लाल और काली क्रांति का गणतंत्र

आड़ा-तिरछा , , बृहस्पतिवार , 25-01-2018


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वीना

इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू मोदी को क्रांतिकारी नेता कह गए हैं। नेतन्याहू के मुताबिक मोदी भारत में क्रांति लाए हैं और भविष्य का खाका भी तय कर रहे हैं।  

नेतन्याहू को हमारे प्रधान सेवक का इस्राइल दौरा ही क्रांतिकारी मालूम हुआ। क्योंकि हिंदुस्तान से हमारे प्रधान सेवक पहले नेता हैं जिन्होंने इस्राइल यात्रा की। नेतन्याहू को क्या पता कि हमारे प्रधान सेवक तो जनता के धन पर अपनी शाही विदेश यात्राओं का शौक़ पूरा कर रहे हैं। संतोषी भले भात मांगती मर जाए पर प्रधान सेवक को हफ्ते-महीने में विदेशी दौरा चाहिये तो चाहिये। फिर चाहे वो इस्राइल हो या कि पाकिस्तान।   

बहरहाल, मोदी के बीबी (नेतन्याहू का निक नेम) की ये बात तो सच है कि मोदी भारत में क्रांति लाए हैं। यक़ीनन मोदी जी के साथ किसी क्रांति का बुख़ार तो आया है। 

ज़रूरत ये जानने की है कि इस्राइल दौरे के अलावा मोदी जी और कौन सी क्रांति के क्रांतिकारी चालक हैं? हालांकि प्रधान सेवक हर रोज़ अपनी क्रांति के विकास का रिपोर्ट कार्ड देते रहते हैं। मगर ख़ास-ख़़ास मौकों पर कुछ ज़्यादा ही ज़ोर-शोर से इसकी नुमाईश करते हैं। 

जैसाकि नेतन्याहू ने कहा है कि भविष्य की क्रांति का ख़ाका भी तैयार हो रहा है। आपने अब तक इस ओर ध्यान नहीं दिया है तो 2018 के गणतंत्र दिवस पर ग़ौर करियेगा। 2019 की सत्ता प्राप्ति के लिए क्या-क्या क्रांतिकारी कदम उठाए जा सकते हैं इसकी झांकी नज़र आ जाएगी।

अपनी आंखों पर मत जाइएगा। प्रधान सेवक के मन की आंखें जो दृश्य दिखाएं वो देखियेगा। तब आपको उस क्रांति का रंग-ढंग साफ़-साफ़ नज़र आएगा। आप देखेंगे कि हाथ में सोटा लिए ढेरों काली टोपियां प्रधान सेवक  की बगल में खड़ी हैं। डंडा घुमा-घुमाकर आपको 2002 गुजरात के इंसानियत को शर्मिंदा करने वाले कारनामों, मुज्जफरनगर दंगों के आगे का विस्तार, सहारनपुर हिंसा से बदतर, अख़लाक, अफ़राजु़ल से घिनौने कुकर्मों के भविष्य में होने जा रहे नज़ारे दिखाएंगे। गौरी लंकेश, जज लोया आदि के अंत की लिस्ट में और बहुत से नाम जुड़े नज़र आएंगे। 

देश-दुनिया को संबोधित करते हुए क्रांतिकारी प्रधान सेवक गला फाड़-फाड़ चिल्ला रहे होंगे - ‘‘देखिये,  हमने ‘ब्लैक क्रांति’ कर दिखाई। मेरे प्यारे देशवासियों इस महान ‘काली क्रांति’ को नमन करो।

जो क्रांति को लाल कहते हैं बकते हैं। ये जो काली टोपियां आप देख रहे हैं 1925 में इनके पूवर्ज काली टोपियों ने क़सम खाई थी कि हम 100 सालों में भारत को मनुराज देंगे। और आज मैं गर्व से कह सकता हूं कि उनके वारिसों ने ‘‘मनुराज काली टोपी क्रांति ’’का लक्ष्य क़रीब-क़रीब पूरा कर लिया है।

हम मानते हैं कि यहां तक का सफ़र तय करते हुए हमें अपने प्यारे कच्छे की कुर्बानी देनी पड़ी। लेकिन वो कहते हैं ना कि जो भी होता है अच्छे के लिए होता है। कच्छे की कुर्बानी ने हमें पैंट दी। 

