90 फीसदी पुरुषों के भीतर रहता है एक बलात्कारी!

आधी आबादी , , सोमवार , 23-04-2018


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ऋचा साकल्ले

बात आज से करीब 16-17 साल पहले भोपाल की है। मैं पत्रकारिता की पढ़ाई कर रही थी। ईद का मौका था। मेरे एक मित्र को जो पंजाब का था उसे पुराने भोपाल घुमाने ले जाने का कार्यक्रम बना। मैं वक्त पर ताजुल मस्जिद पहुंच गई। मैं दोपहर 12 बजे ताजुल मस्जिद की डेढ़सौ सीढ़ियों के बीचों-बीच खड़ी अपने मित्र का रास्ता देख रही थी। वो पहुंचा नहीं लेकिन तभी कहीं से तीन लड़के निकलकर आए उन्होंने

मुझसे दबंग आवाज में पूछा 'यहां क्यों खड़ी है'? मैंने उसी दबंगई से जवाब दिया तुम्हें क्या करना है। मेरा ये कहना था कि पीछे से तीन लड़के और आए और कहने लगे 'उठाओ इसको'। मैं गड़बड़ की आशंका से एक को धकेल कर सीढ़ियों से नीचे दौड़ पड़ी नीचे एक ऑटोवाला था उससे चलने को कहा। इधर वो छहो लड़के मेरे पीछे दौड़कर नीचे आ गए। ऑटो वाला टस से मस नहीं हुआ उन लड़कों ने मुझे फिर घेर लिया। तब मैंने कहा देखो मैं पत्रकार हूं और अपने कैमरामैन का इंतजार कर रही हूं ईद की रिपोर्टिंग करने आई हूं।

चाहो तो मेरा आईकार्ड देख लो।उनमें से एक अपने जननांग की तरफ इशारा करते हुए बोला 'मैं अपना दिखाऊं क्या'।मैं फिर भागी और भागकर एक एसटीडी पीसीओ पहुंची वो लोग फिर मेरे पीछे नहीं आए। घर पहुंचकर तीन दिन तक मैं डिप्रेशन में रही और उस लड़के के वो शब्द 'मैं अपना दिखाऊं क्या' मेरे दिल दिमाग में घूमते रहे। उस पल मुझे अहसास हुआ कि लड़कों का माइंडसेट किस तरह काम करता है उनका जननांग उनकी वास्तविक पहचान कैसे बन जाता है। कैसे वो अपने दिमाग में ये सोचते हैं कि वो जननांग का डर दिखाकर सामने वाले पर बल प्रयोग कर लेंगे। और तब मैं यह पूरी तरह समझ गई कि बलात्कार समस्या नहीं सोच है।माइंडसेट है।

मैंने यह मान लिया कि वो लड़का अशिक्षित था इसलिए उसने ऐसी गंदी बात कही लेकिन फिर सवाल यही था कि क्या शिक्षित पुरुष बलात्कार नहीं करता। इसीलिए आज जब बलात्कार पर फांसी की सजा की बात हुई है तो मेरा मन नहीं मानता कि ये कोई पुख्ता हल है बलात्कार के दोषियों के लिए। क्योंकि मेरी राय में 90 फीसदी पुरुषों के भीतर एक बलात्कारी रहता है। कुछ दिन पहले की ही बात है जब एनडीटीवी की वेबसाइट पर केरल के टेलीग्राम ऐप के एक पोर्न ग्रुप का पर्दाफाश हुआ था और उस ग्रुप का एडमिन पकड़ा गया था। संस्कृति पर सवाल उठाते हुए मैंने अपने फेसबुक पेज पर ये खबर डाली थी।

मेरे एक संस्कृति भक्त कुलीग को ये बात बहुत अखरी उनका कहना था आप संस्कृति का मतलब जानती भी हैं। वो जो एडमिन है वो आईएसआईएस का एजेंट है।तो मैंने कहा जनाब चलिए एडमिन का तो मान लिया लेकिन 5000 सदस्यों के उस ग्रुप के सदस्य कौन लोग थे क्या वो हमारे आप जैसे लोग नहीं थे जो उस पोर्न ग्रुप में चार-छह महीने की बच्चियों के साथ सेक्स के वीडियो बनाकर डाल रहे थे। बच्चियों के साथ सेक्स कैसे किया जाए। इस पर चर्चा कर रहे थे। मेरे इस जवाब पर वो निरुत्तर होकर चले गए।

ये तो तब की बात है आज ही कठुआ रेप केस की उस बच्ची का नाम पोर्न वेबसाइट की सर्च में टॉप पर है। तो वो कौन लोग हैं जो उस बच्ची का वीडियो वेबसाइट पर ढूंढ रहे हैं उसे अपने मजे लेने का साधन समझ रहे हैं। दरअसल इस बात को रखकर मैं यही कहना चाह रही हूं कि क्या बलात्कार पर फांसी की सजा वाकई इस मामले में समाज के लिए कुछ नया गढ़ सकती है...एक मंत्रिमंडल जिसके आधे से ज्यादा लोग स्त्री विरोधी मानसिकता रखते हैं वो आनन फानन में बलात्कार पर फांसी का प्रस्ताव पास कर देते हैं क्या वाकई बलात्कार की समस्या का ये कोई पुख्ता हल है। फांसी तो हमारे यहां हत्याओं पर भी होती है लेकिन क्या होता है। कई आरोपी आज भी छुट्टे घूम रहे हैं। यही नहीं एक से बढ़कर एक दागी मंत्री पद का सुख तक भोग चुके हैं और भोग रहे हैं।

