साप्ताहिकी: सती कुआं और कुछ नए सन्दर्भ

हमारा समाज , , शुक्रवार , 31-05-2019


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चंद्रप्रकाश झा

बीते दौर की भाजपा समर्थक अभिनेत्री पायल रोहतगी ने हाल में जब सती प्रथा के समर्थन में ट्वीट कर इस कुप्रथा पर रोक लगाने का क़ानून बनाने में अहम भूमिका निभाने वाले महान समाज सुधारक राजा राम मोहन राय को अंग्रेज शासकों का चमचा बताया है। उन्होंने एक ट्वीट को शेयर किया जिसमें लिखा था कि "राजा राममोहन राय एक समाज सुधारक थे और उन्होंने ब्रहमो समाज मूवमेंट की स्थापना की थी। उन्होंने देश से सती प्रथा और बाल विवाह को खत्म करने के लिए आंदोलन भी चलाया था। कई इतिहासकार उन्हें भारत में नवयुग का जनक भी कहते रहे हैं।

इस ट्वीट को 'शेयर' कर पायल ने लिखा, "नहीं वे अंग्रेज़ों के चमचे थे। अंग्रेजों ने राजा राममोहन राय का इस्तेमाल सती प्रथा को बदनाम करने के लिए किया। सती परंपरा देश में अनिवार्य नहीं थी। बल्कि मुगल शासकों द्वारा हिंदू महिलाओं को ' वेश्यावृति से बचाने के लिए इस प्रथा को लाया गया था। सती प्रथा महिलाओं की मर्जी से होता था। सती किसी भी मामले में 'अनाधुनिकीकृत' प्रथा नहीं थी।

इसके कुछ समय पहले आम चुनाव प्रचार के शोरगुल के दौरान 18 मई को कांग्रेस नेता एवं राजस्थान के मुख्यमंत्री ने अशोक गहलोत ने जब कहा कि "जौहर का होना गर्व और स्वाभिमान की बात थी” , तो इस पर शायद देश में ज्यादा लोगों का ध्यान नहीं गया। उन्होंने  जोधपुर एयरपोर्ट पर मीडियाकर्मियों से बातचीत में कहा, " जौहर अलग होता है और सती प्रथा अलग होती है... सती प्रथा पर पूरे देश रोक लगी है... जो जौहर की भावना है इतिहास की वह सभी जानते हैं.. उस वक्त  जौहर हुआ तो कौन स्वीकार नहीं करेगा, इसको लेकर अनावश्यक बहस नहीं होनी चाहिए। " उन्होंने यह टिप्पणी  राजस्थान विधान सभा के चुनाव के बाद राज्य की सत्ता में कांग्रेस के आने के बाद स्कूल की पाठ्यपुस्तकों में उन बदलाव पर उठे विवाद के बीच की  जिनमें  पिछली बीजेपी सरकार के दौरान शुरू की गई स्कूली पाठ्य पुस्तकों में दी गयी सामग्री को हटाना शामिल है।

इतिहास में बहुत कुछ हुआ जो तथ्य है। लेकिन उन्हें वाजिब नहीं ठहराया जा सकता है।  खासकर तब जब सती कुप्रथा के विरोध में आंदोलन के उपरान्त सती प्रथा पर रोक लगाने के ब्रिटिश राज में उठाये गए विधिक उपाय के करीब एक सौ वर्ष बाद स्वतंत्र भारत की केंद्रीय विधायिका ने भी अधिनियम पारित कर दिए हैं। सवाल होना चाहिए कि क्या जौहर , सती का  बहुवचन नहीं है ?  अगर है, और विधिक रूप से यही है, तो मुख्यमंत्री का सांविधिक पद संभाले हुए गहलौत ने कैसे कह दिया कि दोनों अलग -अलग चीजें है। यही नहीं उनका कहना कि  जौहर गर्व और स्वाभिमान की बात थी, क्या और भी आपत्तिजनक नहीं है?

