पटाखे तो रामजी के समय से फोड़े जा रहे हैं, आपने टीवी की ‘रामायण’ नहीं देखी क्या!

आड़ा-तिरछा , व्यंग्य, शनिवार , 14-10-2017


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वीना

(पटाखों पर बैन और अन्य गंभीरविषयों पर अचेतन भगत और यथावत पुजारी से विशेष (व्यंग्य) बातचीत।)

प्रश्न- अचेतन भगत जी, आप दिल्ली, एनसीआर में पटाखा बैन पर इतना क्यों उबल पड़े? जबकि आप तो मुंबई में रहते हैं!

अचेतन भगत- देखिए मुझे प्राइवेट अवार्ड तो कई मिल चुके हैं। पर राष्ट्रपति भवन में सम्मान का मज़ा ही कुछ और है। वो न मिला तो क्या मिला? इसमें मेरी दिल्ली मेरे काम आए तो हर्ज क्या है?

प्रश्न- क्या लोग आपकी लेखनी को इतनी गंभीरता से लेते है?

अचेतन भगत- लोग तो जलन के मारे हैं। उन्हें तो हमारे पीएम में हज़ारों खोट नज़र आते हैं। तो क्या रोक पाए वो उनके विकास को?

प्रश्न- तो आप पीएम के नक्शे कदम पर चलना चाहते हैं?

अचेतन भगत- पूरी दुनिया एक कामयाब आदमी को अपना आदर्श मानती है। इसमें नया क्या है?

प्रश्न- पर देश के जाने-माने बुद्धिजीवियों ने पीएम की जनविरोधी नीतियों की मुखालफत करते हुए अपने पुरस्कार लौटा दिए।

अचेतन भगत- अच्छा है न! तभी तो मेरे जैसों का नंबर आएगा। अब देखना ये है कि एक ही बार ट्विटियाने से काम चल जाएगा या और कई बार कोशिश करनी पड़ेगी।

प्रश्न- तो वो मुहर्रम... बकरे की बली पर बैन भी आपकी इसी अवार्ड प्लैनिंग का हिस्सा है?

अचेतन भगत- देखिये क्या है कि अक्लमंद लोगों को हर दौर कुछ मौके देता है, अपने हक़ में ऊंचे ओहदे, ऐशो-आराम हथियाने के। और मैं बेवकूफ नहीं हूं।

व्यंंग्य स्तंभ।

प्रश्न- पिछली बार दिवाली पर पटाखों के चलते ही इतना प्रदूषण हुआ था कि बच्चों का घर से निकला मुश्किल हो गया था। स्कूल बंद करने पड़े थे। पूरी दिल्ली को धुएं के गुबार ने ढक लिया था। क्या आप चाहते हैं कि इस बार भी ऐसे ही हालात हों?

अचेतन भगत- मुझे बस इतना कहना है कि सुप्रीम कोर्ट का बैन हिंदुओं की परंपराओं पर चोट है।

प्रश्न- कौन सी परंपरा?

अचेतन भगत- यही, दिवाली पर पटाखे चलाने की परंपरा!

प्रश्न- आपकी जानकारी के अनुसार ये परंपरा कब से चली आ रही है?

अचेतन भगत- क्या बच्चों जैसा सवाल है? जब से राम लंका जीत कर अयोध्या लौटे तभी से।

प्रश्न- क्या उस वक़्त अयोध्या वासी पटाखे बनाना और इस्तेमाल करना सीख गए थे?

अचेतन भगत- अरे भईए तभी तो फोड़े होगें न, जब बनाए गए होंगे।

प्रश्न- पर संस्कृत में लिखी वाल्मीकि रामायण और अवधी में लिखी आम जनमानस में प्रसिद्ध तुलसीदास की रामचरित मानस में तो पटाखों का कहीं जिक्र ही नहीं है। वहां तो केवल दीप जलाकर अंधेरी रात का अंधियारा दूर कर राम का स्वागत किया गया है।

अचेतन भगत- रामानंद सागर की रामायण देखिये आप, उसमें जरूर पटाखे फोड़े गए होंगे।

प्रश्न- नहीं, पटाखे तो उसमें भी नहीं हैं!

अचेतन भगत- ज़रूर होंगे, उसमें नहीं होंगे तो किसी और टीवी रामायण में होंगे। आप सिर्फ पढ़ते ही हैं क्या! टीवी नहीं देखते क्या?

प्रश्न- अरे, आप लेखक होकर ऐसी बात कर रहे हैं!

अचेतन भगत- ही ही ही, आप भी न...

प्रश्न- क्या आप जानते हैं कि हिंदुस्तान में 1920 में दक्षिण में नादर भाईयों ने सिवकासी में पहले फुलझड़ी और फिर आतिशबाज़ी बनाई। 1920 से पहले तक दियासलाई भी भारत में विदेशों से मंगवाई जाती थी।

अचेतन भगत- अच्छा! अरे वाह! देखा आपने, यही तो हिंदुस्थान की खूबी है। चीजें बनने से पहले यहां इस्तेमाल कर ली जाती हैं। मैं तो फिर भी कई बेस्ट सेलर किताब लिख चुका हूं। हिंदू राष्ट्र भक्ति का फल अवश्य मीठा होता है।

प्रश्न- क्या आप जानते हैं कि करीब 2 हज़ार साल ईसापूर्व चीन में हरे कच्चे बांस के पटाखों का इस्तेमाल लोगों ने शुरू किया?

