धर्म और समाज की पितृसत्तात्मकता के पाखंड से आस्था का बवंडर

हमारा समाज , , रविवार , 27-08-2017


religion-society-patriarchy-baba-gurmeet-ram-rahim

उपेंद्र चौधरी

भूखों के सामने रोटी किसी भगवान की तरह प्रकट होती है। यह धारणा स्वामी विवेकानंद की थी। भूख से बिलबिलाये और दाने-दाने के लिए तिलमिलाये हुए लोगों से पूछिये तो वो इस धारणा की पुष्टि करते हैं। लेकिन सच तो यह भी है कि मोक्ष से बिलबिलाये लोग भूख को ही अपना ज़रिया बनाकर संथारा करते हुए मौत को गले भी लगा लेते हैं। उल्लेखनीय है कि संथारा जैन धर्म की वह प्रक्रिया है, जिसमें मोक्ष की चाहत लिये कोई जैन धर्मावलंबी स्वयं को भूखा रखकर मृत्यु के हवाले हो जाता है। जैनों को संथारा करने वाला किसी संत की तरह दिखता है, उसकी वहां पूजा होती है, उसे श्रद्धा के रूप में देखा जाता है।

आस्था के नाम पर

मुहर्रम के मौक़े पर स्वयं को कष्ट देते लोग दिखते हैं। अपने ही बदन पर वो कोड़े चलाते हैं, कोड़े से लहूलुहान होता बदन अपनी व्यथा को मात देते हुए उनकी आस्था के परचम बन जाते हैं। राह चलते आपको ऐसे कई लोग मिल जायेंगे,जिनके माथे के ऊपरी हिस्से का एक छोटा सा भाग काला-स्याह पड़ा होता है। स्याह कपार लिये ऐसे लोगों को लेकर उनके धर्मावलंबियों के यह बीच धारणा है कि वो पक्के और सच्चे नमाज़ी हैं।

बाबा गुरमीत राम रहीम के कार्यक्रम में श्रद्धालु महिलाएं (फाइल फोटो)। साभार : गूगल

महिलाओं के सहारे धर्म की सत्ता

ये सभी क्रूर प्रतीक दरअस्ल ऐसी धार्मिक भावनात्मक आस्था की चारदीवारी में क़ैद हैं, जिसके धार्मिक षड़यंत्र के ताले में तर्क की नहीं अंधविश्वास की चाबी लगती है। इनके बीच अगर धोखे से भी तर्क चला आये, तो उसकी लानत मलानत धार्मिक आख़्यानों से निकले प्रतितर्क से कर दी जाती है। इस प्रतितर्क की वाहक अक्सर महिलायें होती हैं, क्योंकि आज भी समाज की पितृसत्तात्मकता की बड़ी मज़बूती है। यही कारण है कि धर्म में सैद्धांतिक रूप से पर्याप्त गुंज़ाइश होने के बावजूद तलाक़ देने की कुव्वत सिर्फ़ लगभग पुरुषों में है और महिलाओं के हिस्से में उसका दंड झेलना है। ठीक इसी तरह काशी और मथुरा जैसे तीर्थस्थलों में वैधव्य का थोपा गया सामाजिक-धार्मिक दंश झेलती और माथे पर सफेद रंग के त्रिपंड रचाये हर उम्र की महिलायें यूं ही दिख जाती हैं। किसी भी तरह की पारिवारिक या सामाजिक गुंजाईश के अभाव में ये विधावाएं तीर्थस्थानों में आस्था के ज़रिये अपनी पीड़ा मुक्ति की तलाश करती हैं। इन तीर्थ स्थलों पर कभी भी विधुर यानी जिनकी पत्नियां मर चुकी हैं, उन्हें इस हालत में नहीं देखा जा सकता है। इस तरह, पुरुषवादी समाज में धर्म की वाहक आसानी से या तो महिलायें बन जाती हैं या उन्हें बना दिया जाता है। धर्म की आड़ में महिलाओं के शोषण की अनगिनत कहानियां हैं। इसे कभी इंदिरा गोस्वामी अपने उपन्यास के ज़रिये सुनाती हैं,तो कभी इस्मत चुग़ताई बताती हैं, कभी तहमीना दुर्रानी दिखाती हैं, तो कभी तसलीमा सरेआम होने के लिए छटपटाती उन कहानियों पर पड़े सामाजिक-धार्मिक पाखंड के पर्दे को सरका देती हैं।

 

