अरे भाई! जोशी जी अरण्य से लौटे हैं उनका बुर्जुआकरण जो करना है !

नई किताब , , बुधवार , 07-03-2018


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जनचौक ब्यूरो

(वरिष्ठ पत्रकार रामशरण जोशी की आत्मकथा ‘‘मैं बोनसाई अपने समय का: एक कथा आत्मभंजन की’’ की अगली कड़ी।) - संपादक 

नई दुनिया ने मुझे फिर से स्वीकार कर लिया है। सभी (बाबा राहुल बारपुते, तिवारी, राजेंद्र माथुर अभय जी) मेरे लौटने से प्रसन्न हैं, और संयम व विवेक से काम लेने की सलाह दे रहे हैं। मेरी अच्छी सेवा शर्तें तय कर दी जाती हैं। जंगपुरा एक्सटेंशन जैसी पॉश कॉलोनी में किराए पर आवास, टेलीफोन व स्कूटर की व्यवस्था।

मेरा टोटल पैकेज संपादक माथुर से अधिक है। संपादकीय विभाग में इसे लेकर तनिक खिन्नता भी है। दुखी साथियों को संपादक माथुर साहब का एक ही उत्तर है ‘‘अरे भाई! जोशी जी अरण्य से लौटे हैं उनका बुर्जुआकरण जो करना है ।‘‘

रज्जू बाबू उर्फ माथुर साहब की संवेदनशीलता दुर्लभ है उन्हें अपने साथियों की गरिमा की रक्षा की कला आती है। वे निसंदेह मानवीय इंसान और आला श्रेणी के संपादक हैं। दबाव और प्रलोभनों से मुक्त। मैं रफ्ता-रफ्ता पत्रकारिता में रवां होने लगा हूं। नई परिस्थितियों के साथ मैंने पटरी बैठाना शुरू कर दिया है। रफी मार्ग स्थित आई.ए.एन.एस. में ‘नई दुनिया‘ का विधिवत ब्यूरो खोल दिया गया है। सत्ता के गलियारों और ग्लैमर की दुनिया का अपना  ही रंग मिजाज होता है। मैं इसका पूर्ण हिस्सा बन पाऊंगा, इसमें रम जाऊंगा, इसका मुझे विश्वास नहीं है। मार्क्सवाद का मुझमें सुरूर व गुरूर अभी बाकी बचे हैं। वामपंथी पत्रकार के तौर पर मेरी विशिष्ट पहचान साबुत है। यह पहचान मुझे नेताओं और पत्रकारों की भीड़ में खो जाने से रोकती है। मैं नौकरशाहों और धनपतियों के साथ दिल खोल कर घुल नहीं पाता हूं। सागर में हूं, मगर, मगर से बैर जारी है!

दिसंबर, 1980 गांव में मां का निधन हो गया। मैं और मधु दोनों ही ट्रेन से बसवा रवाना हो गए हैं। एक वर्षीय बिटिया को नानी के पास छोड़ दिया है। जब तक हम गांव पहुंचते हैं, ताई का दाह संस्कार हो चुका होता है। यह कैसा संयोग है कि मैं दोनों (माता पिता) के दाह संस्कार से वंचित रहता हूं। अलबत्ता मैं और मधु गंगा में ताई का अस्थि विसर्जन जरूर करते हैं। सूरज गांव का मोर्चा संभालता है।

तेरहवीं की बात उठती है। मैं इसका विरोध कर रहा हूं। अन्ततः मैं एक शर्त के आधार पर इसे मान लेता हूं। मेरी शर्त है कि तीन चार मेहतरानियों को भी पंगत में बैठाया जाए। काफी बहस के बाद मेरी मांग को मान लिया गया है। मैं संतुष्ट हूं। इस अंतिम संस्कार के बाद हम लोग दिल्ली लौट आए हैं।

करीब डेढ़ वर्ष का वक्त बीत चुका है। पी.आई.बी. (प्रेस इन्फोरमेशन ब्यूरो) की मान्यता (एक्रीडीटेशन) के लिए मुझे आवश्यक ‘सुरक्षा अनुज्ञापत्र‘(सिक्युरीटी क्लीरेंस) नहीं दिया जा रहा है। आई.बी. (इंटलीजेंस ब्यूरो)मुझे अब भी ‘सुरक्षा खतरा‘ के रूप में देखती है। जबकि मैं इस पूंजीवादी व्यवस्था के साथ ‘एडजेस्ट‘ करने लगा हूं। अजीब विरोधाभास है इस निजाम का।

