दूसरी आजादी का भ्रम और नायिका की वापसी

नई किताब , , मंगलवार , 06-03-2018


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रामशरण जोशी

(वर्ष 2004 में  मासिक ‘हंस’ में प्रकाशित वरिष्ठ पत्रकार रामशरण जोशी के दो आलेख-मेरे विश्वासघात व मेरी आत्मस्वीकृतियाँ बेहद चर्चित-विवादास्पद रहीं। हिन्दी जगत में भूचाल आ गया था। पत्रिकाओं ने विशेषांक निकाले। अब उनकी आत्मकथा ‘‘मैं बोनसाई अपने समय का एक कथा आत्मभंजन की’’ आई है। राजकमल प्रकशान से प्रकाशित यह आत्मकथा 445 पृष्ठों की है। जिसमें वे खुद के परखचे उड़ाने की फिर से हिमाकत की है। नहीं बख्शा खुद को, शुरू से अन्त तक। हर वर्ष दर्जनों आत्मकथाएं आती है, ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर क्यों पढ़ें इस ‘‘मैं बोनसाई अपने समय का कथा एक आत्मभंजन की’’? सच ! ड्राइंग रूम की शोभा ही तो है यह जापानी फूल। कहां महकता-दमकता है? इसका आकार न बढ़ता है, न ही घटता है। बस! यथावत् रहता है बरसों तक अपने ही वृत्त में यानी स्टेटस को ! कितना आत्म-सन्तप्त रहता होगा अपनी इस स्थिति पर, यह कौन जानता है ? यही नियति है बोनसाई की उर्फ उस मानुष की जो अपने वर्ग की शोभा तो होता है लेकिन अपनी सीमाओं का अतिक्रमण नहीं कर पाता। वर्गीय मायाजाल-मुग्धता में जीता रहता है, और उन लोगों का दुर्ग सुरक्षित-मजबूत रहता है। व्यवस्थानुमा ड्राइंग रूम में निहत्था सजा बोनसाई निरीह बना देखता रहता है। यह आत्मकथा रामशरण जोशी जी की जरूर है लेकिन इसमें समय-समाज और लोग मौजूद हैं। दूसरे शब्दों में, खुद के बहाने, खुद को चीरते हुए व्यवस्था को परत-दर-परत सामने रखा है। सो, कथा हम सब की है।) - संपादक 

मैं बोनसाई अपने समय का एक कथा आत्मभंजन की

जेपी (जयप्रकाश नारायण) के नेतृत्व में शुरू हुई संपूर्ण क्रांति और दूसरी आजादी का आंदोलन 'तिनकों का जहाज' निकला। एक ऐसा जहाज जिसे भांति भांति के तिनकों (जनसंघ, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, समाजवादी भारतीय क्रांति दल, युवा तुर्क, असंतुष्ट कांग्रेसी आदि) से तैयार किया गया था। राजसत्ता के महासागर (1977 में केंद्र में शासन) में उतरते ही यह जहाज डगमग डगमग करने लगा, इसमें सुराख होने लगे और सवार यात्री (प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई, चंद्रशेखर, जगजीवन राम, चौधरी चरण सिंह, मधु लिमए, जॉर्ज फर्नांडिस, राजनारायण, अटल बिहारी वाजपेई, लालकृष्ण आडवाणी, हेमवती नंदन बहुगुणा आदि)  इसे मझधार के हवाले कर सुरक्षित तटों की ओर लपकने लगे।

प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के नेतृत्व में गठित सरकार और युवा तुर्क चंद्रशेखर की अध्यक्षता में स्थापित जनता पार्टी का तिनकों का जहाज नेताओं की महत्वाकांक्षाओं के भंवर की भेंट चढ़ गया।  राजसत्ता की सुपर खिलाड़ी इंदिरा गांधी के झांसे में फंसकर चौधरी चरण सिंह ने भी अपना सर्वनाश किया। देसाई सरकार के पतन के बाद चरण सिंह सरकार भी तट पर नहीं लग सकी। इंदिरा-संजय गांधी के भंवर में फंसकर चरण सिंह सरकार भी अकाल मृत्यु को प्राप्त हुई।