बाबा राम रहीम के समर्थक। (फाइल फोटो) साभार : गूगल

पुरुषवादी धर्म व्यवस्था

ऐसा होते ही धर्म और समाज की पितृसत्तात्मकता के पाखंड से आस्था का बवंडर उठ खड़ा होता है। इस बवंडर में कभी कोई महिला जला दी जाती है,कभी झुलसा दी जाती है,अक्सर चरित्रहीन क़रार दी जाती है। आधी आबादी की सुरक्षा और स्वतंत्रता जितना धार्मिक ग्रन्थों में कभी कभी चाक चौबंद दिखती-दिखायी जाती है, उतना ही यह वास्तविकत धरातल पर अपने अस्तित्व की भीख मांगती हुई-सी दिखती हैं। क़ुरान कहता है कि एक पुरुष के बराबर दो महिलाओं की गवाही होती है। मनुस्मृति कहता है कि विशेष मौक़ों पर ही महिलाओं के सजने-संवरने का अधिकार है, उन्हें पहले अपने पिता की निगरानी में फिर पति की और आख़िरकार बेटे की निगरानी में ही जीवन गुज़ार लेना चाहिए। असल में दुनिया के तमाम धर्मों’ का चरित्र  ही पुरुषवादी है। इन्हें पुरुषों ने ही बनाया है, पुरुषों ने ही आकार दिया है और पुरुषों ने ही सिद्धांततकसा भी है। ऐसे में धर्म में पुरुषवादी सत्ता की सुरक्षा का स्वतआ जाना स्वाभाविक है। यही वह कारण है, इसकी निरंतरता आज भी आश्रमों और तीर्थस्थलों पर भी देखने को मिल जाती है। पुरुषवादी सोच और सत्ता की निरंतरता सभी धर्मों में है। महिलायें कहीं किसी मंदिर में रजस्वला सहित प्रवेश नहीं कर सकतीं,तो कहीं  किसी मज़ार पर मासिक धर्म के दौरान जाने की उन्हें  पूरी मनाही है। मंदिर की पुजारिन तो कहीं-कहीं देखने को मिल जाती हैं, लेकिन मस्जिद का मुअज़्जिन और इमाम कभी स्त्रियां होतीं ही नहीं। सड़कों के किनारे गाहे-बगाहे नमाज़ पढ़ते पुरुष दिख जाते हैं,लेकिन आज तक किसी स्त्री को किसी कोने में ही सही नमाज़ पढ़ते नहीं देखा जा सका है। बड़े-बड़े मठों और मंदिरों के पुरुष महंत ही होते हैं, आजतक किसी महिला महंत को किसी मठों-मंदिरों की गद्दियों पर विराजते नहीं देखा गया है। धार्मिक प्रतीकों को ओढ़ने-बिछाने का हक़ भी सिर्फ़ पुरुषों के पाले में है, कर्तव्य महिलाओं के हवाले है। चुटिया छोड़ते हुए मुंडन कराकर लाल त्रिपुण्ड लगाते हुए महिलाओं को कभी नहीं देखा गया,दिगंबर साधुओं की तरह निर्वस्त्र होकर किसी महिला दिगंबर को नहीं देखा गया और न ही सुन्नत माने जाने वाली गोली टोपी और टखने तक पैजामा पहने हुए कोई महिला नज़र आयी। धर्म और आस्था की मांग ही यही है कि उसका नेतृत्व पुरुष करेंगे, और उसका वाहक महिलायें होंगी। इन सवालों के बीच लिंगगत आधार पर जिन मनुष्यों को हम महिला की श्रेणी में रखते हैं,उनके ऊपर दायित्व लाद दिया जाता है और हक-ओ-हुक़ूक़ छीन लिये जाते हैं। शायद इसीलिए आधुनिक दुनिया की महान नारीवादी और सेकेण्ड सेक्स की लेखिका सीमॉन महिलाओं को लेकर अपने ऐतिहासिक अध्ययन में तर्कों के साथ पुरज़ोर तरीक़े से कहती हैं; “औरतें पैदा नहीं होतीं, बनायी जाती हैं। लेकिन शायद राम-रहीम को ये पता नहीं रहा होगा कि मनुष्य की श्रेणी से उतार दी गयीं वह औरत जिस दिन पुरुषों की बनायी गयी उस चौखट को सीमॉन की ऐतिहासिक समझ के हथौड़े से चोट मारती है, तो डेरा सच्चा सौदा का चालाकी से बना बनाया ऐश्वर्य वाला आस्था का महल भरभराकर गिर जाता है। “उत्तिष्ठ, जाग्रत, पाप्यवारान्नीबोधयत (उठो,जागो और लक्ष्य को पाने तक कभी मत रुको)। मुश्किल से हासिल होने वाले लक्ष्य को पाने के लिए पीड़ितों, वंचितों से यह आह्वान विवेकानंद ने ही किया था। इस आह्वान की दिशा कट्टरता, अंधविश्वास और धार्मिक उन्माद झेलती महिलाओं के लिए ज़्यादा मुफ़ीद दिखती है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)










Leave your comment