रजोधर्म के विमर्श पर पुरुषवाद की छाप

बेबाक , , रविवार , 18-02-2018


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डॉ. राजू पांडेय

नारीवादी विमर्श को नई दिशा देने वाली प्रसिद्ध अमेरिकी राजनैतिक सामाजिक कार्यकर्ता ग्लोरिया स्टीनेम ने 1978 में एक व्यंग्य लिखा था जिसे रजोधर्म सम्बन्धी पुरुषवादी दृष्टिकोण की असंगत एकपक्षीयता को दर्शाने के लिए बारंबार उद्धृत किया जाता है। ग्लोरिया हमें उस काल्पनिक परिस्थिति में ले जाती हैं जब अचानक विश्व के सभी पुरुषों का रजोधर्म प्रारम्भ हो जाता है और महिलाओं का रजोधर्म समाप्त हो जाता है। जैसे ही रजोधर्म पुरुषों की शारीरिक विशेषता बनता है वैसे ही यह गर्व का विषय बन जाता है और इसके बारे में दम्भोक्तियाँ की जाने लगती हैं। चर्चा इस बात पर होने लगती है कि रजोधर्म कितना लम्बा और कितना ज्यादा? ग्लोरिया men-struation शब्द गढ़ती हैं और पॉल न्यूमैन तथा मुहम्मद अली के नाम से बाजार में उतारे गए सेनेटरी पैड्स की धुँआधार बिक्री की कल्पना करती हैं। सत्य, कल्पना से कहीं अधिक आश्चर्यजनक होता है। यह उक्ति कम से कम रजोधर्म विषयक विमर्श के लिए तो सौ फीसदी खरी उतरती है। विश्व के सर्वाधिक विकसित देश अमेरिका में यू ट्यूब सनसनी इंग्रिड नीलसन जब जनवरी 2016 में राष्ट्रपति बराक ओबामा से पूछती हैं कि अमेरिका के 40 से भी अधिक राज्य सैनिटरी पैड्स पर टैक्स क्यों लगाते हैं तो वे चकित लगते हुए कहते हैं कि संभवतः ये कानून तब बने होंगे जब पुरुष कानून बनाया करते थे। अमेरिका का ही एक अन्य दृश्य है जब 6 अगस्त 2015 को फर्स्ट रिपब्लिकन प्रेसिडेंशियल डिबेट में फॉक्स न्यूज़ एडिटर केली के प्रश्नों से तिलमिलाए डोनाल्ड ट्रम्प कहते हैं- उसकी आँखों से- जहाँ कहीं से भी- रक्त ही रक्त निकल रहा था। तब वे पुरुषवादी सोच की अपरिवर्तनीयता पर ही मुहर लगाते हैं।

हमारे देश में भी जब सेनेटरी पैड्स को लक्ज़री आइटम मान कर इस पर 12 प्रतिशत जीएसटी लगाया जाता है और इसे इसेंशियल गुड्स की श्रेणी में रखने के लिए आंदोलन होते हैं तब निर्णय लेने की प्रक्रिया पर पुरुषवाद की छाप का प्रश्न चर्चा में आता है। ए सी नीलसन और प्लान इंडिया का 2010 का एक सर्वे बताता है कि भारत की 35.5 करोड़ रजस्वला महिलाओं में से 12 प्रतिशत महिलाएं ही सेनेटरी पैड्स का उपयोग करने की हैसियत रखती हैं शेष की किस्मत में राख, रेत गोबर, कपड़ा, पत्तियां आदि ही लिखा है। यद्यपि नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे 2015-2016 के आंकड़े बेहतर चित्र खींचते हैं- इसके अनुसार 78 प्रतिशत शहरी और 48 प्रतिशत ग्रामीण महिलाएं स्वास्थ्य रक्षक और स्वच्छ अर्थात एक बार उपयोग किए जाने वाले डिस्पोजेबल सेनेटरी नैपकिन्स का उपयोग करती हैं। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा 17 राज्यों के 1092 ब्लॉकों में अगस्त 2014 तक 1.4 करोड़ ग्रामीण किशोरियों को  4.82 करोड़ फ्रीडेज सेनेटरी नैपकिन पैकेट्स बाँटने का दावा भी किया गया है। किन्तु फण्ड की अपर्याप्तता के कारण माह में आवश्यक संख्या से कम सेनेटरी नैपकिन उपलब्ध कराए जाते हैं और उपलब्ध सेनेटरी नैपकिन की गुणवत्ता भी अच्छी नहीं होती। भ्रष्टाचार यहाँ भी हावी है इसलिए न केवल गुणवत्ता के साथ समझौता किया जाता है बल्कि सेनेटरी नैपकिन के वितरण में भी गड़बड़ियाँ होती हैं। स्वतन्त्र सर्वेक्षण बताते हैं कि भारत में केवल 20 प्रतिशत महिलाएं ही सेनेटरी पैड्स का उपयोग करती हैं जबकि चीन, इंडोनेशिया और थाईलैंड में यह संख्या 50 प्रतिशत से भी अधिक है। इन देशों में सैकड़ों स्थानीय सेनेटरी पैड निर्माता सस्ते विकल्प उपलब्ध करा रहे हैं।

इकॉनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट इस क्षेत्र में स्टार्ट अप्स की पड़ताल करती है और हमें बताती है कि भारत में  आई आई टी मुम्बई के स्नातकों की सरल डिज़ाइन (जो आशा कार्यकर्ताओं की मदद से उन क्षेत्रों तक पहुंच रही है जहाँ बड़ी कंपनियां पहुंच नहीं पातीं) और गुजरात की वंडर विंग्स (जो मार्केटिंग के लिए स्वयंसेवी संगठनों पर निर्भर है) जैसे गिने चुने उदाहरण हैं। अरुणाचलम मुरुगनाथम की जीवन गाथा पुरुषवादी व्यवस्था और समाज से लड़कर सफलता प्राप्त करने का उदाहरण है। उनकी यह उपलब्धि इस सिस्टम और समाज के कारण नहीं बल्कि इनके बावजूद मिली है इसलिए यह संघर्ष की प्रेरणा तो देती है किन्तु अनेक बिंदुओं पर सिस्टम और समाज को कटघरे में भी खड़ा करती है। स्टार्ट अप्स की चर्चा तो सरकार खूब करती है किंतु जब सेनेटरी पैड्स जैसे बुनियादी क्षेत्रों में स्टार्ट अप्स को बढ़ावा देने की बात आती है तो सरकार के दावे जमीन पर रूपाकार लेते नहीं दिखते।

हम बांग्लादेश से भी पीछे हैं जहां सेनेटरी पैड्स के 40 से ज्यादा लोकल ब्रांड मौजूद हैं। यद्यपि सरकार के अपने तर्क हैं। सरकार के अनुसार सेनेटरी नैपकिन्स पर 12 प्रतिशत ब्रैकेट के अंतर्गत एक इनपुट टैक्स क्रेडिट देने के फलस्वरूप उपभोक्ता को व्यवहारिक रूप से 3 से 4 प्रतिशत जीएसटी देना पड़ता है। यदि जीएसटी हटा दिया जाए तो उत्पादकों को कच्चे माल की खरीद पर इनपुट टैक्स क्रेडिट का लाभ नहीं मिलेगा। इसलिए सेनेटरी नैपकिन की उत्पादन लागत में वृद्धि होगी और उपभोक्ता को ज्यादा कीमत चुकानी होगी। सरकार एक और तर्क दे रही है, चीन से निर्यात होने वाले माल को निर्यात शुल्क में छूट दी जाती है। हमारे देश में आयात पर केवल 12 प्रतिशत एकीकृत जीएसटी लगता है। अब सीमा शुल्क भी नहीं लगता है। इस प्रकार चीन से आयातित सेनेटरी नैपकिन्स सस्ते होंगे और भारतीय उत्पादकों के स्वदेशी नैपकिन इनका मुकाबला नहीं कर पाएंगे।

 विश्व के अधिकांश विकसित देशों में सेनेटरी पैड्स को स्वास्थ्य उत्पाद माना जाता है। अमेरिका में इन्हें मेडिकल डिवाइस का दर्जा दिया जाता है और इन्हें कठोर गुणवत्ता जांच से गुजरना पड़ता है किंतु हमारे देश में यह विविध उत्पादों की श्रेणी में रखे गए हैं। जब स्त्रीरोग विशेषज्ञों की राय ली गई तो 97 प्रतिशत का यह मानना था कि सेनेटरी पैड्स से प्रजनन और मूत्र पथ संक्रमण पर कारगर रोक लग सकती है। इसके बावजूद भी हम अपेक्षित गंभीरता दिखाने में असफल रहे हैं।