हमारी पैंट का खर्चा उठाने वाले अंबानी-अडानी, टाटा-बिड़ला आदि-आदि का मैं दिल से शुक्रगुज़ार हूं। 2019 का चुनाव अगर आप जनता जनार्दन हमें जिता देते हैं तो मेरा वादा है कि अपने धन्नासेठ मालिकों का पैंट का पूरा कर्ज़ सूद समेंत चुकता कर दूंगा। और आपको, कम्पलीट मनुराज का तोहफा दूंगा। 

ये जो आजकल ऊंच-नीच का भेदभाव मिटाकर ईश्वर द्वारा स्थापित वर्णव्यवस्था को ख़त्म करने की साज़िश की जा रही है मैं इसे पूरी तरह नाकाम कर दूंगा। 

जैसे आज लाल किले और विजय पथ पर हमारा कब्ज़ा है। अगले 5 साल भी रहना चाहिये। मनुराज की काली टोपी क्रांति बैंग...बैंग...बोलो बैंग... बैंग...’’  काली टोपियों की देखा-देखी परेड देखने पहुंची लाल और काली क्रांति से अनजान बिना टोपी वाली आम जनता भी जोश में बोली - ‘‘बैंग... बैंग...’’ 

मुसोलिनी की फासिस्ट ब्लैक शर्ट पलटन ने इटली को तबाह-ओ-बर्बाद कर दिया था। ये काली टोपियां उन्हीं कमीज़ों के टुकड़ों से बनाई गई हैं। इसलिए काली टोपी क्रांति के  बैंग...बैंग के इस जुनून से घबराता, हिटलर मुसोलिनी के खूनी नालों से गुज़र चुका भागता-दौड़ता वक़्त एक कोने में कुर्सी पर चिपके लाल झंडा लंबरदारों के पास सांस छोड़कर बोला - ‘‘कुछ करिये...कुछ करिये... वरना मुझे फिर भयंकर विनाश के इतिहास को वर्तमान होते देखने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।’’ 

‘‘ओ शट-अप यू इडियट! हमें अपनी किताब के हिसाब से चलने दो। तुम्हें तो मालूम है पहले क्या फिर बाद में क्या होना है। फिर भी पगलाए जाते हो? रिलैक्स... लाल झंडा जेब में रखे ब्राहमण बुद्धिजीवियों ने वक़्त को धमकाया। 

तुनकते हुए एक कॉमरेड वक़्त पर झपट पड़ा - “अगर जनता को बताना ही होता तो हम बता न देते कि देखो जनता, तुम्हारे पैसे पर जीने-ऐश करने वाले कैसे तुम्हारी बेइज्जती कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने सही किया बताकर कि लोकतंत्र की असली राजा जनता जनार्दन है अब वही सही-ग़लत का फैसला करे।“ 

दूसरा कॉमरेड - ये सब जनता को बताकर हम उसे भड़का सकते हैं। पर हम ऐसा करेंगे नहीं। ये लोकतंत्र तो झूठा लोकतंत्र है। हमारी किताब के मुताबिक पहले इस देश में अब तक सामंतवाद की सुरक्षित खाल में घुसे बैठे पूंजीपति को, असली पूंजीपति बनने देना होगा। ताकि टुटपुंजिया किसान-व्यापारी मर-खप कर ख़त्म हो जाए। जो बचे वो असली मज़दूर बन जाए।

सफ़ेद बालों वाले उम्रदराज़ कॉमरेड ने समझाया - और जब ये पूंजीपति उस शुद्ध मज़दूर की खाल खींचेगा, भूखे-प्यासे को बेड़ियों में जकड़ेगा तो फिर वो मज़दूर जिसके पास खोने के लिए कुछ नहीं होगा और खाने के लिए सारा देश, तो वो इन पूंजीपतियों पर टूट पड़ेगा।

अंबानी-अडानी, रामदेव, टाटा-बिड़ला आदि-आदि के महलों-कारखानों, को नेस्तानाबूत कर देगा। तिजोरियों को लूट लेगा। इनके राजकुमार-राजकुमारियों, महारानियों, पटरानियों समेत इन्हें सूली पर चढ़ा देगा। आग में जला देगा। समंदर में बहा देगा। मोदी-राहुल एंड पार्टी को काल कोठरियों में सड़ा देगा।