‘नई दुनिया‘ मेेरे साथ खड़ी है। तिवारी जी और रज्जू बाबू कहते हैं, ‘अरे जोशी जी, आप क्रांति करने गए थे, नहीं हुई। हाजी मस्तान थेाड़े ही बनने गए थे। हम सुप्रीम कोर्ट तक जाएंगे। सरकार को झुकना पड़ेगा। आप चिंता न करें।‘  और सच! सरकार झुकी। मुझे अन्ततः पीआईबी का ‘मान्यता पत्र‘ प्राप्त हो गया, बिना किसी विचारधारात्मक समझौते या फिसलन के। इसका श्रेय मैं प्रबंधकों और सम्पादक (राहुल बारपुते और राजेन्द्र माथुर) का दूंगा। इतना ही  नहीं-

एक बार कांग्रेस के कतिपय सांसदों ने अब्बू जी (अभयचंद छजलानी) पर मुझे ब्यूरो प्रमुख पद से हटाने के लिए दबाव भी डाला। इन सांसदों की दलील थी कि मैं खांटी वामपंथी हूं। नक्सलपंथियों से मेरा संबंध रहा है। इमरजेंसी में मेरे खिलाफ ‘मीसा वारंट‘ भी जारी किया गया। इसलिए मुझे पदमुक्त कर आलोक मेहता जैसे किसी भरोसेमंद को ब्यूरो प्रमुख बना दिया जाए।

ऐसे सांसदों को अब्बूजी ने एक ही जवाब दिया, ‘देखिए, जोशी जी के अपने राजनीतिक विचार हैं। यह बतलाएं कि उनकी रिपोर्टिंग कैसी है? क्या उनका कवरेज बायस्ड है सांसदों ने कहा, ‘उनकी रिपोर्टिंग से हमें कोई शिकायत नहीं है। उनका ऑब्जेक्टिव कवरेज रहता है।‘‘ तब ठीक है। जिस रोज वे समाचारों में वैचारिक घालमेल करने लगेंगे, तब हम कार्रवाई करेंगे। सांसद संतुष्ट हो गए मैंने भी ‘तथ्य पवित्र होते हैं, और विचार अपने होते हैं‘ की नीति का पालन किया। वास्तव में संकट की घड़ियों में प्रबंधक और संपादक, दोनों का संरक्षण मुझे मिलता रहा है। मैं समझता हूं कि भविष्य में ऐसे मालिकों और संपादकों की प्रजाति लुप्त होती चली जाएगी।

नया आवास और नया रोल, दोनों रास आ रहे हैं। अब इन्दिरा जी अपनी पहली जैसी चमक धमक से रीती लग रही हैं। सत्ता में धमाकेदार वापसी के चंद महीनों के भीतर उन्हें निजी त्रासदी का सामना करना पड़ा। 23 जून 1980 को राजधानी दिल्ली में ही छोटे पुत्र व अमेठी से निर्वाचित संजय गांधी की मृत्यु हो गई। वे एक पायलट के साथ हवाई सैर पर थे। दोनों की मृत्यु घटनास्थल पर हो गई। इस दुर्घटना को लेकर एक नहीं अनेक अफवाह संसद गलियारों के भीतर बाहर हफ्तों गरम रही हैं। संजय गांधी के प्लेन क्रैश को समुद्रपारीय षड्यंत्र का हिस्सा माना जा रहा है। क्या सच है, क्या असत्य मैं नहीं जानता। पत्रकार के नाते इसकी तह में जाना चाहिए। लेकिन मेरी सीमाएं हैं। 

पर एक बात तय है। यदि यह साजिश है तो दूसरे सूत्रधारों ने इस हवाई दुर्घटना के माध्यम से जहां संजय गांधी की हत्या की है, वहीं उन्होंने 1966 -77 वाली विद्रोही इंदिरा गांधी की भी हत्या कर डाली है। वे काफी टूटी हुई लग रही हैं। उनका घर परिवार अशांति की चपेट में आ चुका है, सास इंदिरा उर्फ प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी और पुत्र वधू उर्फ जवान विधवा मां मेनका गांधी के बीच औसत भारतीय परिवार की भांति सास-बहू कलह फूट चुकी है। इस कलह पर भी ध्यान रखना पड़ रहा है।

