सबरीमाला प्रकरण: सड़क पर उतरी 50 लाख औरतों ने उड़ा दी है पोंगापंथियों की नींद

हमारा समाज , , शुक्रवार , 04-01-2019


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अशोक कुमार पांडेय

धर्म एक बार फिर ख़तरे में है। बिचारा इतना नाज़ुक है कि कभी दलित के स्पर्श से ख़तरे में पड़ जाता है, कभी बेहिज़ाब औरतों से, कभी रजस्वला स्त्री से तो अक्सर यों ही – आदतन। हाल-फ़िलहाल वह ख़तरे में आया है केरल में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के समर्थन में पचास लाख से अधिक महिलाओं के श्रृंखलाबद्ध प्रदर्शन से। अब विडम्बना तो यह भी है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश की रक्षा के लिए जज़, वकील, सेना, पुलिस वगैरह-वगैरह नहीं औरतें आईं सड़क पर– देश के लोकतंत्र का पक्ष-विपक्ष तो उस फ़ैसले की बर्बर हत्या के लिए कुछ दिनों पहले सड़क पर था। आस्था इन दिनों हर तर्क से बड़ी चीज़ है और वह पवित्र गाय जिसे दुह कर वोटों का व्यापार होता है तो इसके नाम पर अख़लाक़ से न्यायालय के फ़ैसले तक किसी की हत्या जायज़ है। 

सबरीमाला का क़िस्सा मज़ेदार है वैसे। मन्दिर की वेबसाइट पर दी गई जानकारी के अनुसार केरल के पेरियार टाइगर रिज़र्व में स्थित यह मंदिर बारहवीं सदी तक गुमनाम था और इसे पंडालम वंश के राजकुमार मणिकंदन ने ढूंढा था। उसका साथ दिया था वावर नामक एक मुस्लिम ने और वावर मस्जिद आज भी मंदिर के कैम्पस में है। श्रद्धालु मंदिर जाने से पहले मस्जिद में जाते हैं। हिन्दू वावर को वावरस्वामी के नाम से पुकारते हैं। 1821 में यह भूभाग त्रावणकोर राज्य का हिस्सा बना तो  1910 में इसमें उस मूर्ति की स्थापना हुई जिसकी पूजा की जाती है। इस मंदिर के कैम्पस में किसी तरह की सेक्सुअल गतिविधि प्रतिबंधित है और साथ ही रजस्वला औरतों का भी! यह प्रतिबन्ध वैसे तो पहले से था लेकिन 1991 के पहले कभी कभार महिलाएं यहां जाती थीं।

1991 में एक पीआईएल पर फ़ैसला देते हुए केरल हाईकोर्ट के जस्टिस के परिपूर्णन और जस्टिस के बालनारायण मारर की बेंच ने मंदिर में दस वर्ष से लेकर 50 वर्ष तक की महिलाओं के प्रवेश पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगा दिया। इसके ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में केस गया तो पांच सदस्यों वाली बेंच ने 4-1 के बहुमत से इस फ़ैसले को पलट दिया। किसी लोकतंत्र में होना तो यही चाहिए था कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसले का सम्मान किया जाए लेकिन कांग्रेस और बीजेपी दोनों ने इसे ‘आस्था’ का सवाल बताते हुए सड़कों पर विरोध किया जिससे आप सब परिचित हैं।

तर्क यह कि आस्था पर कोर्ट फ़ैसला नहीं कर सकती। पूछा जा सकता है कि अगर प्रतिबन्ध लगाने के लिए कोई कोर्ट में जा सकता है तो प्रतिबंध हटाने के लिए कोर्ट में जाना ग़लत कैसे था या कोर्ट अगर प्रतिबन्ध लगा सकता है तो हटा क्यों नहीं सकता या यह भी क्या कोर्ट को संविधान की जगह आस्था को प्रधान बना देना चाहिए?  वैसे यहां जोड़ दूं कि सबरीमाला खासा कमाऊ मंदिर है। 2014 में जहां इसकी कुल आय 141.67 करोड़ थी, वहीं  2017 में 210 करोड़ और 2018 में इस विवाद के बाद बढ़कर 255 करोड़ हो गई। 

