‘यह भारतीय राष्ट्र के पराभव का दुर्भाग्यपूर्ण दृश्य था’

बेबाक , , सोमवार , 28-08-2017


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देवी प्रसाद मिश्र

बीते शुक्रवार की रात सच्चा सौदा वाले गुरमीत राम रहीम की हिमायत में सड़क पर उतरी उन्मादी भीड़ का एक वीडियो देख मैं सिहर गया। एक लंबा-चौड़ा आदमी पत्थर चलाते हुए काफी आगे निकल आया था। वह लगभग अकेला था। वह झुककर पत्थर उठाकर मारने वाला ही था कि अचानक ढेर हो गया। पुलिस की गोली कहीं से चली थी। उसकी बगल में एक स्त्री थी। अपना मुंह ढंककर वह भी पत्थर चला रही थी। शायद वह उसकी पत्नी रही हो, शायद न भी हो। कुछ भी हो, वह दृश्य एक बड़ी मानवीय और सामाजिक त्रासदी का एक अधोमुखी रूपक था। एक निरर्थ मृत्यु का रूपक। जाहिर है कि एक गुमराह भक्त एक शोहदा आध्यात्मिकता के पैरोकार के लिए शहीद हो गया।

बाबा राम रहीम।

निर्बुद्धिकरण से कुबुद्धिकरण और फिर अबुद्धिकरण तक

यह अपराध और माफिया के लिए जान गंवाना था। यह तर्क विरोधी स्थापनाओं के लिए की गई आत्महत्या थी। यह इस बात का प्रतीक भी था कि चेतना निर्माण की प्रक्रिया में हमसे गहरी चूक हो रही है। यह इसकी त्रासद सूचना थी कि हमारी सामाजिकता में कितनी खोट है। यह भारतीय राष्ट्र के पराभव का दुर्भाग्यपूर्ण दृश्य था। यह बता रहा था कि इक्कीसवीं सदी में भी हम कितने रुग्ण और आत्महंता हो सकते हैं। साफ था कि वह आदमी दिग्भ्रमित था। वह निर्बुद्धिकरण का शिकार था। उसके पास एक विद्रूप कार्यभार था। लेकिन इससे त्रासदी की विकटता कम नहीं होती। सच्चा सौदा के गुरमीत राम रहीम की परिघटना और हरियाणा-पंजाब-दिल्ली-राजस्थान में हुई हिंसा इस ओर इशारा कर रही है कि किस तरह से निर्बुद्धिकरण की प्रक्रिया को चलाया और बनाए रखा जा सकता है। दूसरे शब्दों में कहें तो किस तरह मानव समूह को बुद्धि-विरोध, तर्क-विरोध, विचार-विरोध, प्रश्न-विरोध के संस्कृतिहीन निर्वात में घुमाया जा सकता है।

डेरा सच्चा सौदा निर्बुद्धिकरण ही नहीं कुबुद्धिकरण और अबुद्धिकरण का वही जंजाल और संजाल है, जिसके पैरोकार निर्मल बाबा, रामपाल बाबा और आसाराम जैसे लोग रहे हैं। यह चेतना का बाबाकरण है। बाबाकरण के इस बाड़े में जोर होता है बुद्धि विरोधी संवेग पर, जहां एक बहुरुपिया अपनी वाग्मिता, सर्कस, शब्दजाल से हर समस्या का समाधान लेकर खड़ा है। दरअसल यह बाबा अराजनीतिक होते हुए भी समकालीन बाबावादी राजनीति का विस्तार है जो संवेगीय सनसनी, विज्ञान विरोध, अंधराष्ट्रवाद और विचार विरोध के प्लेटफॉर्म पर खड़ी है। दोनों अपनी पारस्परिकता में फलते-फूलते हैं। खट्टर तंत्र और सच्चा सौदा का आपसत्व इस बात की पतनशील मिसाल है। इस परिघटना का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि यह तर्कविरोधी सर्कस उन लोगों के बीच आसानी से सचल होता है जो वंचित हैं और बौद्धिक तौर पर निरुपाय हैं।

