और “भीम के सिपाहियों” ने बदल दी “ठाकुर के कुएं” की कहानी! अब अकेली नहीं है गंगी

आड़ा-तिरछा , व्यंग्य लेख, शनिवार , 14-04-2018


satire-bhims-soldiers-changed-the-story

वीना

प्रेमचंद के अफ़साने ‘‘ठाकुर का कुआं” की अछूत गंगी बीमार पति के लिए साफ पानी भरने ठाकुर के कुएं पर गई है। उस कुएं पर जहां अछूतों का जाना मना है। पर आज गंगी के जी ने ऊंच-नीच के भेद से टक्कर लेने की ठानी है। कुएं को खाली देख गंगी पानी भरने लगी तो अचानक ठाकुर का दरवाज़ा खुल गया। प्रेमंचद कहते हैं कि शेर का मुख इतना भयानक न होगा जितना गंगी को ठाकुर का खुला दरवाज़ा मालूम हुआ। ठाकुर की ‘‘कौन है?’’ सुन गंगी का बटोरा साहस बिखर गया और रस्सी-घड़ा फेंक जगत कूदकर भागी जा रही है।

 

ठीक इसी समय जब गंगी भागी जा रही है सहारनपुर के चंद्रशेखर आज़ाद ‘रावण’ को प्रेमचंद गंगी के गांव पहुंचा आए हैं। आज गंगी के मन में उठे विद्रोही सवाल बेबसी के अंधेरे में नहीं भटकेंगे।

राह में खड़ा चंद्रशेखर आज़ाद रावण आज गंगी को खाली हाथ न जाने देगा। बदहवास भागती गंगी जब चंद्रशेखर से टकराई तो उसने गंगी के कंधे संभालकर कहा - ‘‘चल गंगी ताई ठाकुर के कुएं से पानी लेकर आते हैं। ये कुआं जितना उनका है उतना ही हमारा भी है।’’ 

अरे! ऐनक चढ़ाए,  झक्क सफेद कमीज-पतलून पहने, नीला गमछा लपेटे ये कौन ठाकुर का छोरा है? जो मुझे ताई बुला रहा है! छुआ भी बड़े लाड से!

हैरान, डरी-घबराई गंगी पीछे हठी और कांपते हुए पूछा - ‘‘कौन हो बाबू साहब? मैं अछूत गंगी हूं हजूर..!’’ 

 

गंगी को खु़द से घबराता देख आज़ाद के चेहरे पर मीठी सी मुस्कान खेल गई। गंगी का हाथ अपने हाथ में लेते हुए उसने कहा - ‘‘और मैं, राष्ट्रपिता महात्मा ज्योतिबा फुले और संविधान निर्माता बाबा साहब भीमराव अंबेडकर का सिपाही... चंद्रशेखर आज़ाद रावण... तेरा वंशज।’’  फिर अपनी मूछों पर हाथ फेरते हुए बोला - ‘‘द ग्रेट चमार’’

अब गंगी बेचारी तो फटे जूते वाले उस प्रेमचंद को भी नहीं जानती जिसने गंगी के साथ चलते-चलते ठाकुर के कुएं की पोल खोल दी। कहां पता था उसे कि उसकी बेबसी पर दुनिया ने आंसू बहाए हैं। और वो जिन ठाकुरों, साहूकारों, पंडो से डरकर भाग रही है,  सारा जग उन पर थू-थू कर रहा है।

जाने कौन-कहां के फुले, अम्बेडकर जमींदारों का सिपाई है ठाकुरों का ये सजीला जवान! कैसे मानती वो कि उसके कुल का कोई ऐसे तेवर-दर्सन लिए पधारेगा। हो न हो इसने मुझे कुएं के पास देख लिया है। अब मुझे बहकाकर सज़ा दिलाने ले जाना चाहता है। गंगी की दुनिया में उसकी सोच इससे आगे कैसे जाती भला? सो गंगी ने जान बचाने के लिए वहां से भागने की सोची। 

 

जैसे ही गंगी मुड़कर भागने को हुई चंद्रशेखर ने उसका हाथ पकड़ लिया और बोला - ‘‘ताई घबराती क्यों है? यक़ीन नहीं है मुझपर! क्या समझती है तू...तेरे वंशज हमेशा चीथड़ों में लिपटे ठाकुर-पंडों, बनियों की जूती सिर पर रखकर चलने को पैदा हुए हैं। वक़्त बदल गया है ताई...अब वक़्त बदल गया है। और इस बदले वक़्त को मैं तेरे जैसे अपने हक़-अधिकार से अनजान, पल-पल डरते-मरते अपने वंशजों तक पहुंचाऊंगा। देश के हर गांव-घर जाऊंगा।

 

वो जो मेरे गुरु हैं न बाबा अम्बेडकर, जिनका जन्मदिन है आज 14 अप्रैल को। पता है तुझे, विलायत के बड़े-बड़े स्कूल, अंग्रेजी बाबू उनकी विद्या का लोहा मानते हैं। 

‘‘क्या बहुत बड़े जमीदार हैं तुम्हारे अंबेडकर बाबू..!’’ गंगी ने हैरान होते हुए पूछा। ये सुनकर चंद्रशेखर ने ठहाका लगाया पर दूसरे ही पल, उसकी आंखों में आंसू आ गए। नहीं ताई...मेरी तरह तेरे वंश के साधारण इंसान हैं वो। पर बहुत बड़े विद्वान।”

अब तक गंगी अपना डर भूलकर चंद्रशेखर की बातों में खो चुकी थी। आंखें फाड़कर बोली - “अंग्रेज बाबू लोग हमारे बीच के आदमी को मानते हैं! हमारे आदमी भी विद्वान होते हैं?”

