पंडों के चंगुल में सबरीमाला के ‘‘वयस्क’’ अयप्पा

आड़ा-तिरछा , , सोमवार , 22-10-2018


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वीना

तर्क की रौशनी में जिन्होंने भगवान और उसके चमत्कारों की सच्चाई जान ली है उन पुरुष-महिलाओं को मंदिर में जाने  न जाने से लेना-देना क्या? 

 पर जो तर्क पर विश्वास की लाठी पटकने में यक़ीन रखते हैं और सोचते हैं कि मोदी, अम्बानी-अडानी टाटा-बिड़ला आदि-आदि की लूट से कोई भगवान बचा लेगा। पेट्रोल के दाम कम करा देगा, गैस सस्ती दिला देगा। ऐसे विश्वासी पुरुष-महिलाओं को पूरा अधिकार होना चाहिए उनके धर्मस्थलों में प्रवेश और पूजा-पाठ का।

कई मंदिरों-मस्जिदों, दर्गाहों आदि में जाने के लिए महिलाओं-दलितों पर पाबन्दी है। ताज़ा उदाहरण अभी केरल के सबरीमाला अयप्पा मंदिर का है। जहां 10 से लेकर 50 वर्ष की महिला के प्रवेश पर निषेध हैं। सुप्रीम कोर्ट के समानता के हक़ के तर्क पर महिलाओं की मंदिर में एंट्री को सही ठहराने वाले आदेश के बावजूद महिलाओं को मंदिर में घुसने नहीं दिया जा रहा है। मंदिर के पंडे मंदिर द्वार बंद करने की धमकी दे रहे हैं। 

मजे़ की बात ये है कि ‘‘औरत ही औरत की दुश्मन है’’ पुरुष प्रायोजित इस वाक्य पर खरी उतरते हुए बहुत सी महिलाएं ही मंदिर में जाने वाली महिलाओं को धक्के मार भगाने पर उतारु हैं। 

भगवान अयप्पा! आखि़र इतना हंगामा क्यों है भाई?

जब मैंने अयप्पा से पूछा तो उन्होंने “Who Knows?” के अंदाज़ में कंधे झटक दिए। फ़िर मैंने इंटरनेट का सहारा लेकर अयप्पा के जन्म पत्री की जांच की। आख़िर कौन हैं ये अयप्पा? पता चला अयप्पा विष्णु और शिव के संसर्ग से पैदा हुई औलाद हैं। 

क्या..? शिव और विष्णु गे...! इन्होंने बच्चा कैसे पैदा किया?

नहीं... नहीं... शांति। कहानी अभी बाक़ी है...

समुद्र मंथन के बाद जब विष्णु राक्षसों से अमृत चुराकर देवताओं को देने के लिए मोहिनी रूप में आए थे तो राक्षसों के साथ-साथ उन्होंने शिव के भी होश उड़ा दिए। शिव दीवानों की तरह मोहिनी का पीछा करते रहे। ग़ौर करने की बात ये है कि शिव को ये पता था कि विष्णु ही मोहिनी है। बावजूद इसके शिव विष्णु के साथ नाचे और इसका इनाम अयप्पा निकले। 

शायद इस रासलीला का सबूत शिव-विष्णु देवलोक ले जाते लजा गए हों। सो बालक के गले में माला पहनाकर उसे पृथ्वी लोक में नदी किनारे छोड़ निकल लिए।

आज का ज़माना होता तो बहुमूल्य माला वाला ये लावारिस बच्चा भीख मंगवाने वाले, चरसी-स्मैकियों के पल्ले भी पड़ सकता था। ख़ैर अयप्पा एक राजा को मिले। 

एक दूसरी कहानी कहती है कि ये बच्चा यूं ही नहीं, किसी मकसद से पैदा किया और फेंका गया है।

जब महाशक्ति ने चंडी रूप धारण कर महिषासुर का वध किया तो महिषासुर की पत्नी महिषी ने अपने पति की हत्या का बदला लेने के लिए ब्रह्मा की घोर तपस्या की। और परिणाम स्वरूप ब्रह्मा ने महिषी को वरदान दिया की उसका वध केवल शिव-विष्णु की औलाद ही कर सकती है।  कहानी आगे कहती है कि ये असंभव वरदान मांग कर महिषी अत्याचारों की नानी हो गई। और बेचारे शिव-विष्णु को इस आतंक का ख़ात्मा करने के लिए एक साथ सोना पड़ा।