रजोधर्म का मसला पितृसत्तात्मक सोच की अकल्पनीय गहराई और व्यापकता का चौंकाने वाला नमूना है। अनेक शोधकर्त्ता इस बात को रेखांकित करते हैं कि जब नारी को वाटर,सैनिटेशन एंड हाइजिन प्रोग्राम(WASH) के केंद्र में रखा जाता है और विश्व की विकास एजेंसीज मेंस्ट्रुअल हाइजिन मैनेजमेंट(MHM) को प्राथमिकता के एजेंडे में अग्रणी स्थान देने लगती हैं तब नारियों के लिए भी यह कल्पना करना कठिन होता है कि इन फैसलों के पीछे वही पितृसत्तात्मक सोच कार्य कर रही है जो रजोधर्म को गंदा और दूषित समझती है और जिसका निर्माण उन सामाजिक निषेधों के दायरे में हुआ है जो रजोधर्म को एक सामान्य जैविक प्रक्रिया नहीं मानते बल्कि इसे अशुद्धता और रोग से सम्बद्ध कर देते हैं। चीन, जापान, इंडोनेशिया और दक्षिण कोरिया जैसे देशों में ऐसे कानून मौजूद हैं जो रजोधर्म के दौरान महिलाओं को सिक लीव लेने का अधिकार देते हैं। पितृसत्तात्मक चिंतन हमारे अवचेतन में समाया हुआ है।

यही कारण है कि जब किरण गांधी 2015 की लंदन मैराथन में रजोधर्म के दौरान  स्राव को रोकने वाले उपाय बिना अपनाए दौड़ती हैं तो नारियां भी इसे सस्ती लोकप्रियता प्राप्त करने का साधन समझ लेती हैं और इसकी निंदा करती हैं। इलोनी कैस्ट्रियो नाम की एक युवा जर्मन लड़की विश्व महिला दिवस पर 8 मार्च 2015 को सेनेटरी पैड्स पर नारीवादी स्लोगन लिखती है और “कल्पना करें यदि पुरुष बलात्कार से भी उतनी ही घृणा करते जितनी रजोधर्म से करते हैं” तथा “बलात्कारी, व्यक्ति का बलात्कार करते हैं न कि पहनावे का” जैसे स्लोगन्स के लिए उसे गालियां मिलती हैं और बलात्कार की धमकी भी, तो हमें यह मानना पड़ता है कि पितृसत्ता की जड़ें बहुत गहरी हैं। इसी मौके पर रूपी कौर नाम की भारतीय मूल की कनाडियन कवयित्री जब इंस्टाग्राम पर रजोधर्म के रक्त के धब्बों वाली पोशाक के साथ अपनी तस्वीर डालती हैं तो पहले तो इंस्टाग्राम इसे दो दो बार अपनी सामुदायिक नीतियों के प्रतिकूल होने के कारण हटा देता है बाद में विवाद होने पर सफाई दी जाती है कि ऐसा दुर्घटनावश हो गया था।

यदि भारत के सेनेटरी पैड ब्रांड्स के नामों का अवलोकन करें तो व्हिस्पर में वह वर्जना का भाव छिपा है जो रजोधर्म की सार्वजनिक चर्चा को बुरा समझता है। जबकि स्टे फ्री और केअर फ्री में उन बन्धनों की ध्वनि सुनाई देती है जो रजोधर्म के दौरान नारियों पर लगाए जाते हैं। यह पुरुषवादी दृष्टिकोण देश और काल की सीमाओं को लांघता है। जब अमेरिका में जॉनसन एंड जॉनसन ने 1896 में अपना पहला सैनिटरी पैड- लिस्टर्स टॉवल: सेनेटरी टॉवेल्स फ़ॉर लेडीज- के नाम से बाजार में उतारा था तो यह इस कारण नहीं बिका क्योंकि महिलाएं इसे दुकानों में माँगने के लिए संकोच करती थीं। बाद में 1920 के दशक में इसका नाम बदलकर Nupak कर दिया गया जिससे प्रोडक्ट के विषय में कुछ पता नहीं चलता था। इसकी पैकिंग भी अनोखी थी।

