रमन सिंह आदिवासियों के नायक नारायण सिंह को छीनकर कर रहे हैं अपने राजपूताना अहम की तुष्टि

इंसाफ की लड़ाई , , बृहस्पतिवार , 12-07-2018


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तामेश्वर सिन्हा

रायपुर। इतिहास से छेड़छाड़ बीजेपी सरकारों के शगल का हिस्सा बन गया है। कहीं वो अपने विरोधी विचारों के महापुरुषों को इतिहास के पन्नों से गायब करते मिल जाएंगी। तो कहीं अपने लोगों को जबरन स्थापित करने की कोशिश करते दिख जाएंगी और किसी जगह पर दूसरे के महापुरुषों को हथियाकर उन पर कब्जा करते हुए दिख जाएंगी। 

एक ऐसा ही मामला छत्तीसगढ़ में भी चल रहा है। यहां छत्तीसगढ़ में स्वतंत्रता संग्राम के पहले आदिवासी जन-नायक वीर शहीद नारायण सिंह बिंझवार को सरकार ने 10वीं कक्षा की किताबों में राजपूत बना कर पेश कर दिया है। ये न केवल आदिवासी जन-नायकों के इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश करने की कोशिश है बल्कि उनके सांस्कृतिक इतिहास से बलात्कार करने सरीखा है?

आदिवासियों के इतिहास को जानने-समझने वाले बुद्धिजीवियों का कहना है कि इसके जरिये आदिवासियों और उनके नायकों के इतिहास को तोड़ा-मरोड़ा जा रहा है। ये सब कुछ सवर्णों और उनकी पक्षधर सरकारों द्वारा अपने समुदाय को लाभ दिलाने की साजिश के तहत किया रहा है। और सरकार की कुत्सित मंशा को प्रमाणित करता है। 

दरअसल आदिवासी समुदाय में ज्यादातर लोगों के पढ़े लिखे न होने के चलते उनके इतिहास के साथ आपराधिक खिलवाड़ किया गया। इसका नतीजा ये रहा कि दूसरी सामुदायिक पृष्ठभूमि से आने वाले लेखकों ने आदिवासियों के साथ न्याय नहीं किया। और अब जबकि एक ऐसी सरकार है जो धुर आदिवासी विरोधी और सवर्ण और ब्राह्मणवाद की पक्षधर है तब उसने सूबे में इतिहास से छेड़छाड़ का नंगा खेल शुरू कर दिया है। आदिवासियों के नायक नारायण सिंह बिंझवार को राजपूत साबित करने की कोशिश उसी का हिस्सा है। 

इस कड़ी में छत्तीसगढ़ में राज्य शैक्षिणिक अनुसंधान  प्रशिक्षण परिषद यानि एससीईआरटी की  10 वीं कक्षा के हिंदी पाठ्यक्रम के 4.1 में शहीद वीरनारायण सिंह की जीवनी के पाठ में उन्हें बिंझवार राजपूत बताया गया है ।

लेकिन सरकार और शिक्षा विभाग की इस हरकत का अब विरोध भी शुरू हो गया है। आदिवासी समाज ने कल शिक्षा मंत्री केदार कश्यप और उस जीवनी के लेखक  का पुतला दहन कर अपना विरोध दर्ज किया। वहीं आदिवासी युवा छात्र संगठन ने भी प्रदेश के सभी  जिलों में विरोध प्रदर्शन किया है और तत्काल इस अंश को हटाने की मांग की है। छात्र संघठन के अध्यक्ष अनमोल मंडावी ने बताया कि भाजपा शाषित राज्यों में आदिवासी जननायकों को स्कूली बच्चों के सामने गलत रूप में पेश किया जा रहा है। 

शिक्षामंत्री का पुतला जलाते संगठन।

सच्चाई ये है कि शहीद वीर नारायण सिंह बिंझवार गोंड़ जनजाति के थे। और उन्हें अब बिंझवार राजपूत बता कर पढ़ाया जा रहा है। इससे भी ज्यादा दुखद बात ये है कि शहीद वीर नारायण सिंह बिंझवार समेत गुंडाधुर धुरवा, गैंद सिंह, डेबरी धुर धुरवा जैसे महान नायकों को आज तक वैधानिक तौर पर शहीद का दर्जा नहीं मिला। ये अपने आप में जातिगत भेदभाव की सबसे बड़ी नजीर है।

हैदराबाद यूनिवर्सिटी के आदिवासी शोधार्थी आकाश पोयाम बताते हैं कि "बिंझवार समाज के पूर्वजों के अनुसार, वीर नारायण सिंह के पूर्वज गोंड़ जनजाति से सम्बंधित थे, जो बाद में बिंझवार समाज का हिस्सा बन गए और सोनाखान क्षेत्र में बस गए। नारायण सिंह के पूर्वज सोनाखान के दीवान थे और 35 वर्ष की आयु में नारायण सिंह ने अपने पिता से सोनाखान की जमींदारी संभाली।

वीर नारायण सिंह ने 1857 के विद्रोह के पहले ही ब्रिटिश सरकार की नीतियों को चुनौती दी थी। 1856 में जब सोनाखान गंभीर अकाल की स्थिति से गुजर रहा था, नारायण सिंह ने एक स्थानीय व्यापारी से मदद मांगी और आश्वस्त किया की फसल होने पर उसे अनाज लौटा दिया जाएगा। लेकिन जब व्यापारी ने ऋण के साथ भी अनाज देने से इनकार कर दिया, तब नारायण सिंह ने गोदाम तोड़कर अनाज लोगों में बांट दिया। 

व्यापारी के सरकार के साथ साठ-गांठ होने के कारण उसकी शिकायत के ही फलस्वरूप नारायण सिंह को गिरफ्तार किया गया और फिर ब्रिटिश सरकार द्वारा उन्हें रायपुर की जेल में फांसी दी गई। इस प्रकार नारायण सिंह के नेतृत्व में बिंझवार समाज के लोगों का आंदोलन गैर आदिवासी कथित उच्च जाति के लोगों के द्वारा शोषण के विरोध और साथ ही ब्रिटिश सरकार की आदिवासी विरोधी नीतियों के खिलाफ भी था।

आज जहां सरकारें नारायण सिंह के इतिहास का “देशभक्त क्रन्तिकारी” के रूप में विनियोग (appropriation) कर रही हैं, लेकिन साथ ही उनके इतिहास और पहचान को भी विकृत रूप में पेश करने में लग गयी हैं। यहां तक कि अब छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा वीर नारायण सिंह की जन्मभूमि सोनाखान को ब्रिटिश कंपनी वेदांता को खदान के लिए लीज और जमीन भी दे दी गई है, जो कि उनके इतिहास का अपमान ही नहीं बल्कि, बिंझवार समाज के अस्तित्व पर खतरा और उनके मानव अधिकारों का घोर उल्लंघन है।"

(तामेश्वर सिन्हा पेशे से पत्रकार हैं और अपनी जमीनी रिपोर्टिंग के लिए जाने जाते हैं।)

 




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????? ????? :: - 07-13-2018
ये हिम्मत तो जन चौक ही कर सकता है । इसके फैन हो गए है हम लोग तामेश्वर दादा को क्रांतिकारी जोहार

Sukhmen salam :: - 07-13-2018
बहुत ही उत्कृष्ठ और वास्तविक आलेख दादा। बहुत बहुत सेवा जोहार