चंद्रशेखर ने फिर अपनी मूंछों पर हाथ फेरते हुए कहा - ‘‘और नही तो क्या..!’’ हाथ फैलाकर बच्चे की तरह गंगी को समझाया - ‘‘उनकी ये...बड़ी तस्वीर अपने महलों जैसे स्कूलो में लगाते हैं। तेरे ये अनपढ़ ठाकुर-पंडे क्या बेचते हैं उनके सामने, जिनसे तू घबराती है।’’

‘‘तो क्या उन्होंने ही तुमको ऐसा बढ़िया बाबू बना दिया..!’’ गंगी ने पूछा।

 

‘‘हां, ये उन्हीं की शिक्षा की ताकत है...उन्होंने ही हमें पाठ पढ़ाया है - शिक्षित बनो, संघर्ष करो, और संगठित हो। तभी तुम अपने साथ होने वाले अन्याय को समझ पाओगे तभी उसके विरुद्ध खड़े हो सकोगे। और देखो, उनकी सीखों पर अमल करके अब तुम्हारे वंशज, इन पंडो-ठाकुरों की ठग चाल समझने लगे हैं। हमारी शिक्षा, एकता और संघर्ष का कमाल अब तू देख... आ चल मेरे साथ ठाकुर के कुएं पर।”

 

गंगी घबराते हुए बोली - ‘‘बेटा ठाकुर जिन्दा न छोड़ेगा। मेरे लाल, तू सलामत रहे इतना बस है मेरे लिए। चल वापस, नहीं चाहिये साफ पानी।’’ और गंगी चंद्रशेखर को कुएं से उल्टी दिशा में घसीटने लगी। 

तब गंगी का डरा घबराया चेहरा रावण ने अपने मजबूत हाथों में थामकर कहा - ‘‘ताई, वो लठ और लठैत दोनों हमारे हैं। हम ही तो थे जो अज्ञानता में इन ठाकुर-पंडों के लिए अपनों का खून बहाते थे। अब वो लाठियां तुझे पीटने के लिए नहीं तेरी रक्षा करने के लिए हैं। अब ठाकुर खिड़की से देखेगा तुझे पानी भरते हुए। चाहकर भी दरवाज़ा खोलकर रोक नहीं पाएगा। तू भर ठाकुर के कुएं से अपना घड़ा। अब तेरा जोखू बदबूदार पानी कभी नहीं पिएगा।’’ 

 

और सचमुच, गंगी ने कुएं पर अपना स्वागत करते हुए आदिवासी, पिछड़े, मुसलमान चेहरों के ऐसे सैलाब को पाया जो उसकी आंखों ने पहले कभी न देखा था। पहली बार उसने ठाकुर को खिड़की के भीतर छटपटाते देखा। और पहली बार वो गर्व से सरेआम ठाकुर के कुएं की जगत पर चढ़ी और इत्मिनान से अपना घड़ा भरा। 

 

बस... यही तो वो नज़ारा था जिसने दो अप्रैल को पूरे देश की ठाकुर-पंडा बाड़ी में दहशत भर दी। और इन डरी-घबराई ठाकुर-पंडो की टोलियों ने ख़ुद ही चीख़-चीख़ कर क़ुबूल कर लिया कि ‘‘भीमटों’’ ने उनके रोंगटे खड़े कर दिए हैं। हां, संविधान निमार्ता, भारत रत्न बाबा साहब भीमराव अंबेडकर के अनुयाइयों को ‘‘भीमटों, भीमटा, भीमटे’’  ऐसे संबोधन से ही तो बार-बार पुकार रही थी, ठाकुर बाड़ी की एक तथाकथित ठाकुर साध्वी। 

झूठे इल्ज़ाम में सहारनपुर की जेल में एक चंद्रशेखर कैद है। 2 अप्रैल को भीम के लाखों चंद्रशेखर आज़ाद हर गली-मुहल्ले, गांव, शहर, राज्य से निकल पड़े। आखि़र पंडो-ठाकुरों को 10 अप्रैल को समझ आ गया कि “भीमटों” को बली का बकरा बनाने के उनके षड्यंत्र अब सफल नहीं होने वाले। उन्हें फिक्र सताने लगी है कि अब बेगुनाहों पर उनके बनवाए त्रिशूल-भाले कौन चलाएगा? 

जो कहते फिरते थे भारत के मुसलमान असल में हिंदू ही हैं। बाहरी मुसलमान हमलावरों ने इनका धर्म बदलवा दिया था। (ज़ाहिर है, ऊंची जात के हिंदू नहीं शूद्र-पिछड़ों में ही कहीं गिनेंगे) और जब आज, पिछड़े-शूद्रों, आदिवासियों ने दाढ़ी-धर्म समेत मुसलमानों को गले लगा लिया तो पंडे-ठाकुर पहलवानों की गुर्राहट, चिल्लाहट-मिमियाहट में बदलने लगी है..! 

सुना है नागपुर की चोटियां दलितों को गुमराह कर भीम का संविधान छोड़ चोटी संविधान चलाने की फिराक़ में हैं। क्या होगा जो भीमा कोरेगांव ने पेशवा पराजय इतिहास दोहराते हुए इरादा कर लिया, चोटियां काटकर सबको इंसान बनाने का..? 


(वीना पत्रकार और फिल्मकार हैं।)








Tagव्यंग्य दलित ठाकुर चंद्रशेखर प्रेमचंद

Leave your comment