मैं फिर से संसदीय रिपोर्टिंग कर रहा हूं। दोनों सदनों में भव्य वक्ताओं का जमघट है, अटल बिहारी बाजपेई, चंद्रशेखर, मधु दंडवते, जॉर्ज फर्नांडिस, समर मुखर्जी, इंद्रजीत गुप्त, लालकृष्ण आडवाणी, हेमवती नंदन बहुगुणा, बाबू जगजीवन राम जैसे प्रखर नेताओं को सुनना, हम पत्रकारों के लिए ज्ञानवर्धक होता है। इनके शब्दों में इतिहास, वर्तमान का यथार्थ और भविष्य की तस्वीर रहती है। भावना और विवेक की रसधारा इनके संबोधनों में बहती रहती है। इंदिरा जी स्वयं इन्हें गौर से सुनती हैं।

बंधुआ मजदूर की कथाएं अभी मेरा पीछा कर रही हैं। रीवां के ‘तीन लंगड़े गांव की कहानी‘ से देश में तहलका मच गया है। विषाक्त मटरा दाल के प्रभावों से पीड़ित इन तीन गांवों  का अध्ययन सन् 1979 में शुरू किया गया था। मेरे निर्देशन में तीन चार सदस्यों की टीम ने विकलांग बंधक श्रमिकों की अमानवीय जीवन स्थिति को उद्घाटित किया है। अध्ययन रिपोर्ट का लोकार्पण भी मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने किया। इसके चौंकाने वाले निष्कर्षों की गूंज भी लोकसभा में सुनाई दी है। प्रधानमंत्री ने भी इसे गंभीरता से लिया है।

अर्जुन सिंह ने एक रोज मुझसे कहा कि इस रिपोर्ट के कारण इंदिरा जी के यहां उनकी पेशी हो चुकी है। उन्होंने इन बंधक श्रमिकों की ओर ध्यान देने का निर्देश दिया है। दिलचस्प बात यह है कि अध्ययन समृद्ध राजपूत जमींदारों के खिलाफ है, जबकि मुख्यमंत्री स्वयं इस जाति और पड़ोसी क्षेत्र चुरहट से हैं।

उन्होंने निःसंकोच इसे जारी किया। इस अवसर पर स्वामी अग्निवेश और विगत में मुक्त हुए अनेक बंधक श्रमिक मौजूद थे। सन 1982 के आरंभ में हम लोगों ने ‘बंधुआ मुक्ति मोर्चा‘ बनाया है। देशभर से आए कई दर्जन एक्टिविस्टों ने दो रोज तक इस मुद्दे पर बहस की। इस मंथन का परिणाम था ‘मोर्चा‘। अध्यक्ष के रूप में स्वामी अग्निवेश को इसकी कमान सौंपी गई, और मुझे महामंत्री बनाया गया। विगत प्रेत बन कर उस समय तक पीछा करता रहता है जब तक आप स्वयं अपनी नई पहचान में जन्म नहीं ले लेते हैं। मैं अभी तक ‘डिलिंक‘ नहीं कर सका हूं इस प्रेत से ! शायद यही वजह है कि मुझे स्वामी अग्निवेश के साथ यूरोप व अमेरिका की यात्रा पर जाना पड़ रहा है।

जुलाई 1983 में स्वामी अग्निवेश, सांसद इंद्रवेश और मैं हालैंड, प. जर्मनी, लंदन, स्वीटजरलैण्ड और अमेरिका की यात्रा पर निकल पड़े हैं। ब्रिटेन की एंटी स्लेवरी सोसायटी तथा अन्य संस्थाओं का निमंत्रण स्वामी जी को मिला है। मेरी पहली विदेश यात्रा है, या यह कहना अधिक सटीक होगा कि विश्व की सबसे समृद्ध व विकृत ‘भोगवादी संस्कृति‘ से मेरा प्रथम साक्षात्कार हो रहा है।

