शिक्षित बेटी सुरक्षित पाओ , प्रदूषण रहित ‘‘डोला व्यवस्था’’ लाओ

आड़ा-तिरछा , व्यंग्य, शनिवार , 30-09-2017


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वीना

हे हइया ना...हइया ना...हइया ना हईया... हे डोला... हे डोला... हे डोला...

देहा जलायके, पसीना बहायके,  दौड़ाते हैं डोला,  हे डोला... हे डोला... हे डोला...

आके-बाके रास्तों पे कांधे लिए जाते हैं, राजा-महाराजाओं का डोला... हे डोला... हे डोला...

क्या आइडिया दिया है भूपेन हजारिका ने, भई वाह! रेडियो पर गाना सुनते-सुनते अचानक उछल पड़े सरयू पांडे।

क्या हुआ पांडे जी क्यों उछल रहे हैं?

एक कहार 20 रुपया,  दो 40, आने-जाने का 40-40 भी लगाएं... तो 80 रुपये प्रतिदिन होता है।

अ... अस्थाना जी... ज़रा 80 गुणा 30 कीजये तो...

जी...80 गुणा 30 हुआ...2 हजार 400... हां इतना ही हुआ पांडे जी, कमल अस्थाना ने तुरंत हिसाब लगाया।

2 हज़ार 400... माने... लम-सम 2 हज़ार रुपये महीने में सौदा पट सकता है।

प्रतीकात्मक तस्वीर साभार : गूगल

अरे पांडे जी, हमें भी तो बताईये क्या सौदा पटाया जा रहा है? पास बैठे राठौर सिंह ने फिर पूछा।

सिंह साहब, गाड़ी, पैट्राल,  ड्राइवर का खर्चा इससे चार गुना हो जाएगा। तभी न कहते हैं फेंकू मंत्री और अपने तलवार-त्रिशूलधारी, पुरानी संस्कृति लपक लो।

क्या भिनभिना रहे हैं पांडे जी? साफ-साफ बताओ यार! सिंह तिलमिलाकर बोले।

बताता हूं सिंह साहब, बताता हूं। तनिक सब्र की जलेबी छानिये!

अस्थाना जी आप एक प्रोजेक्ट बनाइये। ‘‘काशी नगरी में पर्यावरण और संस्कृति सुरक्षा के उपाय’’ समझे।

नहीं समझे पांडे जी। कमल अस्थाना सिर खुजाते हुए बोले।

अरे भई अस्थाना, राठौर साहब न समझे, बात समझ में आती है। पर तुम तो चमड़ी से दमड़ी निकालने में माहिर हो!

पांडे जी आखि़र किसकी चमड़ी पे नज़र है आपकी?

अस्थाना, विश्वविद्यालय में छेड़छाड़ को लेकर जो हंगामा चला, उसने विचलित कर दिया हमें। कल से हमारी बिटिया शर्मिला पांडे,  कॉलेज जाएगी-आएगी तो डोले में बैठकर। सरयू पांडे ने जनेऊ पर हाथ फेरते हुए एलान किया।

प्रतीकात्मक तस्वीर साभार : गूगल

आज सुरक्षा मांगने सड़कों पे ऊतरीं। कल संस्कारों के पिंजरे तोड़ेंगी। मैंने ऐसा तोड़ निकाला है जिससे लड़कियों की सुरक्षा और निगरानी तो होगी ही साथ-साथ अपने धर्म और धन की भी रक्षा होगी।

मसलन?

देखो भई, फेंकू मंत्री की कृपा से बेरोजगार आदमी थोक के भाव मारा-मारा फिर रहा है। दो वक़्त की भरपेट रोटी और 2 हज़ार रुपये में सैकड़ों मिलेंगे खून-पसीना बहाने वाले। एक के गले में त्रिशूल, दूसरे के में तलवार। सुरक्षा गार्ड भी और कहार भी। आगे वाले कहार के एक कांधे पे डोला,  दूसरे हाथ में त्रिशूल। पीछे वाला कहार तलवार से ताल मिलाएगा। बनारस की ऊंची-नीची,  आड़ी-तिरछी गलियां हईया हो, हईया की हमारी पुरानी शान से गूंज  उठेंगी। अछूतों,  मनचलों से दूरी,  प्रदूषण मुक्त काशी की इच्छा पूरी! कहो कैसी कही?

वाह! पांडे जी, एक पंथ और कई काज। एक तो इससे लंपट होती हमारी बेटियां कब्जे में रहेंगी। दूसरे अकेले काशी में हम हज़ारों नौजवानों को डोला उठाने वाले कहार रोज़गार से जोड़कर फेंकू मंत्री को इंप्रेस कर लेंगे।  

अब झटपट ‘‘शिक्षित बेटी, सुरक्षित पाओ’’  काशी में प्रदूषण रहित ‘‘डोला व्यवस्था’’ लाओ का ऐसा बढ़िया प्रस्ताव बनाओ अस्थाना जी कि भो...डी का विश्वविद्यालय का ‘‘डोला ठेका’’  पुण्य अपनी ही तिजोरी में आवे।

प्रतीकात्मक तस्वीर साभार : गूगल

भई वाह! पांडे जी, जवाब नहीं आपकी बामण बुद्धि का। हमारी बेटी उर्मिला सिंह भी डोले में ही घर से निकलेगी अब। राठौर सिंह मूछों पर ताव देते हुए बोला। पर क्या डोला सुविधा तुरंत मिल पाएगी? आज 20 रुपये प्रति व्यक्ति की आय में फांके काटने वाले खुद तो ठीक से चल नहीं पाते, हमारी तंदुरुस्त बेटियों से लदे डोले कैसे उठाएंगे?