मध्यावधि चुनाव के पश्चात इंदिरा गांधी की धमाकेदार वापसी हुई 14 जनवरी 1980 को उन्होंने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। लगभग चौतीस महीनों के सत्ता वनवास के पश्चात एक बार फिर से सत्तारूढ़ हो गई है। नवंबर से दिसंबर 1979 के दौरान अपने तूफानी चुनाव अभियान में उन्होंने प्रतिदिन करीब 20 जनसभाओं को संबोधित किया और 384 निर्वाचन क्षेत्रों को दिन रात नापा। जनता उन पर जनूनी रूप से न्योछावर थी और 351 सीटों को उनके फैले आंचल में डाल दिया। इंदिरा जी ने उत्तर भारत (रायबरेली) और दक्षिण भारत (मेडक) की दो .. दो लोकसभा सीटों से विजय होकर अपने नेतृत्व की अभेद्यता पुनर्स्थापित कर दिया;जनता पार्टी, लोक दल, भारतीय जनता पार्टी सहित कोई भी विरोधी दल 54 सीटें प्राप्त करने में विफल रहा। लोक सभा में प्रतिपक्ष नेता की पद प्राप्ति के लिए सांसदों की यह संख्या आवश्यक है। इंदिरा गांधी की पुनर्वापसी के सैलाव में उनके विरोधियों का 'ताश का बांध' फूर्र से ढह गया।

पटना के गांधी मैदान में जेपी

मध्यावधि चुनाव की घोषणा के साथ मेरी भी पत्रकारिता में पूर्ण कालिक वापसी हो गई थी। मैंने भी नई दुनिया के लिए दिल्ली, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश राजस्थान जैसे राज्यों के कतिपय निर्वाचन क्षेत्रों का दौरा किया, मतदाताओं को समझने का प्रयास किया और उनके मन मस्तिष्क में बैठे इंदिरा गांधी को देखा। इंदिरा गांधी अपने संपूर्ण आब ताब के साथ 'साउथ ब्लॉक' प्रधानमंत्री कार्यालय पर काबिज होने जा रही है, यह साफ दिखाई दे रहा था और जनता का भी यही जनादेश निकला।

मैं 1971 के पश्चात 1979 में चुनाव रिपोर्टिंग कर रहा था। करीब नौ वर्ष के लंबे ब्रेक के पश्चात पत्रकारिता के अखाड़े में उतारना मुझे अजीब सा लग रहा है। मैं इसमें मन से रम नहीं पा रहा हूं। इस नौ साल की अवधि में काफी कुछ बदल चुका है। हलाकि इसके दांव पेच मैं भूला नहीं हूं। लेकिन ना जाने क्यों मुझे इससे वितृष्णा सी हो रही है। पत्रकारिता में पहली जैसी सार्थकता नहीं लग रही है। इसका खोखलापन अधिक साल रहा है।

पत्रकारों ने फिर से इंदिरा जी की वंदना शुरू कर दी है हिंदी के संपादक संजय गांधी का कशीदा पढ़ने लगे हैं पत्र पत्रिकाओं में आपातकाल के नारे 'इंडिया इज इंदिरा, इंदिरा इज इंडिया' गूंज फिर से सुनाई दे रही है। प्रेस ने जल्दी ही आपातकाल को भुला दिया है, और इसके साथ ही दूसरी आजादी की प्रतिनिधि जनता पार्टी सरकार को भी दफन किया है; मोरारजी देसाई,चौधरी चरण सिंह की सरकारों को भारतीय राजनीति का 'डरावना स्वप्न' के रूप में चित्रित किया जा रहा है।

गजब का गिरगिट दृष्टि रंग तरंग मेरी बिरादरी में दिखाई दे रहा है, एक आपात काल पूर्वदृष्टि;  दो आपातकालीन दृष्टि; जनता पार्टी शासन कालीन दृष्टी; चार, इंदिरा वापसी पूर्व दृष्टि; और पांच उत्तर इंदिरा पुनर्वापसी दृष्टि मुख्यधारा की पत्रकारिता में इन पांचों दृष्टियों में कोई तारतम्यता नहीं है। यदि कोई तारतम्यता है तो बस एक ही है और वह है 'सत्तानिष्ठा' की। यह सत्ता निष्ठा ही प्रेस दृष्टि के रूप रंग को तय कर रही है। यद्यपि प्रेस में संपादक अभी जीवित है। लेकिन वैचारिक पत्रकारिता का नेतृत्व करने वाली साप्ताहिक पत्रिका 'दिनमान' का अवसान काम शुरु हो चुका है। साप्ताहिक 'हिंदुस्तान' को ग्रहण लग चुका है। अब रघुवीर सहाय, मनोहर श्याम जोशी के पहले जैसे संपादक जलवे कहां।

मैं पत्रकारिता में लौट आया हूं लेकिन एक 'एक्टिविज्म' और रिसर्च के 'हैंगओवर' से निजात नहीं पा सका हूं। मुझे अभी सक्रिय राजनीति और सृजनात्मक शोध का का ज्वार भाटा जीवित है। मैं पत्रकारिता में रहूं या फिर से पलायन करु, यह कसमकस मुझे लगातार बेचैन किए रहती है। इसी मनोदशा में एक रोज चौथी बार प्रधानमंत्री बनी इंदिरा गांधी के मुंह बोले तीसरे पुत्र उर्फ छिंदवाड़ा से नव निर्वाचित सांसद कमलनाथ से भिड़ जाता हूं।