इस गुंडागर्दी के विरोध में नए साल पर पचास लाख से अधिक अनुशासित महिलाएं क़तारबद्ध पितृसत्ता के ख़िलाफ़ उस प्रदेश में उन्हीं सड़कों पर उतरीं जहां माननीय सुप्रीमकोर्ट के आदेश को चुनौती दी गई। हां वे बुर्के में थीं, क्रिश्चियन गाउन में और साड़ियों में मंगलसूत्रों में भी। जींस और मॉडर्न गाउन्स में भी थीं। सलवार सूट में भी। औरत होना जोड़ता है उन्हें, एक क़तार में लाता है जहां घूंघट और मंगलसूत्र वाली औरत बुर्के वाली औरत का दर्द जानती है। जहां जींस वाली औरत सूट वाली औरत से अलग नहीं रह जाती। सब जानती हैं कि दरिंदे का हाथ जब बढ़ता है तो यह फ़र्क़ नहीं करता कि किसने क्या पहना है, कितना पढ़ा लिखा है, कहां रहता है। वह जानती हैं कि पितृसत्ता ने उन्हें बस दोयम दर्ज़े का नागरिक और एक योनि तथा गर्भ समझा है। वे उसके ख़िलाफ़ खड़ी हुईं इसीलिए बेझिझक हाथ थामे एक दूसरे का। और धार्मिक तथा जातीय बंटवारों को परे करके उनका सड़क पर आना जैसे सत्ता को चुनौती बन गया।

ट्रॉल्स की बाढ़ आ गई सोशल मीडिया पर। औरतों के ख़िलाफ़ दिन रात चुटकुले बनाने वाले कहने लगे कि जिन्होंने ख़ुद बुर्का पहना है वे किसी हक के लिए क्या लड़ेंगी! फिर मुस्लिम औरतों को मंदिर के मामले से क्या काम? औरतों का राजनीतिक शोषण किया जा रहा है। कुछ क्रांतिकारी टाइप के लोगों के प्रवचन सुनाई दिए कि धर्म तो स्त्री का शत्रु है फिर मंदिर में जाने की लड़ाई क्यों!  हर व्यक्ति अचानक स्त्री मुद्दों का एक्सपर्ट भी बन गया और वकील भी। चुभा तो पढ़े लिखे और आधुनिक माने जाने वाले शशि थरूर की भी आस्था आहत हुई! 

हिन्दू-मुस्लिम में बांटकर ही जिनकी राजनीति चलती है उनके लिए यह दृश्य असहज था ही। लेकिन मुस्लिम औरतों के लिए यह लड़ाई  उनकी अपनी लड़ाई का हिस्सा है। फर्स्टपोस्ट में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक सबरीमाला पर कोर्ट के तुरन्त बाद मुस्लिम औरतों के संगठन निसा की प्रमुख वी पी ज़ुहरा ने मस्जिदों और दरगाहों में मुस्लिम औरतों के प्रवेश के लिए मुकदमा दाखिल करने की बात कही। फिर ग़ुलामी के चिह्न तो हज़ार हैं। मंगलसूत्र, बिछिया, बुर्का, हिज़ाब सब छोड़ दें तो मज़दूरों को जो फैक्ट्री के छापे वाले ड्रेस देते हैं वे क्या चिह्न नहीं ग़ुलामी के ? अठारहवीं सदी और पहले ग़ुलामों पर जो मुहर लगाई जाती थी वह नहीं थी चिह्न? तो क्या उनसे कहा जाता कि पहले वह चिह्न हटाओ फिर तुम योग्य होगे मुक्ति की लड़ाई के? निजी संघर्ष क्या हमेशा सामूहिक संघर्ष से कमतर हैं? फिर क्यों है ऐसा कि जींस टी शर्ट गाउन पहने आधुनिक स्त्रियों/पुरुषों को हम पितृसत्ता और राजसत्ता की ग़ुलामी करते देखते हैं ? धर्म औरतों के लिए ठीक वही नहीं जो मर्दों के लिए है।