बाबा से आर्शीवाद लेते मंत्री अनिल विज।

भीड़त्व के प्रति राजनीतिक वर्ग का लालचपन

राम रहीम जैसे लोग अपने आध्यात्मिक बाड़ों में इस तरह के लोगों के लिए लंपट आध्यात्मिकता की पिकनिकीय व्यवस्था कर देते हैं। गरीबी के अंधेरे में यकसांपन का जीवन जीने वाले लोग मन बदलने के लिए इधर चले आते हैं। लेकिन वे यह नहीं जानते कि इस क्रम में वे एक विसंस्कृत माफिया के लाभवादी तंत्र का हिस्सा बनने जा रहे हैं और उनके भीड़त्व पर राजनीतिक वर्ग की ललचाई नजर है। इस बात पर ध्यान जाना स्वाभाविक है कि डेरा सच्चा सौदा के अधिकांश अनुयायी दलित हैं। उन्होंने जातिवाद के सबसे भयावह रूपों को सहा और जाना है। ऐसे में जब कोई गुरु मसीहाई उद्घोषणाओं के साथ अवतरित होता है तो उन्हें लगता है कि उन्हें सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक मुक्ति देने वाला आ गया है।

वे एक विषम समाज में समानता का स्वप्न देखने लग जाते हैं। वे यूटोपियाई हो उठते हैं। उन्हें जो आइकन चाहिए था वह मिल गया। हमारा ध्यान इस ओर भी जाना ही चाहिए कि डेरा सच्चा सौदा जैसे संस्थानों के पनपने के पीछे चेतना फैलाने वाले आंदोलनों और राजनीतिक प्रक्रियाओं का अभाव या उनकी विफलता रही है। इसलिए जब रफ और रेडी किस्म का मसीहा लोगों को दिखता है तो वे आसानी से उसकी भीड़ बन जाते हैं। डेरा सच्चा सौदा उनके लिए आशावाद की चौंधिया देने वाली रोशनी है जो उनके सहज मानवीय विवेक को छीनती है। उन्हें अंधी आस्था के पाताल लोक में ले जाती है। वह उन्हें मिट्टी का लोंदा या निरक्षर रोबो बनाती है, मनुष्य नहीं। उन्हें लिंचमॉब बनाती है- हिंसा के दुष्चक्र का एक निरीह और उन्मादी हिस्सा।

बाबा राम रहीम।

गुरमीत है बाजार का बाबा

गुरमीत एक टेक्नॉलजी बाबा है। वह बाजार का बाबा है। वह ताकत का अधम और बॉलीवुडीय प्रदर्शनवाद है। वह समकालीन सड़ी-गली राजनीति की परिशेषिका (अपेंडिक्स) है। पढ़े-लिखे मध्यवर्ग के लिए सच्चा सौदा धिक्-छिः-थू हो सकता है लेकिन उन लोगों के लिए नहीं, जो अन्याय और पारिवारिक कलह के स्लम में जी रहे हैं। इसीलिए डेरा सच्चा सौदा को लेकर जो हिंसा हुई है, उसके लिए भारतीय राज्य का वह पतनशील रूप काफी हद तक जिम्मेदार है, जो ज्ञान विरोधी सामाजिक-आर्थिक परियोजना को प्रमोट करता रहा है। इस समय भारतीय राज्य का जिस तरह से निर्माण हो रहा है, उसमें सैन्यवाद और अधकचरे धार्मिक विश्वासों की गहरी छौंक है। इसीलिए जब पंचकूला में भीड़ को देख कर पुलिस वापस भागी तो उससे यही जाहिर हो रहा था कि किस तरह भीड़वाद नियामक की भूमिका में आ गया है, जिसके सामने भारतीय राज्य को भी उल्टे पांव भागना पड़ सकता है। भारतीय राज्य के लिए यह खतरे की घंटी है। जिस भीड़ संस्कृति को यह राजनीतिक व्यवस्था पाल-पोस रही है, वही उसके लिए गहरी दुविधाएं भी पैदा करेगी। उसकी एक विकराल झलक जाट आंदोलन के दौरान दिखी थी। पंचकूला में उसकी लपटें कहीं अधिक विकराल दिखीं।

         (देवी प्रसाद मिश्र प्रसिद्ध कवि हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

                                                              (नवभारत टाइम्स से साभार)

 

 










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