हुआ यह कि मध्यप्रदेश भवन में इंदिरा गांधी के सम्मान में स्वागत भोज का आयोजन किया गया था। संजय गांधी, कमलनाथ सहित सभी नव निर्वाचित कांग्रेसी सांसद भी मौजूद थे। स्वागत करता थे मध्यप्रदेश विधानसभा में प्रतिपक्ष के कांग्रेसी नेता और संभावी मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह। हम पत्रकार भी निमंत्रित थे। इस अवसर पर इंदिरा गांधी और संजय गांधी के बाद कमलनाथ 'प्रमुख आकर्षण' थे। इसका आधार भी था। जनता पार्टी सरकार के पतन, चौधरी चरण सिंह को बागी बनाने और कांग्रेस की सत्ता में पुनर्वापसी की रणनीति के सूत्रधार संजय गांधी व कमलनाथ को माना गया था। इसलिए जब संसद भवन के केंद्रीय कक्ष में इंदिरा जी को कांग्रेस संसदीय दल का नेता चुना जा रहा था तब संजय गांधी की कीर्ति देखने लायक थी। मैंने देखा था कि किस प्रकार बसंत साठे जैसे कई नेता संजय गांधी की तुलना कृष्ण से कर रहे थे। कमलनाथ पर भी शब्द पुष्प वर्षा की जा रही थी। हर मुमकिन मिथकीय संज्ञाओं-विशेषणों से इंदिरा जी और संजय व कमलनाथ को  नवाजा जा रहा था। इस स्तुतिगान का मौन दर्शक मैं भी बना था। मुझे मुझे इस स्तुति नाट्य मंचन से घिन हो रही थी। मध्यप्रदेश भवन में आयोजित स्वागत समारोह में भी मुझमें घिन को भड़का दिया था।

सांसद कमलनाथ

कमलनाथ कतार बांधे सांसदों से अभिनंदन बटोरते और उन्हें अपनी दिखावटी मुस्कुराहटों से उपकृत करते हुए हम पत्रकारों के पास आए। जब उन्हें मेरा परिचय दिया गया कि मैं दिल्ली में 'नई दुनिया' का प्रतिनिधि हूं तो वह जम कर भड़क उठे। चीखते हुए कहने लगे कि नई दुनिया ने मेरे खिलाफ बहुत लिखा है। मैंने उन्हें बतलाया कि मैंने उनका 'चुनाव कवर' नहीं किया था। 'नई दुनिया' में आप के संबंध में क्या प्रकाशित होता रहा है, मैं नहीं जानता। पर कमलनाथ सुनने वाले कहां थे। वह तो आपे से बाहर होने लगे थे उन्होंने धमकी भरे स्वरों में कहा कि अगर आप छिंदवाड़ा में होते तो आज यहां नहीं होते। उनके इस आपत्तिजनक व्यवहार से हम सभी पत्रकार सकते में थे। पास खड़े सांसद उन्हें शांत करने की कोशिश कर रहे थे। मेरा भी धैर्य बांध टूटने लगा। मैं अपने एक्टिविस्ट रंग में आ गया।

उन्हें धमकी दी कि मैं उनके व्यवहार की शिकायत दूसरे कोने में बैठी इंदिरा गांधी से करने जा रहा हूं। मैं जाने लगा। कमलनाथ मेरे इस अप्रत्याशित रूप से अवाक रह गए। मेरी धमकी को देखकर कमलनाथ ठंडे पड़ने लगे। दूसरे लोगों ने बीच बचाव किया। सुभाष यादव, प्रताप भानु शर्मा, रामेश्वर नीखरा जैसे युवा सांसद उन्हें अपने साथ खींच कर ले गए। साथी पत्रकारों ने मुझे भी समझाया। हितवाद के अनिल चक्रवर्ती, भास्कर के जगन्नाथ शास्त्री जैसे पत्रकारों ने कहा कि मेरी नई नई नौकरी है। 'नई दुनिया' के तीनों मालिक (लाभचंद छजलानी, नरेंद्र तिवारी और महेंद्र सेठिया) मूलत: कांग्रेस समर्थक हैं। यह विवाद मेरी नौकरी ले सकता है।