आगे और चर्चा से पहले एक ' सती  कुआं ' की एक तस्वीर काबिलेगौर है जो कभी राजस्थान के नागौर जिला में कुचामन किला क्षेत्र में  होता था। भारत की राजनीतिक स्वतंत्रता के कुछ दशक बाद जब राजस्थान में सती निरोधक प्रांतीय कानून बना तो विधिक दबाब में राज्य सरकार को इस कुंआ को समतल करने का आदेश देना पड़ गया। वह जगह अब भी है , जहां यह कुवा  होता था। वो कुआं तो नहीं रहा पर उस सती कुप्रथा को  हमारे समाज में अवैध रूप से महिमामंडित करने का क्रम जारी है , जिसकी झलक जब तब नज़र आ जाती है। पायल रोहतगी का ट्वीट और अशोक गहलोत का बयान भी चर्चित फिल्म पद्मावत में इतिहास के तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर तैयार की गई स्क्रिप्ट और मौजूदा क़ानून के प्रावधानों के तहत आपराधिक मंतव्य से कम नहीं है।  

इस अमानवीय अपराध को जायज़ ठहराने वालों से मुकाबला के लिये  क़ानून , इतिहास औरसाहित्य समेत अन्य बातों को बार -बार उजागर करने के अलावा शायद इस तस्वीर की भी दरकार रहेगी. यह तस्वीर नई दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में 1980 के दशक में पढ़े सतीश  कुमार से मिली है, जो अब हरियाणा के रोहतक में  राजनीतिक -सामाजिक कार्यकर्ता हैं। देशभर में खूब घुमते -फिरते हैं। वह शौकिया छायाकार भी हैं। सती कुआं की यह तस्वीर उन्होंने बरसों पहले ली थी।

तस्वीर राजस्थान के एक पूर्ववर्ती ' सती कुआं  ' का है जो कभी नागौर जिला में  स्थित कुचामन किला क्षेत्र में  होता था।  यह किला राजस्थान के सबसे पुराने किलों में से है। यह किला पर्वत के सबसे ऊपरी हिस्से पर स्थित है जैसे के एक चील का घोंसला होता है । इसका निर्माण क्षत्रिय प्रतिहार वंश के क्षत्रिय राजपूत सम्राट नागभट्ट प्रथम ने 750 ईo में कराया।  क्षत्रिय प्रतिहार वंशके शासनकाल में ऐसे कई किलो का निर्माण हुआ , जिनमें मण्डौर, जालौर, कुचामन, कन्नौज, ग्वालियर के किले  रहे। छठी सदी से लेकर 11 वीं सदी तक रहे  इस वंश के शासकों में   हरिश्चन्द्र, नागभट्ट, वत्सराज, मिहिरभोज, महेन्द्रपाल, महीपाल, वीरराजदेव  आदि का उल्लेख किया जाता ।  कुचामन का किला अपने  भीमकाय परकोटो, 32 दुर्गों, 10 द्वारों और विभिन्न प्रतिरोधक क्षमता वाला किला है। किले में कई भूमिगत टैंक ,  गुप्त ठिकाने, अंधकूप ,कारागार आदि बताये जाते हैं। अब यह हेरिटेज होटल में तब्दील हो गया है।

निःसंदेह पद्मावत जैसी फिल्मों ने हमारे समाज  का अहित ही किया। भारतीय समाज पुरुष सत्तात्मक ही है। राजा राममोहन राय के समय बने निषेध विधान के बावजूद सती कुप्रथा की झलक जब- तब सामने आती आ ही जाती है , दिवराला काण्ड के बाद भी।  भारतीय समाज की सड़न के कारणों का  सतत उल्लेख किया जाना चाहिए।  क्योंकि तभी उसके निवारण के रास्ते मिल सकते हैं।  हमारा समाज फिल्मों से प्रभावित होता रहा है।  कई फिल्मों ने  हमारे समाज को साकारात्मक दिशा दी है।  लेकिन कुछ  फिल्मों ने  हमारे समाज की सड़न को बढ़ाया है।  उनमें पिछले बरस प्रदर्शित ' पद्मावत ' का जिक्र लाजिमी  है। क्योंकि इसमें  " जौहर " को महिमामंडित किया गया है . फिल्म के अंत में नेपथ्य से महिला स्वर में फिल्म की मुख्य किरदार पद्मावती के जौहर की प्रशस्ति की गई है।

