मैं संघी बनते-बनते रह गया !

स्मृति , , रविवार , 06-05-2018


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अंबरीश कुमार

लखनऊ। यह एक रोचक किस्सा है। कैसे बच्चों का दिमाग प्रदूषित किया जाता है और क्या से क्या बन जाते हैं। बहुत छोटा था। साठ का दशक। पापा सीडीआरआई में इंजीनियर थे। मुंबई से भाभा एटामिक एनर्जी जैसे संस्थान की नौकरी दादी के निधन में न पहुंच पाने के ताने की वजह से छोड़ कर आये थे। लखनऊ के टैगोर मार्ग पर आर्ट्स कालेज से लगी कालोनी में पहला नंबर का घर अपना था। आर्ट्स कालेज के आगे नदवा कालेज था और तब आर्किटेक्ट विभाग होता था। आर्ट्स कालेज का मंकी ब्रिज घुमावदार था और अमलतास के पेड़ों से घिरा था। घर में आगे लान पीछे किचन गार्डन और बगीचा जिसमें मुझे अक्सर जोत दिया जाता था । जो मेरे पुराने साथी हैं सब उस घर में आये हैं। सामने गोमती और तब मंकी ब्रिज हुआ करता था जिसके नीचे चौदहवीं का चांद जैसी फिल्म की शूटिंग हो चुकी थी।

अपने घर में महात्मा गांधी की आदमकद फोटो थी शीशे में मढ़ी हुई। इसलिए उसे सीमेंट की खुली आलमारी के सबसे ऊपर के हिस्से में रखा जाता था। वह बड़ी फोटो पापा रेलवे की नौकरी के समय से संभाल कर रखते थे। वैज्ञानिक, रिसर्च असिस्टेंट, क्लर्क से लेकर असिस्टेंट डायरेक्टर तक उस कालोनी में रहते थे। उनमे एक अंकल से करीबी रिश्ता था। अमूमन शाम को आ जाते। अपना परिवार अन्य मध्य वर्ग परिवारों की तरह कांग्रेसी था तब। पर एक अंकल जब भी आते वे गांधी की फोटो देख चिढ़ते और बोलते इसने तो देश बांट दिया ठीक किया गोडसे ने जो मार दिया।

बच्चे थे पर बात तो सुनते ही रहते थे। धीरे-धीरे दिमाग बन गया और उस फोटो से चिढ़ पैदा हो गई। सामने एक सरदारजी का बेटा बब्बू अपना साथी था ।चिलबिल के बीज निकालने, जंगल जलेबी तोड़ने से लेकर आम तोड़ने तक साथ देता था।

अपने को पापा ने एक खिलौने वाली बंदूक दी थी जिसमे कार्क लगाकर निशाना लगाया जाता था। अपन ने बब्बू से कहा, हम भी गोडसे बनेंगे और इस शीशे की फोटो को तोड़ देंगे। साजिश बनी और खिड़की के पास से निशाना लिया गया। कार्क की जगह कंचे की गोली डाल दी गई। जैसे ही ट्रिगर दबाया फोटो का शीशा तेज आवाज के साथ टूट कर फर्श पर आ गया।

मम्मी भी दौड़ कर आईं और देख कर हैरान। पिटाई ठीक से की। शीशा साफ़ किया गया। शाम को आये पापा,उन्हें बताया गया तो उन्होंने फिर बिना मुरव्वत और ठीक से पीटा। फिर पूछा गया कि यह किया क्यों- 

मैंने बताया अंकल ही तो रोज-रोज कहते थे,गोडसे ने ठीक किया। यह सुनकर उनका पारा और चढ़ गया। एक रूल लेकर फिर पिटाई की, कहा तूं गोडसे बनेगा, मूर्ख, बौड़म, वे तो आरएसएस के हैं अफवाह फैलाकर बेवकूफ बनाते हैं।

समझ नहीं आया तो रात में मम्मी से पूछा कि ये आरएसएस क्या होता है। वे भी बहुत ज्यादा नहीं जानती थीं गोरखपुर के बड़हल गंज के पास के गांव मरवट की थीं मम्मी। स्कूल तक की शिक्षा हुई। आगे पढ़ाने का कोई प्रचलन भी नहीं था। हालांकि मेरी सारी किताबें पढ़ जाती थीं हिंदी वाली। गांव की थीं पर ये जानती थीं कि गांधी को इन लोगों ने मारा था।

बहरहाल अब मैं सतर्क था। मैं तो पीटा ही गया बब्बू के घर वालों ने उसकी भी पिटाई की। उस घटना के बाद उन अंकल ने बहुत कोशिश की आगे कुछ समझाने की पर मैं और बब्बू दोनों तय कर चुके थे इन आरएसएस वालों के चक्कर में फिर नहीं फंसना है। उसके बाद कभी फंसे भी नहीं।

शाखा वाले गुरुजी जब आते तो बब्बू पहले ही बता देता, इनसे दूर रहना है ये फिर फंसा सकते हैं । उस पिटाई ने बचा लिया वर्ना मैं भी कोई बड़ा प्रचारक तो बन ही जाता। बहरहाल इस कहानी का सिर्फ एक किरदार मैं ही बचा हूं। न वे अंकल रहे, न पापा रहे न अपना बचपन का मित्र सरदार रहा। बहुत कम उम्र में ही वह दिल के एक वाल्व में छेद होने की वजह से गुजर गया। पर संघ से आगाह कर गया था। ..(कहां गए वे दिन से )

             (अंबरीश कुमार शुक्रवार के संपादक हैं और बाइस वर्षों तक इंडियन एक्सप्रेस समूह से जुड़े रहे।)








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