बचेंगी नदियां तो ही बचेंगे हम

स्वच्छता अभियान का सच , , शनिवार , 24-03-2018


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प्रवीण मल्होत्रा

आज से साठ साल पहले जब देश की आबादी सिर्फ 40 करोड़ थी और देश के अधिकांश राजनीतिक दलों तथा नेताओं में प्रदूषण और पर्यावरण के संकट के प्रति कोई जागरूकता भी नहीं थी तब डॉ. राममनोहर लोहिया ने नदियों में बढ़ते प्रदूषण पर चिंता व्यक्त करते हुए नदियों की सफाई का आह्वान किया था। फरवरी 1958 में दिये गये भाषण में डॉ. लोहिया ने कहा था-

"आज हिंदुस्तान में 40 करोड़ लोग रहते हैं। एक-दो करोड़ के बीच रोजाना किसी न किसी नदी में नहाते हैं और 50-60 लाख पानी पीते हैं। उनके मन और क्रीड़ाएं इन नदियों से बंधे हैं। नदियां हैं कैसी? शहरों का गंदा पानी इनमें मिलाया जाता है। बनारस के पहले जो शहर हैं, इलाहाबाद, मिर्जापुर, कानपुर, इनका मैला कितना मिलाया जाता है इन नदियों में। कारखानों का गंदा पानी नदियों में गिराया जाता है-कानपुर के चमड़े आदि का गंदा पानी। यह दोनों गंदगियां मिल कर क्या हालत बनाती हैं? करोड़ों लोग फिर भी नहाते हैं और पानी पीते हैं। इस समस्या पर मैं, साल से ऊपर हो गया, कानपुर में बोला था।"

इन साठ सालों में गंगा और यमुना में कितना पानी बह गया! देश की आबादी 40 करोड़ से बढ़कर 130 करोड़ हो गयी। एक गरीब और भूखा देश पिछड़ी हुई अर्थव्यवस्था से एक विकासशील अर्थव्यवस्था बन गया। उद्योगों का बहुमुखी विस्तार हुआ। प. नेहरू ने विशालकाय सार्वजनिक उद्योगों को आधुनिक भारत के तीर्थ की संज्ञा दी। इंदिरा जी के कार्यकाल में हरित क्रांति ने देश को अन्न के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बना दिया।

दुग्ध क्रांति ने दूध और उसके बाय प्रोडक्ट्स के उत्पादन में भी भारत को न सिर्फ आत्म निर्भर बनाया, बल्कि निर्यातक भी बना दिया। लेकिन इतनी प्रगति होने के बावजूद भारत स्वच्छ पीने के जल के क्षेत्र में पिछड़ गया, क्योंकि नदियों की सफाई के मामले मंह भारत की सरकारों ने और जनता ने भी इतनी गम्भीरता नहीं दिखाई, जितनी कि दरकार थी!

राजीव गांधी के कार्यकाल में पहली बार गंगा और यमुना की सफाई के लिये करोड़ों रुपये का बजट स्वीकृत हुआ किन्तु वह बजट कहां लोप हो गया किसी को नहीं मालूम। 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद गंगा की सफाई के लिये एक अलग मंत्रालय- नदी विकास और गंगा संरक्षण - की स्थापना की गई। मंत्रालय का प्रभार सुश्री उमा भारती को सौंपा गया। उन्होंने बातें बहुत बड़ी-बड़ी कीं, किन्तु गंगा साफ होने के बजाय और अधिक मैली हो गयी। अपेक्षा के अनुरूप कार्य नहीं करने के कारण प्रधानमंत्री ने उमा भारती से उक्त मंत्रालय वापस लेकर नितिन गडकरी को सौंप दिया। सवाल सिर्फ गंगा और यमुना का ही नहीं है, नर्मदा, गोदावरी, कावेरी आदि सभी नदियों के संरक्षण का है।

आज जिस तरह नदियों से रेत का असीमित उत्खनन कर नदियों को खोखला किया जा रहा है, कि उनके समक्ष अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है। अनियंत्रित विकास और निर्माण कार्यों से हमारी मूल संस्कृति और सभ्यता के समक्ष भी संकट खड़ा हो गया है, क्योंकि हमारे देश की सभ्यता और संस्कृति के विकास में नदियों का बहुत बड़ा योगदान रहा है, बल्कि यह कहना चाहिये कि सभ्यता विकसित ही नदियों के किनारे हुई है।

नदियों के किनारे ही अनेक मानव सभ्यताओं का जन्म और विकास हुआ है। नदियां ही विश्व की कई संस्कृतियों की जननी रही हैं। हमारे पूर्वज नदियों के महत्व को समझते थे। इसीलिये हमारे धार्मिक ग्रन्थों और महाकाव्यों में नदियों के महत्व और महिमा के वर्णन मिलते हैं। गंगा को धरती पर लाने का तो पूरा आख्यान ही रचा गया है कि किस तरह भगीरथ ने अपनी साधना या इंजीनियरिंग कौशल से गंगा को हिमालय से तराई के क्षेत्र में प्रवाहित किया। हरिद्वार, प्रयाग (इलाहाबाद), उज्जैन और नासिक में हर तीन वर्ष के अन्तराल में क्रमशः गंगा, गंगा-यमुना के संगम, शिप्रा और गोदावरी के किनारे आयोजित होने वाले कुम्भ या सिहंस्थ भी नदी की महत्ता को ही प्रतिपादित करते हैं।

