‘‘नहीं मतलब नहीं” की अहमियत जानता था रावण!

आड़ा-तिरछा , , रविवार , 29-04-2018


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वीना

प्रधानमंत्री का कहना है - ‘‘राक्षसी स्वभाव वालों को फांसी की सज़ा दी जानी चाहिए।’’ अब समस्या ये है प्रधानमंत्री जी कि आपने ये तो बताया ही नहीं कि राक्षस किसे माना जाए? धर्म उपन्यास रामायण में तो रावण को राक्षस बताया गया है। पर रावण ने तो सीता का बस अपहरण किया था! वो भी अपनी बहन की बेइज़्ज़ती का बदला लेने के लिए।

रावण सीता से प्रणय निवेदन करता है। सीता के इंकार करने पर उससे ज़बरदस्ती नहीं करता। बल्कि सीता की हां का इंतज़ार करता है। तो क्या माना जाए कि आज के इस आधुनिक युग में जब ‘‘नो का मतलब नो’’ नहीं समझा जाता, रावण उस युग में भी नहीं का मतलब ‘‘नहीं’’ समझने वाला आर्दश पुरुष था?

और इसीलिए इस युग का नौजवान चंद्रशेखर आज़ाद अपने नाम के साथ रावण जोड़ने में गर्व महसूस करता है। क्योंकि रावण ही उसे सिखा पाता है कि औरत की ना का मतलब ना होता है। उसकी ना का सम्मान किया जाना चाहिये। भले ही वो तुम्हारे दुश्मन के परिवार की हो।

जबकि राम और उनेक भाई लक्ष्मण रावण की बहन सूपनखा की नाक काटने के लिए मशहूर हैं। भारतीय समाज में नाक कट जाने का मतलब इज़्ज़त चले जाना माना जाता है। माने बलात्कार। क्या राम-लक्ष्मण दोनों भाईयों ने मिलकर रावण की सुंदर बहन सूपनखा का बलात्कार किया था? उसे जंगल में अकेली पाकर दबोच लिया था! अगर नहीं, तो फिर नाक इज़्ज़त की पहचान कैसे बन गई?

सरकारी संस्था एनसीआरबी के 2016 के आंकड़े बता रहे हैं कि नाबालिग लड़कियों के साथ बलात्कार करने वालों में 94 प्रतिशत उनके अपने क़रीबी होते हैं। क्या यही  हैं वो राक्षस जिन्हें फांसी देने वाले हैं आप?

आपके राज में राक्षसी स्वभाव क्या है, कैसे तय होगा प्रधानमंत्री जी? क्या आपके ‘‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’’ के ब्रांड एम्बेसेडर ‘‘महानायक’’ अमिताभ बच्चन इस दायरे में आते हैं? जिन्हें बलात्कार के विरोध में बात करने में घिन आती है। जिन्हें लगता है कि ऐसे मुद्दों पर सहम कर चुप होकर घर बैठ जाना चाहिये। अगर वो बोलेंगे तो उनके काले धन की तिजोरी के ताले टूट सकते हैं। क्या ऐसे लोग राक्षस हैं प्रधानमंत्री जी जिन्हें काग़ज़ के टुकड़े चोरी करने के लिए किसी भी स्तर तक गिर कर चापलूसी करने से घिन नहीं आती?

आपकी सेना-पुलिस के जवान, जम्मू कश्मीर, छत्तीसगढ़, झारखंड, महाराष्ट, मध्यप्रदेश, उत्तर-पूर्व के राज्यों में सुरक्षा के नाम पर औरतों से बलात्कार कर रहे हैं। क्या उनको भी फांसी दी जाएगी?

और आपका अपने बारे में क्या कहना है प्रधानमंत्री जी? आपकी छाया तले गुजरात में 2002 में हैवानियत की सारी हदें पार की गईं। जिनके लिए आप तनिक भी शर्मिंदा होने की ज़रूरत महसूस नहीं करते हैं! किसी महिला के निजी जीवन में अपनी सत्ता के डंडे से उसे जबरन खाकरा-पापड़ा खिलाना, उसकी आज़ादी को छीनने वाला आपका दंभ क्या राक्षसी स्वभाव के दायरे में आता है?

आप पर तो वैसे भी कई फांसी ड्यू हैं साहेब। जो आपकी ख़ुद की आयत की हुई हैं। मसलन - ‘‘मैं सही चौकीदार न बन कर दिखा सकूं तो मुझे फांसी दे देना। नोटबंदी से ग़रीबों को ख़ुशहाल अमीरों को बर्बाद न कर दूं तो मुझे फांसी दे देना।’’ आदि-आदि।

आपके राम भक्त सांझी राम का कहना है कि उसने अपने बेटे को बलात्कार की सज़ा से बचाने के लिए आसिफा को मार डाला! क्या लगता है आपको, फांसी के जुमले के बाद जो आसिफ़ाओं-निर्भयाओं को सिर्फ बलात्कार के इरादे से ही उठाएंगे वो अपनी हवस पूरी करने के बाद उनके प्राण बख्श देंगे?

हां, आप बहुत खुश हैं! बग़ैर किसी जवाबदेही के कितनी आसानी से क़ामयाब हो गई औरतों को चारदीवारी में कूचने की आपकी मंशा।

कितनी आसानी से आप उन लोगों को भी अपने जाल में फंसा लेते हैं जो ख़ुद को और औरतों को इंसान समझने की जद्दोजहद कर रहे होते हैं!