तब फिर हम इस लाल क्रांति के अगुआ बन संसद पर कब्ज़ा कर लेंगे। अपना और पूंजीपतियों का ख़ून बहाने वाले मज़दूर हमें अपना नया मालिक बना कर खु़शी से नांचे-गाएंगे। क्योंकि हम उन्हें गाने के लिए बराबरी के गीत देंगे। 

किसी ने सवाल किया - ‘‘फिर आप संसद पहुंचने के लिए चुनाव की गाड़ी में क्यों बैठे? जबकि आपका मक़सद संसद पर लाल क्रांति के द्वारा कब्ज़ा करना है।’’ 

लाल कुर्ता हकलाया - ‘‘वो तो...वो तो... हम...हम ऐसे ही मस्ती करने, इन पूंजीवाद की पिट्ठू पार्टियों को चिढ़ाने के लिए आए हैं। जनता हमें वोट देने की सोचे भी ऐसा हम कोई काम नहीं करते। आप देख ही रहे हैं कि दिन-ब-दिन चुनावों के ज़रिये हमारा संसद में पहुंचना कम होता जा रहा है। थोड़े दिन में हम बिल्कुल बाहर होंगे दोनों सदनों से। ऐसी हमारी पूरी कोशिश है। हर राज्य में। 

‘‘या आप ख़ुद इन पूंजीवादी पार्टियों के नक़्शे क़दम पर चले थे? और क्योंकि ये अपने इलाक़े के उस्ताद हैं इन्होंने आपको धूल चटा दी?’’ एक ने चुटकी ली।

‘‘न जाने कौन ऐसी बकवास बातें आपके ज़हन में भरता रहता है।’’ ग़रीब से झोले के दर्शन करवाते हुए एक कॉमरेड ने सफाई दी। ‘‘सिर्फ क्रांति करना हमारा मक़सद है। पूंजीवाद के सताए उन मज़दूरों के साथ जिनके पास खोने के लिए कुछ नहीं होगा और कब्ज़ा करने के लिए पूरी संसद की बिल्ड़िग होगी। उसकी सेंन्ट्रल हॉल की कैंटीन होगी। जो सभी मज़दूरों को मुफ़्त में मुर्ग़-मुसल्लम, शाही पनीर, पिज़्ज़ा-मैगी, जलेबी-बर्फ़ी खिलाएगी। दूध-लस्सी, शरबत और जो चाहे वो पान कराएगी।’’ सिगरेट का कश खींचते हुए झोला बोला।  

पर आपके सामने अभी गणतंत्र दिवस पर काली क्रांति की घोषणा हो चुकी है। कहीं ऐसा न हो कि इस काली क्रांति की आड़ में ये पूंजीपति अपना उल्लू सीधा कर लें। 

पूंजीपति तेजी से मज़दूरों से पीछा छुड़ा कर मशीन-रोबोट से काम करवा रहा है। मज़दूर, गदा-त्रिशूल के आगे बेबस हैं। आपकी औक़ात न रोबोट की नौकरी रोकने की है और न त्रिशूल की धार पकड़ने की। 

आप महानुभाव केकड़े-मेढ़क के वंशज बनकर अपने मोहल्ले की कुर्सी पर से एक-दूसरे को धकियाने में ही मशगूल हैं आजकल। पूंजीपति ने काली क्रांति से आपकी लाल क्रांति का ख़ात्मा करवा दिया तो आप क्या करेंगे?

लाल क्रांति लंबरदार हैरान होते हुए - ‘‘अच्छा! ऐसा भी हो सकता है...!’’ फिर कुछ सोचकर - ‘‘ चलो कोई नहीं, फिर हम रोबोट क्रांति का नारा ले आएंगे।

जाति-धर्म से बाहर निकल कर ये बौड़म हिंदुस्तानी मज़दूर, वर्ग के घेरे में आते ही नहीं। लेनिन-स्टालिन, मार्क्स-माओ छोड़कर अब भीम-भीम गाने-बजाने लगे। 

बताओ भला, कोई कैसे भला करे इनका। हम ब्राह्मण होकर मार्क्स-मार्क्स करे जा रहें है इनके लिए और ये मूरख मज़दूर होकर भीम-भीम चिल्लाए जाते हैं..!