नई दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्विद्यालय (जेएनयू) से हिन्दी की स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त कर चुके वरिष्ठ फिल्म पत्रकार अजय ब्रम्हात्मज ने हिंदी के मूर्धन्य साहित्यकार-इतिहासकार आचार्य रामचंद्र शुक्ल ( 1884 -1941 ) के एक आलेख के हवाले से इस बात को भी रेखांकित किया कि भारत के सूफी कवि मलिक मोहम्मद जायसी (1477 -1542 ) की अवधी में लिखीबहुचर्चित किन्तु काल्पनिक काव्य कृति , पद्मावत में कहीं भी सती प्रथा को महिमामंडित नहीं किया गया है। हम जानते हैं कि संदर्भित फिल्म का नाम पहले पद्मावती था , जिसे बाद मेंपद्मावत नाम से रिलीज किया गया। फिल्म का निर्माण मुकेश अम्बानी की एक कंपनी ने किया है। इसके निर्देशक संजय लीला भंसाली हैं जो 1988 में अग्रणी फिल्मकार श्याम बेनेगल के निर्देशन में बनी और सरकारी टेलीविजन चैनल , दूरदर्शन पर प्रसारित हिंदी धारावाहिक , भारत एक खोज , के कुल 53 में से पद्मावत काव्य रचना पर आधारित एपिसोड के कला निदेशक थे। यह धारावाहिक , पांच हज़ार वर्ष पूर्व से लेकर 1947 तक के भारतीय इतिहास परभारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की ब्रिटिश राज में अहमदनगर की जेल में अप्रैल -सितम्बर 1944 में सरल अंग्रेजी में लिखित ग्रन्थ , डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया ,पर आधारित था था।

जौहर , सती कुप्रथा का ही बहुवचन है जो राजा राममोहन राय की पहल पर 1829 में बंगाल सती नियमन अधिनियम के तहत प्रतिबंधित है। कालांतर में इस अधिनियम को और कड़ा कर सती के महिमामंडन को भी आपराधिक कृत्य माना गया है . वर्ष 1987 में राजस्थान सरकार ने सती निरोधक अधिनियम बनाया जो भारत के संसद के पारित सती कृत्य ( निरोधक ) अधिनियम , 1987 की बदौलत राष्ट्रीय कानून में परिणत हो गया। इस कानून के तहत किसी विधवा के स्वैछिक रूप से अथवा उसे बलपूर्वक ज़िंदा जला या दफना देने का कृत्य ही नहीं बल्कि इस कुकृत्य का किसी भी तरह का समारोह मनाकर , या जुलूस में भागीदारी कर, कोई ट्रस्ट बना कर या मंदिर का निर्माण कर या सती (जौहर ) करने वाली विधवा / विधवाओं की स्मृति को सम्मानित करने और महिमामंडित करना प्रतिबंधित है। इस राष्ट्रीय क़ानून का प्रारूप , केंद्र सरकार के महिला

एवं बाल कल्याण मंत्रालय ने तैयार किया था। सती कुप्रथा को रोकने और इस जघन्य अपराध के महिमामंडन पर कड़ा अंकुश लगाने के उपायों को और भी कारगर ढंग से लागू करने के लिए 1987 के इस राष्ट्रीय अधिनियम के तहत कुछेक रूल भी बनाए गए। इस कानून के भाग 1 ( 2 ) में निहित परिभाषाओं से स्पष्ट है कि पद्मावत फिल्म में सती (जौहर ) कुकृत्य का किया गया महिमामंडन आपराधिक दंड प्रक्रिया की धाराओं के अनुसार दंडनीय अपराध है। ऐसे अपराध के लिए उपरोक्त राष्ट्रीय क़ानून के भाग -2 की विभिन धाराओं के अनुसार न्यूनतम दंड , एक वर्ष का कारावास और कम से कम पांच हज़ार रूपये का जुर्माना भी है।