लेकिन मैं बैठा बामपंथी एक्टिविस्ट हार मानने के लिए तैयार नहीं था। मेरी शब्दावली भी वामपंथी थी। मैं कमलनाथ को 'बुर्जुआ और लुम्पन सांसद' कह रहा था। मेरी नौकरी भी जा सकती है, इस  भय से मैं मुक्त था। स्वागत भोज की समाप्ति के पश्चात  मैंने रात्रि में अभयचंद छजलानी (डिफेक्टो सम्पादक) को एस.टी.डी. काल लगा दिया और कमलनाथ से टकराव की घटना का विवरण सुना दिया।

मैंने फोन पर यह भी कह दिया, ''आप चाहे तो मेरा इस्तीफा ले सकते हैं। मैं अपनी वजह से आपको संकट में नहीं डालना चाहता हूं। उन्होंने मेरे उद्वलित स्वरों को धैर्य पूर्वक सुने और बोले, ''जोशी जी, आप इतने उत्तेजित मत होइए। इस तरह के कमलनाथ आते जाते रहते हें। यदि हम डरने लगे तो अखबार नहीं निकाल सकते, पत्रकारिता नहीं कर सकते। आपको त्यागपत्र देने की आवश्यकता नहीं है। आप निडर होकर अपना कार्य करते रहें।''

पर इस घटना ने मुझे हिलाकर रख दिया। मैं यह सोचने के लिए विवश हूं कि क्या मुझे इस दलदल में फंसना चाहिए? क्या मुझे इन घटिया नेताओं को रोज ब रोज शब्दों का ताज नहीं पहनाना पड़ेगा? मैं कब तक इन नेताओं से टकराता रहूंगा? यदि मुठभेड़ें करनी ही है तो क्यों नहीं 'अरण्य' में लौट जाएं? अरण्य को जगाया जाए। वहीं से मुठभेड़ की तैयारी की जाए। मैं इन भावनाओं के द्वार में बहने लगा हूं। मैंने तय कर लिया है कि मुझे बस्तर लौट जाना चाहिए।

मैं डॉक्टर ब्रह्मदेव शर्मा जी से अपनी इस घुटन की चर्चा करता हूं। वे मेरी कशमकश से सहमत हैं। वे भी बस्तर जाने का कार्यक्रम बना रहे हैं। इस समय वे मध्यप्रदेश शासन में आदिवासी विभाग के सचिव है। बस्तर रवाना होने से पहले मैं मधु से भी अपनी बेचैनी शेयर करता हूं और बस्तर जाने के संबंध में बतलाता हूं। वह खामोश है। वह नवजात बच्चे की मां बनी है। फकत चंद महीनों की मां! मैं दोनों को मधु के माता पिता के पास छोड़कर जा रहा हूं। मैं सिर्फ स्वयं की संतुष्टी में लीन हूं। जच्चा बच्चा के प्रति तटस्थ सा हूं। 'नई दुनिया' को मैं फोन कर अपनी मनोदशा से अवगत कराता हूं। संपादक राजेंद्र माथुर मेरे निर्णय से सहमत नहीं है। फिर भी वे इस उद्विग्नता से उबरने के लिए कुछ रोज का अवकाश दे देते हैं। नरेंद्र तिवारी जी और अभय छजलानी मेरे इस कदम से आवाक हैं पर दोनों ही मेरी भावनाओं का सम्मान कर रहे हैं।

मैं बस्तर निकल पड़ता हूं, डॉक्टर शर्मा के साथ। शर्मा जी चाहते हैं कि बस्तर में 'मेरा गांव मेरा राज' का अलख जगाया जाए। इस नारे के ईद-गिर्द आदिवासियों को संगठित किया जाए। मैं भी सहमत हूं हम लोग चार पांच रोज साथ रहते हैं। वे लौट आते हैं और मैं जगदलपुर में रुक रहा हूं। पुराने साथियों के साथ मैं अपनी भावनाएं शेयर कर रहा हूं। अधिकतर मित्रों की सलाह एक ही है - 'तुम्हें लौट जाना चाहिए अब तुम अकेले नहीं हो। जीवन में व्यवहारिक बनना होगा। भावुकता से काम नहीं चलेगा। 'नई दुनिया जैसा प्रतिष्ठित अखबार आसानी से नहीं मिलता है। तुम्हें लौटना होगा। यह प्रतिक्रियाएं  मुझमें हलचल मचा रही है। मैं अपने निर्णय पर पुर्निवचार कर रहा हूं। बस्तर के कुछ गांवों का दौरा करके मैं दिल्ली लौट रहा हूं। आपात काल में मुझे बस्तर से निष्कासित किया गया था, अब मैं स्वेच्छापूर्वक 'आत्म निष्कासन' कर रहा हूं। पता नहीं मेरे इस संक्रमण काल का अंत कहां व कैसे होगा। यह सवाल मुझ पर सवार है और मैं दिल्ली लौट रहा  हूं।

                                                ( ....शेष भाग कल पढ़ें।)   










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