरर थे। उनके बैठके (अंग्रेजी में ड्राइंगरूम) में बड़ी आलमारी थी। उसमें ढेर सारी किताबें थीं। गांव में इतनी सारी किताबें मैंने कभी नहीं देखी थीं। इसी आलमारी से मुझे 'साम्यवाद ही क्यों', 'वोल्गा से गंगा' और 'भागो नहीं दुनिया को बदलो' जैसी किताबें पहली बार दिखीं। शुरू में तो सिर्फ इन्हें उलटता-पुलटता था। बाद के दिनों में बारी बारी से इन्हें पढ़ता गया।

कुछ बात समझ में आई और कुछ पल्ले नहीं पड़ी। जो बात समझ में नहीं आती, उस पर मैं भाई से रात को भोजन के बाद या कभी वक्त मिलने पर दिन में सवाल करता। वह बताने-समझाने की कोशिश करते। उन्होंने कभी डांटा नहीं कि कोर्स की किताबें छोड़ कर ये सब क्यों पढ़ रहे हो या कि बड़े होकर यह सब पढ़ना! हाई स्कूल की पढ़ाई के समय लेनिन की भी एक किताब हाथ लगी। पर वह बिल्कुल समझ में नहीं आई। उन दिनों विवेकानंद और लोहिया की पुस्तिकाएं भी कभी-कभी पढ़ने को मिलीं। जयशंकर प्रसाद की 'आंसू' और हरिवंशराय बच्चन की 'मधुशाला' का बहुलांश मुझे याद हो गया। इससे कई बार विद्यालय में अंत्याक्षरी प्रतियोगिता का विजेता बनने का भी मौका मिलता। प्रेमचंद की किताब 'निर्मला' भी उसी दौर में पढ़ ली। 

राहलु सांस्कृत्यायन पर लिखी गयी उर्मिलेश की किताबें।

पर राहुल सांकृत्यायन की किताबों से रिश्ता बढ़ता गया। अंततः मैं उनका शोधार्थी बन गया। सन् 1981 में JNU से मैंने राहुल सांकृत्यायन के साहित्य और लेखन पर एम्.फिल. किया। उसी लघु शोधप्रबंध को वाणी प्रकाशन, दिल्ली ने सन् 1993-94 में पुस्तकाकार छापा- 'राहुल सांकृत्यायन: सृजन और संघर्ष!'

उसके कुछ ही महीने बाद सन् 1994 में बिहार राष्ट्रभाषा परिषद के अनुरोध पर मैंने राहुल सांकृत्यायन पर एक मोनोग्राफ तैयार किया। वह 'योद्धा महापंडित राहुल सांकृत्यायन' के शीर्षक से छपा। उसका लोकार्पण श्रीमती कमला सांकृत्यायन ने किया था। तब वह जीवित थीं। अस्वस्थ रहने के बावजूद वह समारोह में पटना आईं। डॉ नामवर सिंह सहित अनेक विद्वान कार्यक्रम में शामिल हुए। जहां तक याद आ रहा है, इससे कुछ ही महीने पहले राहुल सांकृत्यायन पर गुणाकर मुले जी की किताब आई थी! पर मेरा लघु शोधप्रबंध सन् 1981 का था, जो 94 में छप सका। मेरी दोनों पुस्तकों के बाद राहुल सांकृत्यायन पर कई अन्य मित्र लेखकों की नयी किताबें छपकर आईं। अब तो राहुल साहित्य पर कई बहुत अच्छे अध्ययन और प्रकाशन हो चुके होंगे।

इस वर्ष, राहुल जी की जयंती के अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम के लिए मुझे आजमगढ़ स्थित उनके गांव से आमंत्रण आया था। चाहता था, कार्यक्रम में शामिल होना। पर मेरा दुर्भाग्य कि इस बार जा नहीं सका। 

एक बड़े जन-पक्षधर लेखक, योद्धा विचारक और महान् स्वप्नदर्शी को मेरी विनम्र श्रद्धांजलि!

(उर्मिलेश वरिष्ठ पत्रकार हैं और राज्यसभा टीवी के संस्थापक एक्जीक्यूटिव एडिटर रह चुके हैं। इस समय दिल्ली में रहते हैं।)










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