सनातन धर्म विरोधी है आरएसएस का हिंदुत्व

हमारा समाज , , रविवार , 02-12-2018


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अमरेश मिश्र

एक मार्क्सवादी-लेनिनवादी-सनातनी-डेमोक्रेट के तौर पर मेरी लेफ्ट-लिबरलों से गुजारिश है कि वे वाराणसी में आयोजित हुयी धर्म संसद का नज़दीक से अवलोकन करें। इस विशाल आयोजन के सूत्रधार थे द्वारका पीठ और बद्रीनाथ ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद। पुरी और श्रृंगेरी पीठ के शंकराचार्य भी यहां विराजमान थे। यह एक अनूठा आयोजन था। इसमें  हिंदुत्व और सनातन धर्म का भेद साफ़- साफ़ तौर पर परिलक्षित हो गया। सनातन धर्म और हिन्दुत्व को जो झूठी डोर बांधे हुई थी, वो अब टूट गयी है। 

सनातन धर्म और हिंदुत्व

हिंदुत्व और सनातन धर्म के मध्य विवादों/ संघर्ष का इतिहास काफी पुराना है। इसके लिए हमें 1940s से 1950s के कालखंड की तरफ जाना होगा। सनातन धर्म के प्रमुख विचारक-चिंतक और संत करपात्री महाराज ने पचास के दशक में एक पुस्तक लिखी थी: ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिन्दू धर्म'। इसमें उन्होंने गोलवलकर की पुस्तक ‘Bunch of Thoughts’ को अधार्मिक व संशोधनवादी बताते हुए इसकी कटु आलोचना की थी। 

उन्होंने कहा कि ‘अपने धर्म’ को इस्लाम और ईसाई धर्म से अलग दिखाने के चक्कर में गोलवलकर ने हिन्दू धर्म में किसी भी एक परम पवित्र पुस्तक के अस्तित्व को सिरे से नकार दिया। गोलवलकर पर वेदों की  महत्ता को नकारने का आरोप लगाते हुए उन्होंने आरएसएस को एक धर्मद्रोही/अधर्मी संगठन घोषित किया। करपात्री ने  'भगवा ध्वज‘ को सनातन धर्म/हिन्दू धर्म का प्रतिनिधि मानने से भी इनकार कर दिया। स्वामी के अनुसार अलग-अलग युग में अलग-अलग प्रकार के ध्वज अस्तित्व में रहे हैं। महाभारत के युद्ध में अर्जुन का ध्वज रावण के साथ युद्ध में राम के ध्वज से एकदम भिन्न था। 

करपात्री ने गोलवलकर के ‘हिन्दू राष्ट्रीयता' के विचार और भारतीय मुसलमानों को ‘मुस्लिम हिन्दू’ कहे जाने की चालों को भी पूरी तरह नकार दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि हिन्दू धर्म या तो एक धर्म (सनातन धर्म) हो सकता है या फिर एक गैर-धार्मिक राष्ट्रीयता-दोनों एकसाथ कदापि नहीं। 

गोलवलकर द्वारा हिन्दू धर्म को एकसाथ धर्म और राष्ट्रीयता दोनों कहे जाने पर करपात्री ने इस संघ विचारक की कटु शब्दों में आलोचना की।  उन्होंने  कहा कि आरएसएस भारत से इतर राष्ट्रीय  पहचान रखने वालों को सनातन धर्म अपनाने से रोकता है। दूसरी तरफ संघ गैर-हिन्दू भारतीयों को भारतीय होने से रोकता है

राष्ट्रीयता को धर्म से जोड़ने की संघ के कुत्सित प्रयासों पर करपात्री आलोचनात्मक टिप्पणियां आज अत्यधिक प्रासंगिक हो चली हैं।  इस मुद्दे पर करपात्री जमायत-उलेमा-ए-हिन्द के विचारक मौलाना हुसैन अहमद मदनी के साथ खड़े दिखते हैं, जिन्होंने मुस्लिम लीग और देश विभाजन का विरोध करते हुए कहा था कि धर्म और  राष्ट्रीयता दो अलग-अलग बातें हैं। 

राष्ट्र का निर्माण धर्म की नींव पर नहीं किया जाता। इस मुद्दे पर करपात्री और मौलाना मदनी दोनों ही विशुद्ध लोकतान्त्रिक और मार्क्सवादी-लेनिनवादी विचारधारा के नजदीक खड़े दिखाई देते हैं। हिन्दू देवी-देवताओं को ‘महापुरुष' (गोलवलकर)' माना जाए या ‘दिव्य' (करपात्री)-यह करपात्री और गोलवलकर के मध्य विवाद का सबसे बड़ा मुद्दा था। 

