रेप की हिमायती सरकार का मुखौटा है फांसी की सजा!

बदलाव , , रविवार , 22-04-2018


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शुभा

फांसी की सज़ा किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। यह बलात्कार के सामने समर्पण ही है। बलात्कार की पक्षधर सरकार और विचारधारा फांसी की सज़ा लाकर समस्या को हल न करने की अन्तिम और फाइनल घोषणा कर रही है। राजसत्ता और नागरिकों के बीच संवैधानिक मध्यस्थता को कुचलकर न्याय-व्यवस्था को निष्प्राण करते हुए फांसी की सज़ा का प्रावधान कई तरह की आशंकाओं और डर को जगाने वाला है। निरंकुश हिंसक सत्ता, हत्या को कई तरह से आसान और निरापद बनाने की कोशिश में है। बच्चियों के साथ बलात्कार को कम करने या ख़त्म करने के लिए जो काम करने ज़रूरी हैं उनमें से कुछ इस प्रकार हैं:

राजनीति को अपराधी और अपराध-तन्त्र से अलग करना।

भ्रष्टाचार ख़त्म करना और राजनीति से अपराधिक निजी पूंजी को अलग करना।

जस्टिस वर्मा कमेटी की सिफारिशों को लागू करते हुए पुलिस रिफ़ार्म करना।

लिंग और जाति के आधार पर भेदभाव ख़त्म करने के लिये सकारात्मक भेदभाव के सिद्धांत को अपनाकर इन्सेंटिव देते हुए संसाधनों तक उनकी पहुंच सुनिश्चित करना।

बकरवाल समाज सहित सभी जनजातियों को जल, जंगल, जमीन के अधिकार देना।

2002 में हुए नरसंहार के अपराधियों को सज़ा देना और अल्पसंख्यकों को शिकार बनाने वाले हिन्दू धर्म का बहाना बनाकर आतंक फैलाने वाले संगठनों को प्रतिबंधित करना। धर्म के नाम पर नफरत फैलाने वाले सभी संगठन बलात्कार को "बदला लेने " का औजार बनाते हैं।

ग्रामीण, भूमिहीन दलित स्त्री-पुरुष को संयुक्त पट्टा देकर भूमि -वितरण। भूमिहीन आबादियों पर लगातार बलात्कार होते हैं।

सभी को रोज़गार और कपड़ा, रोटी, मकान व शिक्षा की गारंटी। ये अधिकार न होने कारण ग़रीब आबादियों के बीच से साधन-संपन्न अपराधी अपने रंगरूट भर्ती करते हैं, निराशा भी अपराधों को जन्म देती है। ग़रीब आबादी के बच्चों और औरतों का निरन्तर भीषण शोषण और यौन उत्पीड़न होता है।

श्रम कानूनों के अभाव में श्रमिक स्त्रियों और उनकी बच्चियों को यौन उत्पीड़न का शिकार बनाया जाता है।

स्वतंत्र मीडिया के अभाव में बलात्कारियों और यौन शोषण करने वालों के हौसले बुलन्द रहते हैं।

विधान सभा, संसद और कैबिनेट स्तर तक महिलाओं के प्रति अपराध, बलात्कार और हिंसा के आरोपी मौजूद हैं। बलात्कार के पक्ष में बड़ा उत्साहपूर्ण वातावरण बना हुआ है। अभी बहुत बातें रह गई हैं जो फिर लिखी जाएंगी। मौजूदा सरकार इनमें से कोई क़दम बलात्कार को ख़त्म करने की दिशा में नहीं उठा सकती। वह विपरीत दिशा में यानि बलात्कार के लिए उत्साहवर्धक परिस्थिति तैयार करने में लगी है। इस बात को छुपाने के लिए फांसी का कानून बना रही है। सरकार ख़ुद सभी कानूनों का दुरुपयोग कर रही है इसलिये हमें इस क़ानून से डरना चाहिए। बलात्कार पर अभी बात शुरू हुई है।


(शुभा, वरिष्ठ कवयित्री, सोशल एक्टिविस्ट। स्त्रियों के मसलों पर अथेंटिक स्वर हैं।) 










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