अचेतन भगत- मुझे नहीं मालूम, पर अयोध्यावासी ज़रूर जानते होंगे। वहीं से मंगवाए होंगे बैम्बू पटाखे। आखि़र श्री राम का स्वागत करना था भई! मुमकिन है मेरी तरह तुलसीदास जी ने भी ये जानकारी मिस कर दी हो। इसलिये अपनी किताब में जिक्र नहीं किया।

कोई बात नहीं, ये कमी मैं पूरी कर दूंगा। एक नई भक्त रामायण लिख कर। धन्यवाद आपका। अवार्ड का आईडिया देने के लिए। जल्दी-जल्दी लिख लेता हूं। धर्म कर्म पीएम के राज में ही मेरे इस महान कार्य को उसकी सही जगह मिलेगी। क्या पता! राज्यसभा सीट ही हाथ लग जाए! अच्छा मैं चलता हूं, देर करना ठीक नहीं।

प्रश्न- अचेतन भगत जी, याथावत पुजारी को अवार्ड गैंग से चिता परंपरा पर हमले का ख़तरा है। इसके बारे में आपका क्या कहना है?

अचेतन भगत- देखिए उनकी बात उनसे कीजिये। वैसे भी, मैं अभी धरती पर पुरस्कार पाने के लिए चिंतित हूं।

प्रश्न- यथावत पुजारी, सुप्रीम कोर्ट का आदेश तो दिल्ली-एनसीआर के लिए है। आप तो दिल्ली से दू...र एक अलग राज्य में विराजमान हैं, जितने चाहे पटाखे खरीदें, फोड़ें।

यथावत पुजारी- दिल्ली मेरे दिल के करीब है। मैं कहीं भी रहूं मेरी नज़र वहीं रहती है। दिल्ली के बच्चों की खुशी पर प्रहार मेरी खुशी छीनने जैसा है।

प्रश्न- पर पटाखे जलाने से बच्चों के स्वास्थ्य को भारी नुकसान हो सकता है। बुजुर्ग और कमज़ोर सांस के मरीज़ अपनी जान गंवा सकते हैं। क्या ये आपके लिए दुख का कारण न बनेगा?

यथावत पुजारी- देखिए दिल्ली बड़ी-बड़ी कुर्बानी लेती है। अगर इन छोटी-छोटी बातों की परवाह की जाए तो पहले राज्य और फिर देश की चौकीदारी करने का अवसर कभी हाथ न लगे।

प्रश्न- आपने ये चिंता क्यों जताई कि हो सकता है प्रदूषण का हवाला देकर मोमबत्ती और अवार्ड वापसी गैंग हिंदुओं के चिता जलाने पर भी याचिका डाल दे?

यथावत पुजारी- मैं दुश्मनों के जिस इलाके में धर्म सेवा के लिए पटक दिया गया हूं, वहां कब जान चली जाए कुछ कह सकते हैं क्या?

प्रश्न- आप मानते हैं कि दिनो-दिन कम होती पेड़ों की संख्या प्रदूषण के बढ़ने का कारण बन रही है। क्या ये अच्छा नहीं कि सबको मोमबत्ती और अवार्ड वापसी गैंग की तरह बिजली शवदाह गृह का समर्थक हो जाना चाहिये?

यथावत पुजारी- बड़ी बेतुकी सलाह है आपकी। मोमबत्ती, अवार्ड वापसी गैंग तो हैं ही सिरफिरे। स्वर्ग-नरक की एंट्री उनके ठेंगे पे। पर अपन संघ ब्रिगेड को तो स्वर्ग चाहिये न।

प्रश्न- लोग कहते हैं आप लोगों में विद्वता की कमी है। वैज्ञानिक समझ से डरते हैं आप?

यथावत पुजारी- अजी छोड़िये! जिसे जो बकना है बके। उन्हें क्या पता? वो तो आत्मा के अस्तित्व को ही नकारते हैं। बिजली शवदाह संस्कार में आत्मा का दम घुटता हो तो..?

धुएं से जूझती आत्माएं खांसती, शोर मचाती स्वर्ग द्वार पर पहुंचे और इंद्र देवता खिन्न होकर नरक का रास्ता दिखा दें तो..? ज़िन्दगी भर इंद्र जैसे सुरा-सुन्दरी प्रेमियों को देवता-देवता रटने, सम्मान देने की हमारी मेहनत तो गई न नरक में!

खुले में चंदन लकड़ियों में जलेंगे तो शाहरूख खान की तरह रोमांटिक अंदाज़ में मजे से हाथ पसारते हुए स्वर्ग का द्वारा खटखटाएंगे तो इंद्र स्वयं दौड़े-दौड़े द्वार खोलने आएंगे। 

(लेखिका वीना एक पत्रकार के साथ फिल्मकार भी हैं।)










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ashok upadhyay :: - 10-14-2017
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