स्वामी स्वरूपानंद 

सन 1940 में स्वामी स्वरूपानंद उस समय पोथीराम उपाध्याय, देश के स्वतंत्रता संग्राम में शामिल हो गए। 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान 'क्रांतिकारी' के रूप मे प्रसिध्द  पोथीराम जेल में डाल दिए गए। 1950 में ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती (1941- 53) ने पोथीराम को ‘दंडी स्वामी' होने की दीक्षा दी और स्वामी स्वरूपानंद नाम दिया। 

1953 में स्वामी ब्रह्मानंद के देहावसान के उपरान्त स्वरूपानंद ज्योतिर्मठ के नए शंकराचार्य स्वामी कृष्णबोध आश्रम  ( 1953-73) के शिष्य बन गए। शीघ्र ही स्वामी स्वरूपानंद करपात्री महाराज द्वारा स्थापित अखिल भारतीय रामराज्य परिषद् के अध्यक्ष बने।  

रामराज्य परिषद के अध्यक्ष पद पर रहते हुए ही स्वामी स्वरूपानंद का गोलवलकर से जोरदार विवाद हुआ। राम एक 'महापुरुष' थे-गोलवलकर के इस दावे का खंडन करते हुए स्वामी स्वरूपानंद ने जो कहा वह एक ऐतिहासिक उक्ति बन गई।  

उन्होंने कहा “वह रावण था जिसने राम को अवतारपुरुष  नहीं बल्कि एक मानव कहा था। तो क्या मान लिया जाए कि तुम रावण के साथ खड़े हो, गोलवलकर?’’  स्वामी स्वरूपानंद ने सरल भाषा और तर्कों के माध्यम से धर्म के नज़रिए से फासीवाद के अन्तर्निहित विरोधाभासों को उभारा। 

स्वरूपानंद ने विस्तार से समझाया कि किस प्रकार फासीवादी एक तरफ देवी- देवताओं/भगवान के आलौकिक अस्तित्व को नकारते हैं। और वहीं दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय पूंजीपतियों और साम्राज्यवादियों की गुलामी करते हुए अपनी लोकतंत्र विरोधी, धर्म विरोधी, नास्तिक विरोधी, निरंकुशतावादी, नस्लीय, मजदूर विरोधी, मानवता विरोधी, विचारधारा और रवायतों के पोषण के लिए इन्हीं देवी-देवताओं के  नाम का सहारा लेते रहते हैं। 

सीधी बात है: राम अगर भगवान हैं, तो फासीवादी उनका राजनीति और पूंजीपतियों-सामंतों के पक्ष मे इस्तेमाल नहीं कर सकते। क्योंकि भगवान आदर्शों और दिव्यता से जुड़े हैं। फिर भगवान का गलत इस्तेमाल बिना शंकराचार्यों और ब्राहमण पुरोहितों के समर्थन से नहीं हो सकता। 

इसीलिये गोलवरकर भगवान राम को महापुरुष का दर्जा देते हैं। आरएसएस एक अलग पंथ है। वो चाहता है कि सनातन धर्म समाप्त हो और उसकी जगह 'हिन्दुत्व' स्थापित हो जाये। भगवान को मानव का दर्जा देकर, आरएसएस मन्दिरों पर कब्ज़ा करेगा। योगी का हनुमान को दलित कहना भी इसी षड्यंत्र का हिस्सा है। 

हिटलर से लेकर मुसोलिनी तक और सावरकर से गोलवलकर तक सभी फासिस्ट ताकतें सेक्युलर स्पेस में पूंजीवाद और साम्राज्यवाद को पोषित करने और नागरिक-अधिकारों को कुचलने के लिए भगवान के पुरुष नाम का इस्तेमाल करते रहे हैं ताकि खुद जवाबदेही से बचे रहें।   

असली सेक्युलर भगवान के नाम का सहारा नहीं लेते। वे अपने लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए तर्क, बहुलतावाद, विज्ञान और लोकतंत्र का सहारा लेते हैं। 1973 मे स्वामी कृष्णबोध आश्रम के देहावसान के उपरांत, ज्योतिर्मठ, बदरीनाथ के शंकराचार्य पद पर स्वामी स्वरूपानंद आसीन हुए। तदुपरांत वह 1982 में द्वारका पीठ  के शंकराचार्य भी बने। 1950 के दशक से करपात्री और स्वामी स्वरूपानंद पर आरएसएस के हमले बढ़ गए। उनके द्वारा आरएसएस पर लिखी गईं पुस्तकें बाज़ार से गायब होने लगीं।  

