ओडीशा में जब तार-तार हुई इंसानियत

हमारा समाज , , रविवार , 20-01-2019


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चरण सिंह

नई दिल्ली/ओडिशा। भारतीय समाज किस हद तक क्रूर और निर्दयी हो सकता है। और 21वीं सदी में भी छुआछूत और जातिवाद की पैठ कितनी गहरी है। ओडीशा के करपाबहल गांव की घटना उसकी खुली बयानी है। पीएम मोदी कुछ दिन पहले इससे कुछ दूरी पर स्थित बलांगीर इलाके में गए थे। उस समय बड़ी-बड़ी बातें हुई थीं। विकास के बड़े-बड़े दावे किए गए थे। लेकिन दावों के पत्थर जब हकीकत के आइने से टकराते हैं तो सब कुछ बेपर्दा हो जाता है। 

घटना बुधवार की है। 16 साल के सरोज के सामने मां की लाश पड़ी थी। अर्थी उठाने के लिए कम से कम चार कंधों की जरूरत पड़ती है। लेकिन चार की बात दूर यहां एक भी नहीं था। ऐसा नहीं है कि लोग नहीं थे। या फिर वो सक्षम नहीं थे। शव के पास सैकड़ों लोग मौजूद थे लेकिन उनकी भूमिका तमाशबीन से ज्यादा नहीं थी। दरअसल जानकी दलित परिवार से आती थी। सरोज की मां और इन खड़े तमाशबीनों के बीच एक फासला था जिसे छुआछूत कहते हैं। सामने पड़ी लाश से भी वो पटता नहीं दिख रहा था। अंत में थक हारकर सरोज को खुद ही सब कुछ करना पड़ा। उसने पहले मां के शव को चादर में लपेटा और फिर साइकिल के कैरियर पर बांधकर दूर ले जाकर खेत में गाड़ दिया। उपेक्षा की शिकार जानकी गत बुधवार को पानी लाने गयी थी तभी फिसल कर वहीं गिर पड़ी और फिर गिरते ही उसके प्राण पखेरू उड़ गए। 

सरोज अपनी मां के साथ उसके मायके में रहता था। दरअसल पिता की 10 साल पहले ही मौत हो गयी थी। लिहाजा जानकी बेटे सरोज को लेकर अपने मायके करपाबहल आ गयी थी। और फिर यहीं रहने लगी थी। लेकिन पेट की आग तो रोटी से बुझती है। लेकिन उनके पास न आय का कोई जरिया था और न ही काम करने की क्षमता। लिहाजा विपन्नता ने जानकी की शरीर को और जर्जर कर दिया था। 

वैसे तो सामान्य तौर पर अंतिम क्रिया के लिए जानकी का शव श्मशान घाट जाना था। उसके लिए कफन की व्यवस्था होनी चाहिए थी। लेकिन यहां समाज तो समाज प्रशासन भी अपनी जिम्मेदारी उठाना मुनासिब नहीं समझा। 

जरूरत इस बात को समझने की है कि जो महिला गिरते ही मर गई हो उसकी शारीरिक, मानसिक और आर्थिक स्थिति क्या रही होगी? जो बेटा अपनी मां के लिए एक कफन भी नहीं जुटा सका, वह किस हालात में रह रहा होगा?

यही है हमारे देश और समाज की असलियत। मां-बाप के साये से महरूम हो चुके सरोज को जब सहारे की जरूरत थी तो लोगों ने उसे अकेले छोड़ दिया। जिस देश की महानता का बखान करते हम नहीं थकते और जुबान भाईचारे की बातों से खुलती है। उस देश और समाज की सच्चाई अगर यही है तो उसे खुद को जिंदा कहने का हक नहीं है। वो निश्चित तौर पर एक मुर्दा समाज है। मनुष्य के तौर पर यहां जिंदा लाशें हैं जो जीवन के नाम पर चलती चली जा रही हैं। उनके पास न तो कोई मूल्य है और न ही उद्देश्य। इनमें जान भले ही हो लेकिन उनका सत्व मर गया है। 

 








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