अधिनियम के भाग -3 में इस अपराध को रोकने और अपराध हो जाने की स्थिति में समुचित कदम उठाने के लिए सम्बंधित जिला अधिकारियों को प्राधिकृत करने के अलावा भाग -4 में विशेष अदालत के गठन का प्रावधान है। भाग -5 में विविध प्रावधान भी हैं जिनके तहत ऐसे अपराध के लिए विशेष अदालत द्वारा दोषी पाए गए व्यक्ति , भारत के जन - प्रतिनिधित्व अधिनयम की धाराओं के अनुसार पांच वर्ष तक चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य रहेंगे।

गौरतलब है कि 1987 में रूप कँवर -दिवराला सती कांड का अपने पत्रकारीय लेखन से महिमामंडन करने के कारण हिंदी दैनिक , जनसत्ता के तत्कालीन प्रधान संपादक प्रभाष जोशी ( अब दिवंगत ) का देश के नागरिक समाज ने पुरजोर विरोध किया था .इस विरोध के तहत उक्त दैनिक अखबार का पाठकों द्वारा बहिष्कार करने का अभियान भी चलाया गया था . संभवतः उसी अभियान का परिणाम था कि 1987 में राजस्थान में हरिदेव जोशी के मुख्यमंत्रित्व काल में नया कानून बना और 1988 में केन्द्र में राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में राष्ट्रीय अधिनियम बना। उस अधिनयम के लागू होने के बाद से देश में किसी सतीकाण्ड की खबर नहीं है लेकिन उसके महिमामंडन की

पूर्ण रोकथाम नहीं की जा सकी है , जिसका एक ज्वलंत उदाहरण संजय लीला की यह कमर्सियल फिल्म है। स्पष्ट है कि यह फिल्म सिनेमाकला के लिए नहीं धन कमाने के इरादे से बनाई और प्रदर्शित की गई। इस फिल्म ने भारत के एक राष्ट्रीय क़ानून को धता बता दिया और हमारी सरकार तमाशा देखती रही , विधि निर्माता और विधिवेत्ता लगभग चुप रहे। आज तक इस फिल्म को बनाने वालों के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई नहीं हुई।

फिल्म का शुरुआत में जिन लोगों ने विरोध किया उनपर आरोप है कि वे साफ तौर पर सत्तापोषित , सामन्ती , महिला -विरोधी और साप्रदायिक हैं। फिल्म प्रदर्शन को हरी झंडी दिखाने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के कारण भी कानून के राज से इतर लगते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने फिल्म पर रोक से जुड़ी सारी याचिकाएं खारिज कर कहा कि कुछ संगठनों की धमकी के मद्देन पर फिल्म पर रोक नहीं लगाई जाएगी। याचिका दाखिल करने वालों में  मध्यप्रदेश और राजस्थान की सरकार भी शामिल थीं , उन्होंने फिल्म में सती कुप्रथा के महिमामंडन का कोई जिक्र नहीं कर फिल्म के प्रदर्शन को रोकने के साम्प्र्दायिक तत्वों की बातों से सुर मिलाते हुए यही कहा था कि फिल्म के प्रदर्शन से कानून-व्यवस्था बिगड़ने का ख़तरा है। यह भी गौरतलब है कि फिल्म की शूटिंग और फिर उसका प्रदर्शन रोकने की मांग को लेकर हिंसा में लिप्त सती महिमामंडन के समर्थक तत्वों ने फिल्म के प्रदर्शन के बाद उसका विरोध छोड़ दिया। जाहिर है वे फिल्म में जौहर महिमामंडन के पक्ष में नेपथ्य से गूंजे स्वर से संतुष्ट हो गए। अहित हमारे समाज का ही हुआ। 

जब 'पुनरुत्थानवादी' भाजपा समर्थक पायल रोहतगी ही नहीं मुख्यमंत्री अशोक गहलौत जैसे बड़े कांग्रेस  नेता  भी सती / जौहर को गर्व की बात कहने लगे तो सोचना पडेगा ही कि हमारा समाज सच में कितना सड़ गया है।

(चंद्रप्रकाश झा वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

 








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Naveen Prakash :: - 06-03-2019
Politicians ko useless and past ki baaton ke jagah development kerne mein duty karna chaahiye