अभियुक्त हैं तो "क्रेडिबल" हो सकते हैं आप!

आड़ा-तिरछा , व्यंग्य आलेख, सोमवार , 05-03-2018


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राजेश कुमार

नहीं, मामला केवल कार्ति चिदम्बरम का नहीं है। आर्थिक मामलों और इस क्षेत्र के लंद-फंद से लगभग अनजान मेरे जैसे लोगों के सामने भी इतना तो साफ है ही कि पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम के व्यवसायी पुत्र की गिरफ्तारी, अपनी बेटी शीना बोरा की हत्या के आरोप में एक लम्बे अर्से से जेल में बंद इन्द्राणी मुखर्जी के एक बयान के आधार पर हुई है।

मुंबई की बायकुला जेल में बंद इन्द्राणी ने मजिस्ट्रेट के सामने अभी 17 फरवरी को बयान दर्ज कराया है कि कार्ति ने अपनी पहुंच और रसूख से आई.एन.एक्स. मीडिया को विदेशी निवेश विकास बोर्ड-एफ.आई.पी.बी.- की मंजूरी दिलाने के लिये मुखर्जी दंपति से करीब सवा छह करोड़ रुपये का सौदा किया था।

यह आरोप नया है, वरना सी.बी.आई. ने यह मामला तो मई 2017 में ही दर्ज किया था और दावा है कि उसके पास कार्ति से जुड़े एक फर्म को मैनेजमेंट कन्सल्टेंसी शुल्क के नाम पर 10 लाख रुपये देने के सबूत भी हैं।

ये सबूत कार्ति से जुडी दो कंपनियों- ‘चेस मैनेजमेंट’ और ‘एडवांटेज स्ट्रेटेजिक कन्सल्टिंग’ के साथ, षड्यंत्र और हत्या के आरोपी इन्द्राणी-पीटर मुखर्जी दंपति के स्वामित्व वाले आई.एन.एक्स. मीडिया के कई ई-मेल, पत्रों और वाउचरों से और जांच मे सामने आये ‘करेंसी ट्रेल’ से मिले हैं।

अगर आप मेहुल भाई और नीरव मोदी, माल्या जी और रोटोमैक वाले कोठारी साहब के घपलों में लूटे गये धन से इसकी तुलना न करने लग जाये तो 10 लाख रुपये कम तो नहीं होते सो कार्ति को पिछले साल 23 और 28 अगस्त को बुलाकर उससे 22 घंटे पूछताछ भी की गयी थी। संभव है कि बुलाने पर वह फिर जांच एजेंसी के समक्ष हाजिर हो जाता, लेकिन बुलाया नहीं गया तो मद्रास उच्च न्यायालय से विशेष अनुमति लेकर कारोबार के सिलसिले में वह पिछले महीने ब्रिटेन चला गया। 

कार्ति लौटा तो जांच में उसका असहयोग तो जगजाहिर था ही, नया और विश्वसनीय आरोप भी था, लिहाजा उसे चेन्नई हवाई अड्डे पर ही हिरासत में ले लिया गया।


मेरी ही तरह, आपको भी अगर ठीक इसी बिन्दु पर 2014 के बाद केवल एक साल में जय शाह की कंपनी के कुल कारोबार में 16,000 गुना उछाल या उनका कारोबार 50,000 रुपये से बढ़कर 80,00,00,000 रुपये हो जाने या बिड़ला-सहारा डायरी और उनमें 40-50 अलग-अलग तिथियों पर कांग्रेस-भाजपा के कई पूर्व और मौजूदा केन्द्रीय मंत्रियों-मुख्यमंत्रियों को एकाधिक किस्तों में करोड़ों रुपये देने संबंधी प्रविष्टियां याद आ गई हों तो रुकिये। यह भी याद कर लीजिये कि जय शाह का पूरा आख्यान रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज के दस्तावेज पर आधारित था और दूसरी कथा 2013-14 में बिड़ला, सहारा की कंपनियों के ठिकानों पर आयकर विभाग के छापों में जब्त कागजात पर। अब इन पर कैसे भरोसा किया जा सकता है। कोई इनके आधार पर किसी बैठक-जलसे-सभा में जयंती टैक्स के आरोप लगाये तो लगाये, ठीक तो वही लगता है जो बिड़ला-सहारा डायरी के प्रसंग में विशेष जांच दल बनाने की अपील पर सुप्रीम कोर्ट मे अटार्नी जनरल ने कहा कि ‘कागजों, डायरियों में ‘अनस्क्रपलस’ लोगों की प्रविष्टियों को स्वीकार्य साक्ष्य नहीं माना जा सकता।’