अब 29 दिसंबर 2012 की वो काली रात  को ही याद कीजिए कौन भूल सकता है जब निर्भया का बलात्कार हुआ। फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट बना। जहां सुनवाई के बाद उसी साल 10 सितंबर को निर्भया के दोषियों को फाँसी की सज़ा सुना दी गई। लेकिन फांसी हुई नहीं बल्कि मामला हाईकोर्ट में गया। हाईकोर्ट ने भी दोषियों की फांसी की सज़ा को बरक़रार रखा। लेकिन फांसी फिर भी नहीं हुई । क्योंकि मामला सुप्रीमकोर्ट में गया। तीन साल बाद सुप्रीमकोर्ट ने भी निर्भया के बलात्कारियों की फाँसी की सज़ा बरकरार रखी। लेकिन फांसी अभी भी नहीं हुई।

उस समय की यूपीए सरकार ने एक हजार करोड़ रुपयों का निर्भया फंड शुरू किया लेकिन सच क्या है क्या आज तक निर्भया फंड में दो हजार करोड़ रूपये की वृद्धि होने के बावजूद जमीनी स्तर पर महिलाओं की सुरक्षा पर कोई ठोस नीति बन पाई है। 2014 के आँकड़ों ने बताया कि देश में 52 फीसदी लड़कियाँ छेड़खानी का शिकार होती हैं और 32 फीसदी लड़कियों का पीछा किया जाता है।

भारत में 16,863 नाबालिग बालिकाओं के साथ बलात्कार के मामले दर्ज किए गए हैं। 2016 में बलात्कार के कुल 39,068 हुए। जिसमें 18 साल से कम उम्र की लड़कियों की संख्या 16,863 थी। जबकि 6 साल से कम उम्र की लड़कियों के साथ बलात्कार के 520 मामले हुए। 6 से 12 साल के बीच की 1596 मासूम बच्चियाँ रेप का शिकार हुईं। 12 से 16 साल की उम्र में यह आंकड़ा 6091 तक पहुँच गया। वहीं16 से 18 साल की लड़कियों से जुड़ी 8656 घटनाएं सामने आईं। यानी डर का तो कोई सवाल ही नहीं उठता।

तो ऐसे में रेप पर फांसी की सजा का अध्यादेश पारित हो जाने से कौन सा ऐसा चमत्कार हो जाएगा कि अचानक बलात्कारी कम हो जाएंगे और दूसरा कौन आज जिम्मेदारी लेकर कहेगा कि रेपिस्ट को फांसी हो ही जाएगी। क्या आज किसी राजनैतिक दल में ये इच्छा शक्ति या साहस है कि वो समाज में ख़ास तौर पर अशिक्षित इलाक़ों को चुन कर घर-घर जाकर जेंडर सेंसिटिविटी पैदा करे, लोगों को घरों में बेटा बेटी को बराबरी से पालने के गुर बताए। 

सबसे बड़ा सच यही है कि रेप एक सामाजिक समस्या है। इस समस्या का समाधान बराबरी की उस अवधारणा से ही जुड़ा है जहां स्त्री पुरुष में कोई अंतर ना समझा जाए। आज से अभी से परिवारों को इस दिशा में बेटा-बेटी के लालन पोषण से ही यह सुनिश्चित करना ही होगा। वरना ये समाज ऐसी विकृत अवस्था में पहुंच जाएगा जहां से उसे वापस लाना एक और कठिन समस्या बन जाएगा। वास्तव में बलात्कारी का सामाजिक बहिष्कार जरुरी है। जैसे अगर रेपिस्ट किसी का बेटा है पति है रिश्तेदार है सहकर्मी है तो परिवार उसे नकारे। समाज उसे नकारे।

उसका ऑफिस उसे नकारे। उसे कहीं नौकरी ना दी जाए। वो ब्लैकलिस्ट कर दिया जाए। बहिष्कार के माध्यम से उसे वो सजा दी जा सकती है जिससे वो अपमानित महसूस करे और उसे आभास हो कि उसने एक बड़ी गलती की है। दिक्कत यही है कि बलात्कार करने वाला जो कर रहा है उसे सही मानता है बपौती मानता है उसका पॉवर मानता है तो काटना उसकी इस भावना को है जो महज फांसी की सजा का डर नहीं कर सकता स्त्री पुरुष की बराबरी का समाज जब तक नहीं बनेगा बलात्कार और बलात्कारियों से छुटकारा आसान नहीं।

(ऋचा साकल्ले पेशे से पत्रकार हैं और आजकल एक प्रतिष्ठित न्यूज़ चैनल में काम कर रही हैं।)

 








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ashok upadhyay :: - 04-24-2018
टाइपिंग की गलती ....पार्टियाँ भी बलत्कार के आरोपी को पार्टी से बाहर नहीं निकाल रही हैं

ashok upadhyay :: - 04-24-2018
क्या बात करती हैं . बलत्कार के आरोपी विधान सभाओं और संसद में बैठे हैं . पार्टियाँ उन्हें बाहर निकाल रही हैं . लोग भी उनका बहिस्कार नहीं कर रहे हैं . उन्होंने तो उन्हें चुन कर भेजा है

Parveen :: - 04-24-2018
Nice. 9812234750

Parveen :: - 04-24-2018
Nice. 9812234750

Parveen :: - 04-24-2018
Nice. 9812234750

????? ???? :: - 04-22-2018
ऋचा ने सही लिखा है। हम समाज में एक रेपिस्ट बनने की दृश्य-अदृश्य ट्रेनिंग के साथ ही बड़े होते हैं।