आज आवश्यकता इस बात की है कि आमजन नदियों के संरक्षण के प्रति जागरूकता प्रदर्शित करे। सोशल मीडिया भी इस अभियान का एक जोरदार माध्यम बन सकता है। सोशल मीडिया की भूमिका को आज कोई भी सरकार नकार नहीं सकती है। यह जन आंदोलनों का एक सशक्त माध्यम बन कर उभरा है। आज न सिर्फ राजनीतिक दल, शीर्ष नेता बल्कि सक्रिय अन्य सामाजिक-वैचारिक संगठन भी सोशल मीडिया का जमकर इस्तेमाल कर रहे हैं। हमें यदि अपनी नदियों को प्रदूषण और अतिक्रमण से बचाना है तो सोशल मीडिया का प्रभावी इस्तेमाल करना होगा।

अभी हाल ही में मध्यप्रदेश  सरकार ने इंदौर में एक तालाब की जमीन को जिला न्यायालय का भवन बनाने के लिये आवंटित कर दिया था। सरकार के इस निर्णय के विरुद्ध सोशल मीडिया पर एक जागरूकता मुहिम चलाई गई, जिसके परिणामस्वरूप एक स्वतः स्फूर्त गैर राजनीतिक जन आंदोलन उभर गया। अंततः जनता के दबाव में सरकार को अपना निर्णय वापस लेना पड़ा और इस तरह एक जीवंत तालाब के अस्तित्व पर आया संकट टल गया।

नदियों के प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण औद्योगिक अपशिष्टों का नदियों में मिलाया जाना है। गंगा सहित सभी प्रमुख नदियों के प्रदूषित होने का सबसे बड़ा कारण सीवेज है। औद्योगिक अपशिष्टों के अलावा बड़े पैमाने पर शहरों से निकलने वाला मल नदियों में मिलाया जा रहा है जबकि उसके शोधन के पर्याप्त इंतजाम ही नहीं हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के एक अध्ययन के अनुसार देशभर के 900 से अधिक शहरों और कस्बों का 70 फीसदी गन्दा पानी पेयजल की प्रमुख स्रोत नदियों में बिना शोधित किये ही छोड़ दिया जाता है।

इसी प्रकार औद्योगिक अपशिष्ट भी बड़ी मात्रा में नदियों को प्रदूषित कर रहे हैं, जिसके कारण कई बारह महीने बहने वाली नदियां भी गन्दे नालों में तब्दील हो गयी हैं। देश की 70 फीसदी नदियां प्रदूषित हैं और मरने की कगार पर हैं। मध्यप्रदेश की जीवन रेखा नर्मदा नदी भी कई स्थानों पर लगभग सूख गई है और लोग पैदल चल कर उसमें से आवाजाही कर रहे हैं।

इसलिये आज से साठ साल पहले दी गयी डॉ. लोहिया की चेतावनी से सबक लेते हुए नदियों को बचाने के लिये संकल्प लेकर अभियान चलाना होगा। नदियों को बचाने की एक सुविचारित रणनीति बनाने की आवश्यकता है। नदियों में मल-मूत्र (सीवेज) और औद्योगिक अपशिष्ट मिलाने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के साथ ही  नदियों के संरक्षण के लिये जनभागीदारी भी सुनिश्चित करनी होगी। समाज को उसकी जिम्मेदारी का आभास कराए बिना नदियों का संरक्षण और शुद्धीकरण सम्भव नहीं है।

चीन के राष्ट्रपति का साबरमती के किनारे भव्य स्वागत कर लेने से या जापान के प्रधानमंत्री को गंगा आरती में शामिल कर लेने से या फ्रांस के राष्ट्रपति को दशाशमेश घाट से अस्सी घाट तक नाव में सैर कराने भर से गंगा तथा अन्य नदियों के अस्तित्व पर आया संकट टल नहीं जाएगा। श्री श्री रविशंकर के यमुना किनारे आयोजन ने यमुना को कितनी क्षति पहुँचाई है, उसकी तो कहानी ही अलग है। हम भारतवासी एक ओर नदियों की पूजा करते हैं, उन्हें देवी और माँ का दर्जा देते हैं, हमारे अधिकांश तीर्थ स्थल नदियों के किनारे ही स्थित हैं, लेकिन कर्म और व्यवहार के धरातल पर हम लोग अपनी नदियों के प्रति उतने ही असंवेदनशील भी हैं। इसलिये भ्रष्टाचार मुक्त सरकारी संकल्प के साथ जब तक आम जनता में नदियों के प्रति जागरूकता और संवेदनशीलता विकसित नहीं होगी तब तक नदियां भी प्रदूषण से मुक्त नहीं हो पायेंगी और हमारी सभ्यता और संस्कृति भी सुरक्षित नहीं रहेगी।

(लेखक अध्ययनशील राजनीतिक विश्लेषक हैं।) 

 










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