इसमें बॉक्स पर केवल एक ओर एक लेबल पर कंपनी और उत्पाद का नाम था शेष बॉक्स पर कुछ भी नहीं लिखा था जिससे महिलाएं इसे बिना शर्मिंदा हुए ले जा सकें। 1920 के दशक में कोटेक्स के सेनेटरी पैड्स की बिक्री का भी विचित्र तरीका अपनाया जाता था। महिलाएं एक निर्धारित बॉक्स में बिना कुछ कहे निर्धारित कीमत डाल देती थीं। बदले में दुकानदार भी बिना कुछ पूछे उन्हें कोटेक्स का एक बॉक्स दे देता था। यही मानसिकता अपने देश में हम तब देखते हैं जब सेनेटरी पैड्स को दुकानदार काली अपारदर्शी पॉलीथिन में या अखबार में लपेट कर हमें देता है। सेनेटरी पैड्स के विज्ञापन भी अपनी स्वाभाविक पहचान और पुरुष प्रदत्त छवि के मध्य संघर्ष करती नारी को अनजाने ही उजागर कर जाते हैं। इन विज्ञापनों में नारी, रजोधर्म को गंदा, अस्वास्थ्यकर, असुविधाजनक और बंधनवत मानने वाले पुरुषवादी समाज की आवश्यकताओं के अनुसार स्वयं की आवश्यकता को चित्रित करती दिखती है जबकि अपने निजी जीवन में वह अच्छी तरह जानती है कि यह खाने और सांस लेने जैसी स्वाभाविक प्राकृतिक घटना है।

रजोधर्म को लेकर एक पूरी पुरुषवादी मूल्यमीमांसा गढ़ी गई है जिसकी जड़ें हमारी धर्म परंपरा और सांस्कृतिक व्यवहार में देखी जा सकती है। अधिकांश धर्म रजोधर्म के दौरान नारी के धार्मिक कार्यकलापों में हिस्सा लेने और धार्मिक स्थलों में प्रवेश पर प्रतिबंध लगाते हैं। प्रायः सभी धर्म यह मानते हैं कि नारी रजोधर्म के दौरान अपवित्र हो जाती है। कुछ धर्मों यह अपवित्रता भौतिक मानी जाती है और कुछ में आत्मिक। चूंकि नारी रजोधर्म के दौरान अपवित्र मानी जाती है इसलिए सभी धर्मों में रजोधर्म के बाद उसकी शुद्धि के लिए किसी न किसी प्रकार के स्नान और धार्मिक कर्मकांड का प्रावधान है। लगभग सभी धर्म रजोधर्म के दौरान यौन समागम का निषेध करते हैं। यद्यपि कुछ सूक्ष्म अंतर भी दिखाई देते हैं। यहूदी धर्म के रजोधर्म विषयक नियम अत्यंत कठोर हैं किंतु यहूदी धर्म से प्रभावित ईसाई और इस्लाम धर्म में यह कठोरता कुछ कम होती दिखती है।

इस्लाम में रजोधर्म के दौरान नारी की अपवित्रता को आत्मिक माना जाता है किंतु रजोधर्म को भौतिक रूप से दूषित नहीं समझा जाता। हिन्दू धर्म रजस्वला नारी को धार्मिक और सामाजिक गतिविधियों में हिस्सा लेने से मना करता है और दैनंदिन जीवन के कुछ कार्य भी संपादित करने से रोकता है। किन्तु हिन्दू धर्म से प्रभावित बौद्ध धर्म इस संबंध में उदार है और रजोधर्म को नारी शरीर के गुणधर्म के रूप में देखता है। सिख धर्म आश्चर्यजनक रूप से रजोधर्म के विषय में अत्यंत उदार और प्रगतिशील दृष्टिकोण अपनाता है। यह जानना हमें चकित कर सकता है कि आदिम जनजातीय सभ्यताओं में भी रजस्वला स्त्रियों के लिए ग्राम के अंतिम छोर पर विशेष झोपड़ियां बनाई जाती हैं। धर्म परंपरा और लोक व्यवहार अंतः सम्बन्धित होते हैं। इसी कारण रजोधर्म के विषय में हास्यास्पद मान्यताओं, टोटकों और अंधविश्वासों का एक पूरा संसार रचा गया है। यह अतार्किक संसार नारियों के जीवन को नियंत्रित-नियमित-संकुचित करने का एक प्रभावकारी उपकरण बना हुआ है। रजोधर्म के दौरान नारियाँ बुरी शक्तियों और दुरात्माओं को आकर्षित करती हैं। रजोस्राव का उपयोग पुरुषों के वशीकरण हेतु किया जा सकता है। रजस्वला स्त्री द्वारा परिवार के अन्य सदस्यों को स्पर्श करने या उनसे बात करने से वे रोगग्रस्त हो सकते हैं। रजस्वला स्त्रियाँ शार्क मछलियों की पहली पसंद होती हैं।