गोर्की की मदर में पावेल का संवाद याद कीजिये जब वह कहता है कि हमारी लड़ाई तुम्हारे गॉड से नहीं उस गॉड से है जिसके नाम पर पोप और ज़ार जनता को लूटते हैं। मार्क्स की बहुप्रसिद्ध  पंक्ति “धर्म जनता की अफ़ीम है” के ठीक पहले की लाइन है, “धर्म पीड़ित मानवता की आह है।” ध्यान दीजिये अफ़ीम कहा है उन्होंने ज़हर नहीं। अफ़ीम जो थोड़ी देर के लिए दुःख दर्द भुला कर सुला देता है। अफ़ीम जिसे थकी हुई मज़दूर माएं अपने बच्चों को चटा देती थीं। ज़ाहिर है पितृसत्ता से संचालित धर्म स्त्री विरोधी है, लेकिन किसी से भी अपना दुःख न कह पाने वाले स्त्री के लिए वह सहारा भी है। जैसे परिवार स्त्री का शत्रु है लेकिन उसे शेल्टर भी वहीं मिलता है। तो जब तक उसका कोई विकल्प नहीं देते आप वह धर्म कैसे छोड़ दे? असल मे सामूहिक संघर्षों से ही निजी मुक्ति की राह भी निकलती है।

इसलिए अगर आई हैं वे अपने उन कथित ग़ुलामी के चिह्नों के साथ सड़क पर तो पहले यह चुनौती है धर्म के उन ठेकेदारों को जो उनका स्थान चूल्हा चौका और बेडरूम तक महदूद करते हैं। मुक्ति का कोई एक प्रतीक नहीं, यह लंबी प्रक्रिया है मुसलसल। और छोड़ेगी तो अपनी मर्ज़ी से छोड़ेगी। प्रतिबंध लगाने वाले आप कौन हैं? कभी अंग्रेज़ों की ऐशगाहों पर लिखा होता था – इंडियंस एंड डॉग्स ऑर नॉट अलाउड। मंदिरों और दरगाहों पर लिखा – औरतों का प्रवेश वर्जित है – उससे कैसे अलग है? अम्बेडकर ने दलितों के मंदिर प्रवेश की लड़ाई उन्हें धार्मिक बनाने के लिए नहीं लड़ी थी। मैं नहीं जाता फाइव स्टार होटल में लेकिन अगर वहां मेरे जैसे बन्दे के जाने पर प्रतिबन्ध लगेगा तो उसका विरोध करूंगा। एक लोकतंत्र में किसी सामूहिक स्पेस को जाति या जेंडर के आधार पर प्रतिबंधित करना कैसे सही हो सकता है?

असल मामला बस इतना है कि सड़क पर उतरी पचास लाख औरतों ने नींद उड़ा दी है पोंगापंथियों की। कहावत है बुढ़िया के मरने का डर नहीं है, यम के रास्ता देख लेने का है।  तो औरतों ने बुर्के, घूंघट और सत्ता के नियम के बंधन ख़तरे में आने ही हैं तो इसी को धर्म का खतरा बताकर सीना पीटा जा रहा है। मैं चाहता हूं वे और ज़रा धीमे से पीटें क्योंकि अब ऐसे मौक़े उन्हें बार-बार मिलने वाले हैं।

(कश्मीरनामा के लेखक और कवि अशोक कुमार पांडेय का ये लेख चोखेर बाली ब्लॉग से साभार लिया गया है।)

 








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