‘अनस्क्रपलस’ मतलब अनैतिक, निर्लज्ज, विवेकहीन। यह ‘डिक्शनरी मीनिंग’ है। ऐसे स्रोतों को विश्वसनीय कैसे माना जा सकता है। सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ कांड की सुनवाई कर रहे सी.बी.आई. के विशेष जज बृजगोपाल हरकिशन लोया की संदेहास्पद मृत्यु के मामले सौंपे जाने को लेकर हाल ही में चर्चा में रहे जस्टिस अरूण मिश्रा की एक पीठ पिछले साल लगभग इसी समय ‘इन पन्नों, कागजों, ई-मेल के प्रिंट आदि को ‘ कानूनी साक्ष्य के लिहाज से फालतू और महत्वहीन बताते हुये एस.आई.टी. के गठन की अपील खारिज भी कर चुकी है।


तो अभियुक्तों की ‘क्रेडिबलिटी’ बहुत है इन दिनों, कम से कम हमारी सरकार और उसकी एजेंसियां बहुत भरोसा करती हैं जघन्य अपराधों के अभियुक्तों और अपराधियों तक का।


याद कीजिये, मुम्बई पर आतंकवादी हमलों - 26/11- के अभियुक्त, फरार आतंकवादी डेविड कोलमैन हेडली ने अमरीका में कहीं से वीडियो लिंक के जरिये फरवरी 2016 में मुम्बई की एक अदालत को कहा कि लश्कर कमांडर जकी-उर-रहमान लखवी और उसके सैन्य प्रमुख मुजम्मिल भट्ट की एक बातचीत से उसे एक आतंकवादी साजिश की जानकारी मिली थी और बाद में मुजम्मिल ने पूछने पर उसे बताया था कि इशरत जहां लश्कर की आतंकवादी थी।

अब हेडली जी ने कहा है तो झूठ थोड़े न बोलेंगे, सो वो मामला ‘क्लिंच’ हुआ कि 15 जून 2004 को तीन अन्य लोगों के साथ अहमदाबाद के पास एक पुलिस मुठभेड़ में मारी गयी 19 साल की इशरत, बिला शक लश्कर-ए-तैयबा की आतंकवादी थी। जाहिर है कि शाहनवाज हुसैन और  भाजपा के अन्य नेताओं ने हेडली जी के इस रहस्योद्घाटन के बाद इशरत को निर्दोष बताने के लिये फिर कांग्रेस को आड़े हाथों भी लिया था।


एक और सज्जन हैं क्रिस्टियान मिशेल। ब्रिटिश हैं, भारत के साथ 12 ऑगस्ता वेस्टलैंड हेलीकॉप्टरों की बिक्री के सौदे में इतालवी कंपनी ‘फिन-मेकैनिका’ के मध्यस्थ थे। दलाल या बिचौलिया अच्छा शब्द नहीं है, मध्यस्थ सम्मानजनक है। ई-मेल, टिप्पणियां और डायरियां लिखने में इतना चुस्त-दुरूस्त कि लगता है, वह काम कम कर रहे थे, भ्रष्ट आचरणों के ब्योरे और रिश्वत राशि के बंटवारे के सबूत ज्यादा बना रहे थे कि भविष्य में भारत का कोई प्रधान सेवक इस सौदे की जांच कराना चाहे तो तोते को बहुत मेहनत-मशक्कत न करनी पड़े। दिसम्बर 2016 की खबरों को ध्यान से पढ़ें।


कहते हैं कि 2010 में हुये 3,600 करोड़ रुपये के इस हेलीकॉप्टर सौदे के बारे में क्रिस्टियान मिशेल ने ये सारे दस्तावेजी सबूत ‘फिन-मेकैनिका’ की ओर से नियुक्त एक और मध्यस्थ गीडो रैल्फ हाश्के और यूरोप में कंपनी के अपने बड़े साहबों को सूचना देने के क्रम में बनाये और इतालवी पुलिस ने सारे कागजात जब्त कर सी.बी.आई को सौंप दिये। शुक्रिया कि वह एक और मशक्कत से मुक्त हुई। कागजात में कांग्रेस की शीर्ष नेता सोनिया गांधी, उनके बेहद करीबी राजनीतिक नेताओं, तत्कालीन वायुसेना अध्यक्ष एस.पी.त्यागी, उनके मातहत अधिकारियों और रक्षा मंत्रालय के शीर्षस्थ नौकरशाहों के बीच 250 करोड़ रुपये की कुल रिश्वत-राशि के बंटवारे के विस्तृत ब्योरे हैं। इनमें लाभान्वितों की वर्गीकृत सूची है कि डी.एस. को, जे.एस.ए.एफ. को, ए.एफ.ए. को, डी.जी. ए.सी.क्यू. सहित रक्षा मंत्रालय के 5 अधिकारियों, सी.वी.सी. और सी.ए.जी. को कुल 70 करोड़ रुपये अदा किये गये, वायुसेना के 4 अधिकारियों - डी.सी.एच., पी.डी.एस.आर., एफ.टी.टी. तथा डी.जी. मेन्टीनेंस- को कुल 50 करोड़ रुपये दिये गये और सोनिया गांधी और ए.पी. जैसे उनके करीबी राजनीतिक नेताओं को 120 से 130 करोड रुपये। 