रजस्वला स्त्री द्वारा पकाया भोजन दूषित हो जाता है। रजोस्राव के दौरान स्नान करने से बांझपन का खतरा होता है(अफगानिस्तान)। दूषित रजस्वला स्त्रियों को घर में रखने पर देवी देवता कुपित हो सकते हैं इसलिए उन्हें घर से बाहर निर्वासित कर अछूतों जैसा व्यवहार किया जाए(चौपदी प्रथा-नेपाल)। रजोधर्म एक रोग है(ईरान)। रजोधर्म के दौरान प्रयुक्त पैड्स को यदि अन्य कचरे के साथ मिलाया जाए तो कैंसर व अन्य रोग हो सकते हैं(बोलीविया)। रजोधर्म से सम्बंधित ऐसे सैकड़ों अंधविश्वास प्रचलन में हैं। यूनिसेफ जैसी संस्थाएं इन अंधविश्वासों के विरुद्ध संघर्ष कर रही हैं किन्तु लड़ाई कठिन और प्रगति धीमी है। इन धारणाओं और अंधविश्वासों के कारण हमारे देश की 23 प्रतिशत लड़कियों को पढ़ाई छोड़नी पड़ती है। इनमें भी बड़ी संख्या ऐसी लड़कियों की होती है जिन्हें रजोधर्म प्रारंभ होने पर ही उनकी वे माताएं इसके बारे में बताती हैं जो स्वयं पुरुषवादी विमर्श और इसके द्वारा फैलाई गई भ्रांत धारणाओं की शिकार होती हैं। ऐसी स्थिति में जब यह लड़कियां पुरुष आवश्यकताओं के अनुरूप गढ़े गए विद्यालयों में पहुंचती हैं तो घोर शारीरिक यंत्रणा और मानसिक संत्रास झेलती हैं। कार्य स्थलों और शालाओं की बनावट और व्यवस्था पुरुषों को ध्यान में रखकर होती है, नारियों की आवश्यकताओं की उपेक्षा रजोधर्म जैसी सामान्य शारीरिक परिघटना को एक दुःस्वप्न में बदल देती है और मानसिक कुंठा तथा शारीरिक रोगों का कुचक्र प्रारंभ हो जाता है।

आधी दुनिया का प्रतिनिधित्व करने वाली नारी को रजोधर्म के संघर्ष में उलझाए रखकर पुरुष समाज निश्चित ही आनंदित होता होगा। राजनीति,प्रशासन, सामाजिक व्यवस्था, धर्म, कला, संस्कृति और क्रीड़ा जैसे अनगिनत क्षेत्रों में पुरुष के वर्चस्व को चुनौती देने के स्थान पर नारी को उसकी देह की लड़ाई लड़ रही है, यह तथ्य पुरुषवादी सत्ता को अतिशय संतोष प्रदान करता होगा और वह अपने वर्चस्व के प्रति आश्वस्त हो जाता होगा। अरुणाचलम मुरुगनाथम की सफलता भी पुरुषवादियों के अहंकार को कहीं न कहीं संतुष्ट करेगी कि नारियों के हक़ की लड़ाई लड़कर सफल होने वाला भी अंततः कोई पुरुष ही था अन्यथा नारियों को तो हमने इस तरह प्रशिक्षित कर दिया है कि वह अपनी दुर्दशा में ही सुख तलाश रही है।

(लेखक अलग-अलग विषयों पर नियमित तौर पर पत्र-पत्रिकाओं में लिखते रहते हैं और आजकल रायगढ़ में रहते हैं।)






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