1980 में संघ ने विश्व हिन्दू परिषद के ज़रिए ज्योतिर्मठ बदरीनाथ को हथियाने की कोशिश की और वासुदेवानन्द को शंकराचार्य घोषित कर दिया। मामला अदालत पहुंचा। कोर्ट ने स्वामी स्वरूपानंद की  शंकराचार्य पदवी को बरक़रार रखा।

जब 2014 में भाजपा ने वाराणसी में ‘हर-हर मोदी' का नारा लगाया तो स्वामी स्वरुपानन्द ने ही सबसे पहले इस पर आपत्ति जताई। 2015 में स्वामी स्वरूपानंद ने कहा  "भ्रष्टाचार खत्म करने के मोदी के दावे के बावजूद रिश्वतखोरी बदस्तूर जारी है। समाज में नैतिकता और नैतिक मूल्यों का ह्रास इसका सबसे बड़ा कारण है।" 

2016 में आरएसएस पर टिप्पणी करते हुए स्वामी स्वरूपानंद ने कहा, ‘’संघ हिन्दुओं की बात करता है मगर उनके लिए करता कुछ नहीं है। यह और भी खतरनाक बात है कि हिन्दू हित की रक्षा के नाम पर वे लोगों को मूर्ख बना रहे हैं। आज देश पर भाजपा का शासन है। इससे पहले कांग्रेस थी। मगर दोनों ही सरकारों के दौर में गौहत्या बंद नहीं हुई। तो फिर भाजपा और कांग्रेस में क्या भिन्नता है? भाजपा ने वादा किया था कि वे राम मंदिर बनाएंगे और धारा 370 को हटाएंगे। अब वे कहते हैं कि इस बारे में दोबारा सोचना पड़ेगा . . . . . .’’

स्वामी स्वरूपानंद ने अमेरिकी साम्राज्यवाद को कटघरे में खड़ा किया और इस्कॉन ISCKON को सीआईए का एजेंट बताया। 

फरवरी 2016 में स्वामी स्वरूपानंद ने इस्कॉन को सनातन धर्म का एक अंग मानने से इनकार कर दिया और आरोप लगाया कि यह हवाला कारोबार का अड्डा है जिसका इस्तेमाल  भारत से यूएस और अन्य देशों को पैसा भेजने के लिए किया जाता है। 

उन्होंने भारत में इस्कॉन के मंदिरों की बढ़ती हुई संख्या पर भी सवाल उठाए और पूछा कि वे आसाम और छत्तीसगढ़ में मंदिर क्यों नहीं बनाते जहां मन्दिरों की भारी कमी है। 

स्वामी स्वरूपानंद और उनके पट्टशिष्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सनातन धर्म के   'ज्ञान मार्ग' का प्रतिनिधित्व करते हैं। ये दोनों धर्म और राजनीति का घालमेल करने वाली धर्मान्धता और अंधभक्ति के खिलाफ एक मजबूत कवच की तरह खड़े हुए हैं। दोनों ही धर्मशास्त्रों के प्रकांड विद्वान हैं। दोनों ने ही उत्तर भारत में आरएसएस के बढ़ते प्रभाव पर लगाम लगाई। दोनों ही ‘मोदी संक्रमण' से लड़ रहे हैं।

स्वामी स्वरूपानंद और उनके ज्ञानवर्धक प्रवचनों को सुनिए। यूरोप ने भी कट्टरवादी धर्म और फासीवाद के बीच खूब वाद-विवाद देखे हैं। लेकिन प्रोटेस्टेंट हों या कैथोलिक, दोनों ही ईसाई संगठनों ने हिटलर और मुसोलिनी के खिलाफ आक्रामक रुख अख्तियार नहीं किया। 

सौभाग्य से भारत में हम सनातन धर्म के गुरुओं को फासीवादी ताकतों के खिलाफ आवाज़ बुलंद करते हुए देख-सुन रहे हैं। 

स्वामी स्वरूपानंद ने हाल ही में विश्व हिन्दू परिषद द्वारा आयोजित अयोध्या की धर्मसभा की हवा निकलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। न्यायालय के फैसले से  इतर स्वामी स्वरूपानंद ही एकमात्र ऐसी शख्सियत हैं जो अयोध्या विवाद का शांतिपूर्ण हल निकाल सकते हैं।

(ये लेख इतिहासकार के तौर पर 1857 पर शोधपरक काम कर कई किताबें लिखने वाले अमरेश मिश्र ने लिखा है। मूल रूप से अंग्रेजी में लिखे गए इस लेख का हिंदी अनुवाद मीनू जैन ने किया है।)

 








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Ranjeet Kumar :: - 12-01-2018
Nice article