प्रश्न उचित है सिंह साहब। फिलहाल अपनी बेटियों के लिए संगठन से ट्रेंड मुसटंडे बुलवाते हैं। बाक़ी व्यापार के लिए काशी ग्लेडिएटर टाइप योजना बनाते हैं। रात में कुश्ती की कमाई, दिन में डोला ढुलाई।

ही...ही...ही... अ... सोच रहा हूं प्रमिला अस्थाना को भी डोला मुहैया करवा ही दूं। कमल अस्थाना खिसियाते हुए बोला।

ठीक है, ठीक है, पहले शर्मिला और उर्मिला के लिए कहार-डोले का इंतजाम करो। फिर प्रमिला का भी देख लेना। पांडे जी रुखाई से बोले।

दूर खड़े ननकू मल्लाह ने भी खुश होते हुए कहा - ‘‘बहुत बढ़िया विचार सुझाए पंडित जी! मैं भी सुमन के लिए डोले का ही इंतजाम किए लेता हूं।

क्यों बे मल्लाह, मत मारी गई है तेरी! सिंह आंखे तरेरते हुए दहाड़ा।

ननकू एक पल के लिए सहम गया। डरते-डरते पूछा - - ‘‘क्या हुआ ठाकुर साब?’’

क्या हुआ के बच्चे। हमारी बराबरी करता है?

ठाकुर साब मैं भी 2 हजार का खर्चा झेल सकता हूं अपनी सुमन बिटिया के लिए। आप तो जानते ही हैं, पढ़ने की कितनी लगन है उसे।

तुम लोगों की वजह से ही आज ये दिन देखना पड़ रहा है। भो...डी के इस लोकतंत्र की लल्लो-चप्पो ने जीना हराम कर दिया है। सिंह तिलमिला गया।

बीएचयू आंदोलन की तस्वीर। साभार : गूगल

सबका पहनावा एक जैसा। एक कक्षा, एक भाषा। पता ही नहीं चलता नीच घरों की कौन हैं और उच्च कुलीन कौन? मनचले सब पर हाथ साफ कर रहे हैं। सुन ले बे मल्लाह! पंडितो,  ठाकुरों,  बनियों, कायस्थों की बेटियों के अलावा कोई और छोकरी डोले का इस्तेमाल नहीं कर सकती।

तभी तो कहता हूं सिंह साहब हिंदू राष्ट्र की स्थापना अति आवश्यक है। सनातन धर्म की नाक कटवा दी है इस मानव अधिकार, संविधान के चोंचलों ने।

पंडित जी, हम भी हिंदू हैं। आप भी जानते हैं फेंकू मंत्री को जिताने के लिए हमने भी दिन-रात एक किए हैं। घर-घर फेंकू हम दलित-पिछड़ों के कंधों पर चढ़कर ही विराजमान हुए हैं।

कान खोलके सुन ले बे ननकू! तमिलनाडु और आंध्रा की देवदासी परंपरा को काशी तक पहुंचने में देर नहीं लगेगी। पता है कि नहीं,  सारा शहर उन आधी नंगी देवदासियों की परेड को देखकर मजे लेता है। और फिर उम्र भर पंडे-पुजारियों को खुश करने की शिक्षा में महारात हासिल करती हैं। पांडे की लाल आंखों में वासना के नशे को तैरता देखकर ननकू कांप गया।

जैसी प्रभु की इच्छा पांडे जी। सनातन नगरी काशी में धर्म का अपमान नहीं होने देंगे। जय भोलेनाथ। चल रे ननकू,  डोले का इंतजाम करना है। अस्थाना ननकू को घूरते हुए बोला।

हैरान-परेशान ननकू कंधे पे धोती संभालते हुए अस्थाना के पीछे हो लिया।

क्यों अस्थाना जी? हमारी गांठ में भी पैसा है। बिटिया पढ़ाई में अच्छी है। फिर?

तुम्हारी गांठ की अकड़ ढीली करने के लिए ही तो फेंकू मंत्री सरकार लाए हैं हम। तुझे पता है ना ननकू... हिंदू राष्ट्र में हर किसी की जात-औकात तय है। ये जो सवालों की पूंछ उठाए घूमते हो न बेटा, दबा लो खुद्दै। हमको तकलीफ दी तो पछताओगे...

ननकू का शरीर अस्थाना के पीछे है। पर मन,  धत् तेरी हिंदूगीरी! करता हुआ आज़ादी के लिए पत्थर-लाठी खाने वाली,  भग-भग  फेंकू,  हुर-हुर फेंकू के नारों से आसमान गुंजाने वाली बेटियों की आवाज़ से जा मिला है। उन्हीं आवाजों से, जिन्हें दो दिन पहले हिंदू ननकू कोस रहा था।

(वीना पत्रकार और फिल्मकार हैं।)










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Ashok taank :: - 09-30-2017