यहीं पहली दफा फ्रैंकफर्ट में ‘पीप इन सो‘ देखा, जिसमें नितांत नग्न स्त्री पुरुषों को देखा, आंखों देखी संभोग क्रिया को देखा। शहर कोलोन में ‘ब्लू फिल्म सो‘ भी देखा। अग्निवेश भी साथ में थे। इस शो से मुझे बेहद घिन भी हुई। इन क्षणों में

मैंने स्वामी अग्निवेश जी से पूछा, ‘क्या कोई व्यक्ति सौ प्रतिशत ब्रह्मचारी रहकर जीवन जी सकता है?‘ उनका जवाब नकारात्मक है। ‘यह देह की आवश्यकता है। इसकी पूर्ति के अपने अपने तरीके होते हैं।‘ उन्होंने कहा।

यूरोप के चंद शहरों - हैग, एम्सटर्डम, रोटेडर्म (हॉलैण्ड), ब्रुसेल्स (बेल्जीयम)य  फ्रैंकफर्ट, बोन, कोलोन, हैडलवर्ग (प. जर्मनी), लंदन, ऑक्सफोर्ड (ब्रिटेन), जिनेवा (स्वीटजरलैंड) जैसे नगरों की दुनिया देखने के पश्चात मेरा जी इस यात्रा से उचाट होने लगा है। मैं यात्रा के अंतिम पड़ाव अमेरिका नहीं जाना चाहता हूं। स्वामी जी को न्यूर्याक व वॉशिंगटन जाने से साफ साफ मना कर देता हूं। अग्निवेश जी दुखी हैं। इंद्रवेश भी अमेरिका नहीं जा रहे हैं। वे जर्मनी से भारत लौटना चाहते हैं। मैं भी दिल्ली लौट जाना चाहता हूं। टिकट में यात्रा मार्ग का संशोधन कराने के बाद  मैं भी लुफ्तांजा से स्वदेश लौट रहा हूं। अब अग्निवेश जी अकेले ही अमेरिका जा रहे हैं।

मेरे लिए यात्रा के अधबीच से दिल्ली लौटना ठीक ही रहा है। हम हिंदी के पत्रकार अक्सर ‘कुढ़न व कुंठा‘ की चपेट में रहते हैं। इसका मुख्य कारण है, ‘अभावों की संस्कृति और अवसरों का आकाल‘।

मेरी विदेश यात्रा भी ‘कुढ़न व कुंठा‘ की चपेट में आ गई है। इसे सीआईए प्रायोजित बताया जा रहा है। सप्ताहिक ‘दिनमान‘ ने तो मुझे और अग्निवेश को ‘सीआईए एजेंट‘ तक बना दिया है। कन्हैयालाल नंदन के संपादन में प्रकाशित ‘दिनमान‘ के सूत्रों का कहना है कि एक ईर्ष्यालु कांग्रेसी संवाददाता ने बगैर नाम से कथित रूप से या खबर लिखी है। अग्निवेश जी गुस्से में हैं। संपादक कन्हैयालाल नंदन और प्रबंधक रमेश चंद जैन को पत्र लिखे हैं।

समान विचारधर्मी आनंद स्वरूप वर्मा, पंकज बिष्ट, इब्बार रब्बी सहित अनेक मित्र  इस खबर की आलोचना कर रहे हैं। ‘नवभारत टाइम्स‘ के संपादक राजेंद्र माथुर (1982 के अंत में ‘नई दुनिया‘ से त्यागपत्र देकर नभाटा में आ गए थे) राहुल बारपुते, नरेंद्र तिवारी, प्रभाष जोशी जैसे वरिष्ठ पत्रकार भी इस खबर को अविश्वसनीय और कुढ़न से उपजी मान रहे हैं।

वास्तव में मेरा ब्यूरो प्रमुख बनना कतिपय पत्रकारों को रास नहीं आया है। इन पत्रकारों की नजर इस पद पर गड़ी हुई थी। वे आज भी मुझे हटाने की खुराफात में सक्रिय हैं और अभय जी को भड़काते रहते हैं। लेकिन, उनका तीर हर बार निशाने से फिसल जाता है। इस बार भी इन पत्रकार मित्रों को निराश होना पड़ रहा है।