आपके जुमलों की तर्ज़ पर वो महिलाओं को सिर्फ एक जिस्म समझने को राज़ी हो जाते हैं। एक ऐसा जिस्म, जिसकी रक्षा फांसी का भय दिखाकर ही की जा सकती है। जो किसी के चोट करने पर अपवित्र हो जाता है।

हां, बलात्कार  महज़ एक  चोट है। जैसे पुरुषों में सिर फुटव्वल के बाद चोट लग जाती है, और मरहम-पट्टी से ठीक हो जाती है। बस ऐसी ही चोट। जिसे देने वाले का औरतों को डटकर मुक़ाबला करना चाहिए। बलात्कारी को छठी-सातवीं के सारे दूध याद दिलाए जाएं। एक योद्धा की तरह। मगर आप चाहते हैं कि स्त्री बलात्कार को सुचिता भंग होना माने। असहाय बनकर रोए-गिड़गिड़ाए,  शर्म से मुंह छुपाए,  डूब कर मर जाए। क्यों?

आखि़र किसका कलंक ढोने के लिए दिल्ली की बलत्कृत लड़की का नाम निर्भया कर दिया जाता है? जबकि बतौर औरत सबको उस लड़की पर गर्व है। और उसके मां-बाप को उस पर ग़ुरूर।

औरतों के सम्मान में फांसी मांगने वाले नहीं समझते कि फांसी के भय से उन्हें आज़ादी नहीं मिल सकती। अलबत्ता जान जाने के ख़तरे ज़रूर बढ़ जाएंगे। वो ज़िन्दगी, जिसे वो जीना चाहती हैं। बलात्कार के बाद भी। उनसे छीन ली जाएगी। क्या हज़ारों-लाखों बच्चियों-औरतों के क़त्ल के बाद एक-दो गुनहगारों को फाँसी मिलने भर से उनको सुकून मिल जाएगा?

क्या निर्भया के बलात्कारियों-क़ातिलों को फांसी की सज़ा के बाद बलात्कारों में बढ़ोतरी नहीं हुई? फिर क्यों मांग रहे हैं हम फांसी ऐसी सरकारों से, जिन्होंने कभी 7 साल की सज़ा को लागू करवाने के लिए भी कोई कोशिश नहीं की?

एनसीआरबी के ही आंकड़ों के मुताबिक 2016 में पॉक्सो एक्ट में 64 हज़ार 134 मामले दर्ज हुए। जिनमें से सिर्फ़ 3 प्रतिशत में ही अपराध  साबित हो पाया। ना अपराध साबित होगा और न फांसी होगी।

फांसी का ये हथियार कभी नहीं चलेगा। क्योंकि जंग लगा है इस पर कुंठित ग़ै़रबराबरी को पालने- पोसने वाली मानसिकता का। जिस पर आप राज करते हैं।

वैसे अपने जुमले में वज़न डालने के लिए आपको फांसी के हक़दारों का दायरा बढ़ा देना चाहिये। सिर्फ़ वही क्यों जो नज़र आते हैं औरतों-बच्चियों के जिस्मों को नोचते हुए। उन सबको भी फांसी के दायरे में लाईये जो उकसाते हैं पुरुष को।  ये समझने के लिए कि उसका लिंग कोई नायाब औज़ार है। जो तहस-नहस कर सकता है स्त्रीलिंग की इज़्ज़त। कर सकता है उसे रुसवा। चस्पा कर सकता है हमेशा के लिए उसकी योनि पर अपने लिंग का ठप्पा।

क्या किसी दंभी का दंभ, उसके लिंग का प्रहार औरत जात का कुछ भी बिगाड़ सकता है? उसे सिर उठाकर चलने से रोक सकता है? नहीं।  और यही सोच है जो औरत के मन पर जमी हीन भावना को खरोच कर हटा देती है। जो आपकी सत्ता को पसंद नहीं।

और इसीलिए, जब आप एहसान करने के अंदाज़ में चिल्ला रहे होते हैं, फांसी दो...फांसी दो... बलात्कार करने वाले को फांसी दो। तो दरअसल आप कह रहे होते हैं - ‘‘मज़ा लो कुचल दो। ये जिस्म अब तनकर खड़े होने का सबक सीख रहे हैं। इससे पहले कि ये अपने सम्मान और अपमान की हमारी गढ़ी हुई परिभाषा बदल डाले कुचल दो...मसल दो।“

वैसे, आपके धर्म ग्रंथों में बलात्कार हमेशा देवताओं-ऋषियों ने किए हैं, राक्षसों ने नहीं। इन विवरणों को जस्टिस दीपक मिश्रा से भी ख़ारिज नहीं करवाया जा सकता। तो साहेब, और कुछ न सही कम से कम अपना जुमला तो दुरुस्त कर लीजिये! क्या पता सही जुमला बोलते-बोलते सचमुच इंसाफ करने की बात मन में आ जाए! वैसे हमें पता है पत्थर के गणेश दूध नहीं पीते। पर बायलॉजी कहती है कि आप पत्थर नहीं हैं। तो क्या पता..?

(वीना व्यंग्यकार, फिल्मकार और पत्रकार हैं।)








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