जहानाबाद के मुसहर, रविदास, दुसाध बुरा न मानो मनुवाद है!

आड़ा-तिरछा , व्यंग्य, शनिवार , 03-03-2018


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वीना

सुना है दबंग सामंतों ने होली दहन की रात प्रशासन की देखरेख में बिहार के जहानाबाद में मख़दूमपुर रेलवे स्टेशन के पास बसे ग़रीब दलितों की झोपड़ियों-माल असबाब को जला कर अपनी होली मनाई है। मनोरंजन के लिए असहाय औरतों-आदमियों के शरीरों का तबला-ढोलक के तौर पर भी इस्तेमाल किया गया। भई बुरा न मानो होली है!

अक्सर लोग दबंग और पुलिस प्रशासन की मिलीभत एक साथ इस्तेमाल करते हैं। मुझे इस पर आपत्ति है। भई दबंग कोई तभी होता है जब शासन-प्रशासन के लाठी-कानून उसकी जी-हज़ूरी में रहते हैं। 

व्यंंग्य स्तंभ।

 

अगर पूर्व में केंद्र में मौजूद कांग्रेस सरकार की मेहरबानी न होती तो क्या प्रधान सेवक यूं ठसक से प्रधानमंत्री बने घूम रहे होते? 2002 दंगों के आरोपी ‘मुख्यमंत्री’ किसी अंधेरी काल-कोठरी में फर्श पर पड़े गुजरात के अल्पसंख्यकों, मांओ-बहनों, बेटियों, अजन्में बच्चों से अपने गुनाहों की माफ़ी न मांग रहे होते!

 

अगर मौजूदा सरकार चाहे तो प्रशासन की औक़ात नहीं कि वो पत्ता भी अपनी मर्ज़ी से इधर-उधर कर सके। ये बात लालू यादव अपने शासन से हिंदू-मुसलमान दंगों को बेदखल करके साबित कर चुके हैं। गौरतलब है कि हिंदू राजनीति में हिंदू-मुसलमान एकता बनाए रखने से बड़ा गुनाह कोई नहीं है। सो इसी अक्षम्य गुनाह की सज़ा भुगत रहे हैं लालू प्रसाद यादव। 

 

सरकार अपनी हो और पुलिस प्रशासन साथ हो तो आरएसएस जैसे इंसानियत की नींव खोदू (चूहा कलेजा) संगठन भी दबंगों के बाप बन जाते हैं! 

हत्यारा गोडसे शहीद हो जाता है। निक्कर के पैंट बनते ही भारतीय सेना निकम्मी हो जाती है। न...न...डरिये मत... मोहन भागवत के रहते सिर्फ तीन मिनट में पाकिस्तान-चीन को मज़ा चखाया जा सकता है। 

बाक़ी सहारनपुर-जहानाबाद, मुज़फ़्फ़रनगर-भागलपुर, गुजरात और देश के तमाम मुसलमानों, दलित ग़रीब-ग़ुरबों, लालू सरीखे ओबीसियों को सबक सिखाना तो उठने-बैठने जितना आसान काम है। 


और बुरा मत मानिये, मुसलमान टोपी और चादर पहन कर न से नीतीश न से नागपुर हो गए हैं अगर। मजबूरी है। वैसे भी ब्लैकमेलिंग का पट्टा पहनने वाले नीतीश कौन से अकेले हैं। तो चुल्लू भर पानी में डूब मरने की कोई बात नहीं।

और डर काहे का, जब ख़ुद कोतवाल ने अपने जूते में क़त्ल का छुरा छिपा लिया हो!

जैसे ‘वीर’ सावरकर ने अंग्रेज़ों से माफ़ी मांगी थी वैसे ही नीतीश ने मांग ली प्रधान सेवक से। हिंदू राज के लिए ऊंचे आत्मसम्मान की नहीं नंगे होकर निचले स्तर के षड्यत्र की आख़िरी सीढ़ी तक पहुंचने की ज़रूरत होती है। 

इस हुनर में माहिर प्रधान सेवक का अनुसरण करते हुए मनुवाद बस पंडे की चुटिया पकड़ कर ब्रह्मांड के चक्कर लगाने ही वाला है। चांद पर गौमूत्र और गोबर छिड़क कर उसे रहने लायक बस अब बनाया...।

थोड़ा और इंतज़ार 2019 में संपूर्ण मनुवाद बस आने ही वाला है। दलित को गले लगाओ, मुसलमानों की टोपी पहनो, ओबीसी के हाथ जोड़ों, खाना दो, पानी दो, घर दो, बाढ़ आ गई मर गए लुट गए, मदद करो हर पल की चखचख। हर मुसीबत से आंख फेरने के लिए अलग झूठ गढ़ने का प्रेशर। कमबख़्त लोकतंत्र ने ग़ुलामों के मुंह में ज़बान ठूस दी है। और हाथ सत्ता की गर्दन तक पहुंचने पर आमादा हैं। 

 

बस एक बार मनुराज आ जाए। एक ही वाक्य में सारी जिम्मेदारियों, मांगों, औक़ातों का हल प्राप्त हो जाएगा - ‘‘भई बुरा न मानो मनुराज है ’’, ‘‘बुरा न मानो करम का लेखा है। भूखे पेट, नंगे बदन ग़ुलामी करनी पड़ेगी, खाल खिंचवानी पड़ेगी, बाढ़ में बहना पड़ेगा, भूकंप में ज़मींदोज़ होना पड़ेगा।’’

 

तो बुरा मत मानिये अगर मनुराज लाने के लिए ब से बिहार में 1989 के हिंदू-मुसलमान दंगों में अल्पसंख्यकों के खि़लाफ़ ब से बेदर्द होने का कलंक ढोने वाले तब के एसपी केएस द्विवेदी को वर्तमान बिहार का डीजीपी (डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस) बना दिया गया है। भागलपुर में 24 अक्टूबर 1989 को शुरू हुआ दंगा दो महीने तक चला था। जिसमें क़रीब एक हज़ार लोग मारे गए थे मरने वाले ज़्यादातर मुसलमान थे। और 50 हज़ार लोग बेघर हो गए थे। याद रखिये, प्रजातंत्र का कलंक मनुवाद में गौरव का प्रतीक है। 

तो वर्तमान बिहार के डीजीपी केएस द्विवेदी की मनुवादी उपलब्धि ये है कि वो सन 1989 भागलपुर हिंदू-मुस्लिम दंगों के एक्सपर्ट हैं।

उनकी क़ाबलियत का नमूना देखिये कि सुबह एक मार्च 2018 को बिहार डीजीपी का पद संभाला और रात 8.30 बजे जहानाबाद के मखदमूपुर स्टेशन के आस-पास की ज़मीन पर बसे ग़रीब मुसहर, रविदासी, दुसाध दलितों के झोंपड़ों की होली जल गई। भई दलितों बुरा न मानो यही मनुवाद की होली है। 

कन्हैया कुमार, जिग्नेश मेवानी, चंद्रशेखर आज़ाद, उमर ख़ालिद सरीखे कल के नौजवानों क्या समझते हो..? दलित-मुसलमान-ओबीसी एकता का राग अलापोगे और धूर्तता में सदियों का विशेषज्ञ मनुवाद हार मान लेगा! 

(वीना पत्रकार और फिल्मकार हैं।)









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???? :: - 03-03-2018
बहुत सटीक प्रहार है गैर इंसानियत की सोच रखने वालों पर।