एक तो मेरी समझ में ये बात नहीं आती कि ये देवता राक्षओं को वरदान देते क्यों हैं, जब हर बार वो अपनी शक्ति का बेजा इस्तेमाल करते हैं। वो भी देवताओं के ही विरुद्ध। फिर महिषी ने वर मांगा था विष्णु-शिव की संतान के हाथों अपने वध का। उसने ये तो नहीं कहा था कि संतान इंसानों की तरह सेक्स में लीन होकर ही पैदा की जानी चाहिये।

पार्वती अपनी मैल से गणेश उत्पन्न कर सकती हैं। शिव के पसीने की बूंद जहां गिरती है वहां बच्चा उत्पन्न हो जाता है। ऐसे ही शिव-विष्णु अपना-अपना पसीना या मैल मिला कर एक संयुक्त संतान पैदा कर देते। इन टॉप भगवानों को इतनी सी बात समझ नहीं आई जो मोहिनी का रगड़ा पाल लिया। 

राजा राजशेखर ने अयप्पा को पाला, उसे अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहा। पर राजशेखर की पत्नी अपनी कोख जने बेटे को राजा बनाना चाहती थी। इसलिए उसने अपनी बीमारी के बहाने अयप्पा को शेरनी का दूध लाने के के लिए जंगल में मरने भेज दिया।

और तब वो समय आया जिसके लिए दरअसल अयप्पा को जन्म दिया गया था। जंगल पहुंचकर अयप्पा राक्षसी महिषी का वध करता है। और हमेशा की तरह एक बार फिर स्वर्ग के देवता इंद्र के सिंहासन की रक्षा होती है। शेरनी की जगह इंद्र प्रसन्न होकर खुद अयप्पा की सवारी बनकर नगर में धमक पड़ते हैं। इसी क्षण अयप्पा, भगवान अयप्पा हो गए। और पिता राजा राजशेखर द्वारा बनवाए गए मंदिर में स्थापित हुए।

सबरीमाला मंदिर बोर्ड के मुताबिक अयप्पा बालब्रह्मचारी हैं। इसलिए 10 से 50 साल की औरतों को मंदिर में जाने से रोका जाता है। 

क्या किसी ने सुना है कि कोई भी बच्चा पैदा होते ही या होश संभालते ही सेक्स में लीन हो गया हो! नहीं ना। फिर बालब्रह्मचारी का क्या मतलब?

इसे यूं भी समझा जा सकता है - जैसाकि सब जानते हैं कि सनातनी परंपरा में कन्या का विवाह 10-12 साल की आयु में करने की प्रथा रही है। संघ के लीडरान पहले भी और अब भी इसकी वकालत करते रहे हैं। पर यहां वर अक्सर प्रौढ़ होता था जिसे 10-12 साल की बच्ची का बलात्कार करने का हक़ दिया जाता था। 7 साल की बच्ची का 50 साल के बूढ़े से ब्याह करना भी हिंदू हृदय-सम्राटों को न्यायसंगत लगता रहा है।

महिलाओं को अपनी सेक्स इच्छाएं दिखाने-बताने की मनाही है। ऐसा करने वाली छिनाल की श्रेणी में आती हैं। उन्हें केवल सेक्स के लिए इस्तेमाल होना है। और इस्तेमाल होने के लिए किसी शिक्षा-परिपक्वता की आवश्यकता नहीं समझी जाती। मतलब जब कोई पुरुष सेक्स करना जान जाता है तो उसी उम्र से वो तय करने के क़ाबिल बन सकता है कि वो ब्रह्मचारी बनेगा या नहीं।

तो क्या रजस्वला महिलाओं को अयप्पा मंदिर में प्रवेश न करने देना भी इतना ही बचकाना तर्क है, जितना अयप्पा को बालब्रहमचारी कहना-मानना? 