‘नई दुनिया‘ का संपादकीय विभाग मेरे साथ चट्टान की भांति खड़ा हुआ है और इसे रद्दी की टोकरी के हवाले कर दिया गया है। इसकी मुख्य वजह यह है कि मेरे ‘मिशन उखाड़‘ के संचालक मालवा के एक ‘सफारी पत्रकार‘ की खुद की छवि ‘दलाल‘ की है। दिल्ली, भोपाल, इंदौर और उज्जैन के मीडिया क्षेत्रों में या पत्रकार ‘मालिक प्रबंधक चरणस्पर्शी‘ पत्रकार के रूप में कुख्यात है। इसलिए इसे गंभीरता से नहीं लिया गया है। मेरे लिए यह प्रकरण एक सबक के समान है। खुशी इस बात की है कि मेरी छवि इस प्रकरण में अप्रभावित रही है। मेरी प्रतिबद्धता भी मेरा कवच बनी रही है। सच, यदि आपके कार्यों का आधार ठोस है सत्य पर आधारित है तो आसानी से असत्य प्लावन आप के तट को काट नहीं सकेगा।

वैसे मैं देख रहा हूं कि पत्रकारिता का परिदृश्य तेजी से बदलता जा रहा है। अब पत्रकार अपने प्रोफाइल व काया भाषा में गहरी रुची लेने लगे हैं। अब पत्रकारों में थ्रीपीस एवं सफारी मार्का प्रजाति उभर रही है। पहले यह प्रजाति अंग्रेजी प्रेस तक सीमित थी, लेकिन इधर कुछ समय से हिंदी प्रेस भी इस से समृद्ध होने लगी है।

संपादकों के साथ-साथ ब्यूरो प्रमुख, विशेष संवाददाता भी सफारी सूट और थ्री पीस के शौकीन बन रहे हैं। इस दृष्टि से संपादक कन्हैयालाल नंदन लाजवाब हैं। सुना जाता है नंदन जी का ब्रेकफास्ट, लंच डिनर प्रायः नेता, मंत्री, अफसर और राजनीतिज्ञों के साथ होते हैं। राजेंद्र अवस्थी को सेठों की सोहबत पसंद है। वैसे नेता, मंत्री, संत्री अवस्थी जी की भी अंटी में रहते हैं। संयोग से ये दोनों ही मेरे पड़ोसी हैं। गनीमत यह है कि मेरा आवास शुरू में है मध्य में नहीं है। इस तरह से मैं सैंडविच बनने से बच गया हूं। पर यह अलग बात है कि नंदन और अवस्थी दोनों संपादकों के संप्रदाय जुदा-जुदा हैं। एक अधिक आधुनिक चतुर चपल और ‘गो-गोटर‘ हैं, जबकि दूसरा ढीला ढाला सामंती किस्म का है। पर दोनों संप्रदाय हैं सत्तासेवी और अवसर मारक हैं।

मेरा ट्रेडमार्क आज भी ‘लाल झोला‘ वाला है जो कि सभी छोटे-बड़े अवसरों पर कंधे से झूलता रहता है। मैं कैजुअल पहनना ज्यादा पसंद करता हूं। खादी का कुर्ता पजामा पहनता हूं, जिन पर लंबा कुर्ता डाल लेता हूं। चप्पल व सैंडल पहनना भाता है। कई लोगों ने समझाया भी है कि मैं अपनी सर्वहारा या ‘फटीचर‘ जीवन शैली से मुक्ति पा लूं। मैं भी अपने समकक्ष ब्यूरो प्रमुखों के सामने ‘टिपटॉप‘ रहना शुरू करूं, कीमती वस्त्र पहनूं, कोसा कि कुर्ते में लिपटा रहूं, कलाई कीमती घड़ी से शोभित रहे। यदि मुझे कैरियर बनाना है, राजधानी के हिंदी दैनिकों में से किसी का संपादक बनना है, मंत्रियों व नौकरशाहों में अपनी पैठ बनानी है तो ‘सेल्फ प्रोजेक्शन‘ करना होगा। खुद की मार्केटिंग करनी होगी और वामपंथी छवि को तिलांजलि देनी होगी। हजार कोशिशों के बावजूद मैं स्वयं को बदल नहीं पा रहा हूं। यदि मैंने स्वयं को बलात् बदलने की कोशिश की तो मैं अपना बहुत कुछ गवा दूंगा। इसलिए मैंने मन बना लिया है, ‘अपने राम तो अपनी चाल से ही चलते रहेंगे‘।

                                                                 (शेष और अंतिम भाग कल)










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