हम कह रहे हैं कि एक बार क्रांति हो जाने दो, हम जात-पात का सब भेद-भाव मिटा देंगे। पर नहीं, पहले भेद-भाव मिटाने के लिए हमारा साथ दो। ज़िद पकड़ कर दौड़े जा रहे हैं। भई दौड़े जाओ। हम तो वहीं बैठे रहेंगे जहा बैठे हैं। 

100 साल होने वाले हैं समझाते-समझाते, कम्बख़्त ये हाड़-मांस के मज़दूर समझते ही नहीं। सबका अलग भगवान, अलग दिमाग़। 

रोबो मज़दूर से डील करना वैरी सिंपल। एक बार में एक ही सॉफ्टवेयर सबमें लोड करके शुद्ध वर्ग शत्रु क्रांतिकारी बना देंगे सबको। काम ख़त्म।

पर रोबोट को तो रोटी-पानी की ज़रूरत नहीं, वो आपका सिपाही क्यों बनने लगा?

लाल झंडा लंबरदार - अरे, हम रोबो के सॉफ्टवेयर में घुसपैठ करके ऐसा सॉफ्टवेयर लोड करवा देंगे कि रोबोट खु़द को मज़दूर समझने लगे, और उसे भूख लगने लगे। 

समय-समय पर रोबो खाना मांगेगा - ‘‘मालिक खाना दो... मालिक खाना दो...जब सौ बार खाना मांगने पर भी मालिक खाना नहीं देगा तो 101वीं बार रोबो मालिक का सिर फोड देंगे। इस तरह पूंजीपतियों का बड़ी आसानी से ख़ात्मा किया जा सकता है। 

क्रांति तो हम करके रहेंगे। इंसानों की नहीं तो रोबोट की ही सही। हां, इस बात का अफसोस रहेगा कि हमारे मज़दूर भाई रोबो क्रांति देखने के लिए दुनिया में नहीं रहेंगे।पर हम उन्हें यक़ीन दिलाएंगे कि उनके कम्युनिस्ट नेता उनका क्रांति का सपना ज़रूर पूरा करेंगे...ज़रूर पूरा करेंगे...और हां, जब रोबो सभी पूंजीपतियों को ख़त्म कर देंगे तो हम उन्हें लाल रंग से पेंट करवा देंगे। और इस तरह ये कहलाएगी ‘‘लाल रोबो क्रांति।’’ यानि ‘‘रेड रोबो रेवेल्यूशन’’ ट्रिपल आर...वाउ..! साउंड इंटरेस्टिंग ना..!

और इस काली क्रांति का क्या, जिसे लेबर पेन होना शुरू हो चुका है?

जैसाकि आपने अभी कहा था ये तो मज़दूर को रोबो मज़दूर बनाने पर उतावले हैं। तो कर लेने दीजिये इन्हें अपना काम। जब तक ये फ़ारिग होते हैं, कम्युनिस्ट बैठ तमाशा देख। मोहल्ले की कुर्सी हथियाने में कर दे दिन-रात एक। जय गणतंत्र... जय गणतंत्र...

(वीना पत्रकार के साथ फिल्मकार भी हैं।)










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:: - 01-26-2018

Arun Pradhan :: - 01-26-2018
अरुण प्रधान #Arun_Pradhan

Arun Pradhan :: - 01-26-2018
मतलब, वीना जी आप भी पूंजीपतियों, समाजवादियों, अम्बेडकरवादियों व अन्य के इस षडयंत्र के साथ हैं और यह सिद्ध करने में लगी हैं कि कम्युनिस्ट पार्टियां सवर्णों की पार्टी है। साथ ही भारत मे राजनीतिक-सामाजिक-आर्थिक बदलावों तथा उत्पीड़ित जनता को राजनीतिक प्रमुखता में लाने आदि में कम्युनिस्ट पार्टियों का कोई योगदान नही रहा है। कभी इतिहास पलट कर भी देख लेंगी तो बेहतर होगा, इनकी और उनकी शहादतों पर नज़र डालने से मतिभ्रम से आप शायद बाहर निकल पाएंगी। अरुण प्रधान

Aryesh :: - 01-25-2018
Good