वकील सुविदत्त सुंदरम कहते हैं कि - ‘‘भगवान अयप्पा हनुमान की तरह ब्रहमचारी नहीं है। वो अलग तरह के ब्रहमचारी हैं। सुंदरम के मुताबिक अयप्पा ने ख़ुद कहा है कि 10 से 50 साल की फरटाइल एज की महिलाएं मेरे यहां न आएं। मैं ब्रहमचारी हूं।’’  सुंदरम साहब आगे ज्ञान वर्धन करते हुए कहते हैं कि - ‘‘ सबरीमाला का जो स्थापित भगवान अयप्पा है वो ब्रहमचारी है। बाक़ी दुनिया में और अयप्पा के मंदिर हैं। वहां सब उम्र की महिलाएं जाती हैं। केरल में कई मंदिरों में बाला (बच्चा) अयप्पा मंदिर हैं। वहां सब महिलाएं जाती हैं।

सबरीमाला ‘‘वयस्क’’ अयप्पा के मंदिर में रजस्वला स्त्री के दाखि़ल होने से क्या हो जाएगा? 

क्या सबरीमाला मंदिर बोर्ड के पुजारी-अधिकारी और अयप्पा के भक्तगण समझते हैं कि अयप्पा चरित्र से कमज़ोर हैं? वो हर स्त्री को चाहे वो 10 साल की ही क्यों न हो मोहिनी समझकर उसके पीछे पड़ जाएंगे। यहां तक कि उससे शारीरीक संबंध भी बना लेंगे। 

अगर इन सब सवालों का जवाब हां है तो बोर्ड को कहना चाहिये कि 10 से 50 साल रजस्वला स्त्री क्या किसी भी स्त्री को अयप्पा मंदिर में नहीं जाना चाहिये। क्योंकि इनकार की सूरत में उसका बलात्कार हो सकता है। अब तो ज़माना वो है कि भगवान पर भी धारा 376 लग सकती है।

मुझे लगता है कि यहां शारीरिक कारणों के साथ-साथ अयप्पा के ब्रहमचर्य के मनोवैज्ञानिक कारणों की भी पड़ताल होनी चाहिये।

मुमकिन है, अयप्पा नाम के इस व्यक्ति को जब पता चला होगा कि उसके माता-पिता जन्म के तुरंत बाद उसे फेंक कर चले गए तो उसके मन-मतिष्क को गहरा धक्का लगा हो। स्त्री, जिसकी नज़दीकी शिव की तरह उनको भटका सकती है। इसलिए उन्होंने ब्रहमचारी रहने का प्रण लिया हो। ना वो स्त्री के पास जाएंगे ना कोई बच्चा होगा और ना उसकी अयप्पा जैसी हालत होगी। जिसे दूसरों के रहमों-करम पर पलना पड़े।

पर मंदिर के कर्ता-धर्ताओं ने अयप्पा के ब्रहमचर्य को हनुमान के ब्रहमचर्य से अगल किस आधार पर कर दिया\ क्या पता जैसे हनुमान को सीता मां का स्नेह प्राप्त हुआ माता के स्नेह से महरूम अयप्पा भी मंदिर में आने वाली महिलाओं से मां-बहन का स्नेह पाने की इच्छा रखते हों। कहीं ऐसा तो नहीं कि पुरुष अयप्पा की इच्छा के विरुद्ध महिलाओं पर मंदिर में जाने पर पाबंदी लगा रहे हैं। ताकि अयप्पा भगवान के सारे आशिर्वाद बस उन्हीं को मिले। 

सुना है जो श्रधालु तुलसी रूद्रांक्ष की माला पहनकर, व्रत रखकर और सिर पर नैवेध्य रखकर सबरीमाला मंदिर आता है उसकी सारी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। क्या पुरुष महिलाओं की मनोकामना पूरी होने से डरते हैं। कहीं महिलाएं धर्म क्षेत्र में भी पुरुषों से बराबरी का हक़ न मांग लें?

क्या पुरुषों को ये एहसास नहीं है कि अपने इस कृत्य से वो अयप्पा भगवान की एक ऐसी छवि बना रहे हैं जिसमें वो चरित्र के दुर्बल भगवान बनकर रह जाते हैं?  इसलिए हे! पुरुष श्रद्धालुओं, ज़रा विचार करो, तुम क्या कर रहे हो? कहीं ऐसा न हो अयप्पा एक दिन तुम सबसे गिन-गिन कर बदला लें। 

(वीना पत्रकार-फिल्मकार और व्यंग्यकार हैं।)








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