ध्यान दीजिये कि इन कागजात में सोनिया गांधी को छोड़ सभी लाभान्वितों के नाम या पदनाम के प्रथमाक्षर भर लिखे गए हैं और आप बस अनुमान लगा सकते हैं कि ए.पी. मतलब अहमद पटेल, डी.एस. मतलब डीफेंस सेक्रेटरी, डी.सी.एच. मतलब डिपुटी चीफ ऑफ एयर स्टाफ..........। ये अनुमान सही भी हो सकते हैं, गलत भी, बस सोनिया गांधी का पूरा नामोल्लेख है और वहां गलती की कोई गुंजाइश नहीं है। तब क्या मानना चाहिये कि क्रिस्टियान मिशेल चाहते थे कि प्रधान सेवक और उनके सरकारी तंत्र को सोनिया गांधी के अपराध की शिनाख्त में कोई गफलत न हो। 


मिशेल का पक्ष कुछ और है। वह फरार है और अबू धाबी से वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये उसने एक टेलीविजन नेटवर्क से संबंधित सवालों पर कहा कि ‘उसने अपने साहबों को कुछ मेल और संदेश जरूर भेजे थे, लेकिन लिखित नोट्स उसके नहीं हैं, इनमें से ज्यादातर हाश्के ने प्लांट किये हैं। कुछ कागजात इन्हीं हाश्के के ठिकाने से जब्त किये गये थे और कहते हैं कि इटली की उक्त अदालत में जब हाश्के को कांग्रेसी नेताओं के फोटो दिखाये गए तो उसने उन सबकी शिनाख्त भी की।

बहरहाल, अभी जनवरी के पहले हफ्ते में इटली की एक अपीली अदालत ने फिन-मेकैनिका’ के दोनो प्रमुख अभियुक्तों को ऑगस्ता हेलीकॉप्टर सौदे में भ्रष्टाचार, लेखा में गड़बड़ी, भारतीयों को रिश्वत देकर निविदा प्रक्रिया में उनसे दखलंदाजी करवाने के सभी आरोपों से भले बरी कर दिया हो, उस समय मिशेल के ई-मेल, टिप्पणियों और डायरियों को लेकर संसद के दोनों सदनों में भाजपा सदस्यों ने कांग्रेस को घेरने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी थी और सी.बी.आई. ने एयर चीफ मार्शल त्यागी पर सौदे में मिली नकदी से ढाई करोड़ रुपये मूल्य की जायदाद खरीदने का आरोप लगाया था।

एक विस्फोटक बात यह भी है कि क्रिस्टियान मिशेल ने प्रधान सेवक पर आरोप लगा दिया कि उन्होंने इटली के प्रधानमंत्री मेतिओ रेंजी से एक निजी बातचीत में भरोसा दिया था कि अगर इटली, ऑगस्ता करार के मामले में गांधी परिवार की संलिप्तता के सबूत मुहैया कराये तो उनकी सरकार केरल में दो मछुआरों को गोलीबारी कर मार देने के मामले में उसके एक बचे हुए आरोपी नौसैनिक अधिकारी को भारत से जाने देगी।

मिशेल ने तो यहां तक कहा कि इटली ने नौसैनिक को रिहा नहीं करने की स्थिति में उस निजी बातचीत को सार्वजनिक करने की धमकी तक दे डाली थी। लेकिन अप्रैल 2016 में जब संसद में यह मामला उठा तो वित्त मंत्री अरूण जेटली ने ऐसे किसी गुप्त करार से इंकार करते हुये साफ कहा था कि इतालवी प्रधानमंत्री से प्रधान सेवक की कोई मुलाकात ही नहीं हुई है। यह और बात है कि वित्त मंत्री के इस बयान के केवल साल भर बाद ही उनकी सरकार ने मछुआरे की हत्या के आरोपी, इतालवी नौसेना अधिकारी सल्वेटरो गिरोन को सुप्रीम कोर्ट की अनुमति से भारत छोड़ने की इजाजत दे दी।

प्रसंगवश, दिलचस्प यह है कि गिरोन के साथी आरोपी मैसीमिलानो लैतोरे को दिल का दौरा पड़ने के बाद ‘मानवतावादी आधारों पर’ उसे अपने वतन जाने की इजाजत देने के लिये परधान जी ने 2014 में असम में एक जनसभा में सोनिया गांधी को आड़े हाथों लिया था, यद्यपि परधान जी की सरकार बनने के एक साल बाद ही उनकी विदेश मंत्री ने भगोड़े ललित मोदी को ब्रिटेन से यात्रा दस्तावेज और पुर्तगाल का वीजा दिलवाने के लिये अपनी हैसियत के इस्तेमाल को मानवतावादी आधारों पर जायज ठहराया था और पूरी सरकार उनके बचाव में उतर आयी थी।

लेकिन यह प्रसंगवश है और अवांतर भी। शायद यह बताना अवांतर न हो आप विश्वसनीय हो सकते हैं, बहुत ‘क्रेडिबल’, लेकिन पक्ष-विपक्ष, छोटे-बड़े सब पर आरोप लगाने की छूट किसी को नहीं दी जा सकती।


(राजेश कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं और दिल्ली में रहते हैं।)










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